मेरी दलित पहचान मेरे शहर और गांव की गलियों के लिए एक गाली थी

Posted by Naresh Manavi in Caste, Hindi, Society, Staff Picks
April 30, 2017

हमारे देश और समाज में किसी खास जाति से संबंध रखने के फायदे और नुकसान हैं। किसी एक जाति द्वारा किसी दूसरी जाति के लोगों के शोषण की कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं और साहित्यकारों ने भी इस पक्ष का बार-बार अपनी तमाम रचनाओं में ज़िक्र किया है। प्रेमचंद का साहित्य दलित विमर्श से भरा पड़ा है। अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और अनेक सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस भेदभाव को दूर करने के लिए बहुत प्रयास किये जो आज भी किसी ना किसी रूप में जारी हैं।

इस भेदभाव से मुक्ति के लिए शिक्षा को हमेशा एक महत्वपूर्ण पथ माना गया है और काफी हद तक ये सही भी है। अब 2017 में जब अप्रैल माह को हमने #DalitHistoryMonth के रूप में मनाया और अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर दलित मुक्ति आंदोलन से जुड़े संघर्षों की कहानियां पढ़ रहे हैं, अपने आप को और अपने अतीत को उससे जोड़े बिना रहना मुझे ठीक नहीं लगा। जीवन के तमाम कड़वे अनुभव रोज़ आँखों के सामने से ऐसे गुज़र जाते हैं जैसे कल ही की बात हो। हरियाणा जैसे सामंती प्रदेश में पला पढ़ा होने के अनुभव बाकी प्रदेशों से अलग ज़रूर हैं पर अच्छे और सुखद तो नहीं हैं।

गालियॉं और गलियाँ

बचपन से शुरू करें तो कुछ गालियां और गलियां अतीत का साया बनकर काफी लंबे समय तक पीछा करती रही जब तक खुद मुक्ति आंदोलनों का हिस्सा नहीं बने। चाहे वो सामाजिक बदलाव की दिशा में जातिगत भेदभाव दूर करने का हो या फिर लिंग भेदभाव को मिटा कर एक समान एवं सुरक्षित समाज बनाने का अभियान हो। गाँव की कुछ गलियां ऐसी थी जहां अपने कुत्तों और जाति सूचक गालियों के साथ लोग तैयार रहते थे और अपनी आने वाली नस्लों को भी इसकी तालीम देते थे।

शिक्षा इससे मुक्ति का एकमात्र रास्ता दिखाई देता था। अपने बारे में बात करूं तो अपने पड़ोस और रिश्तेदारों में सांवले होने के स्टिग्मा और गाँव समाज के किसी खास जाति का होने के स्टिग्मा से पढ़ाई लिखाई में किए गए अच्छे प्रयास और छोटी-छोटी उपलब्धि अस्थाई सुकून देने वाले थे।

सरकारी योजनाएं चाहे आरक्षण हो या कोई स्कॉलरशिप, आस-पास के लोगों की नफरत और भेदभाव का कारण दिखाई पड़ती थी। मुझे बचपन का एक किस्सा आज तक याद है। मेरे पिताजी अंबेडकर से काफी प्रभावित हैं और हमारी पढ़ाई के लिए उन्होंने वो सब कुछ किया जो उन्हें ज़रूरी लगा; माँ के जेवर बेचने से लेकर कर्ज़ लेने तक या सरकारी योजनाओं का लाभ भागदौड़ करके लेने तक।

90 के दशक में मैनुअल स्कैवेन्जिंग यानि मैला ढोने की प्रथा के समाप्ति के नाम पर मिलने वाला वजीफा एक बड़ी आर्थिक सहायता थी। हालांकि हमारे गाँव में इस काम का प्रचलन नहीं था फिर भी पिताजी कचहरी से मैला ढोने का प्रमाण पत्र बनवा के स्कूल से हमारे लिए वजीफे का बंदोबस्त कर लेते थे। हद तो तब हो गई जब 9वीं कक्षा में टीचर ने मुझसे ये मनवाने के लिए ज़ोर डाला कि तुम्हारे पिताजी सिर पर टट्टी उठाते हैं इसलिए ये स्कॉलरशिप तुम्हें मिलता था जबकि ये योजना, ऐसे काम छोड़ने के लिए पुनर्वास के तौर पे थी।

भेदभाव का समाज में अहसास

बहुत पहले का एक किस्सा मुझे याद आता है। 1990-91 के आस-पास नैशनल चैनल दूरदर्शन पर अंबेडकर के जीवन पर आधारित का धारावाहिक (नाटक) आता था जिसमे उनका बचपन दिखाया गया कि कैसे उनके साथ जातिगत भेदभाव होता था। उसके बावजूद उनके संघर्ष ने उनको आगे बढ़ने में प्रेरणा का काम किया। उस वक़्त गाँव में एक या दो घर में टीवी था, हम भी उनके घर टीवी देखने जाते। गर्मी, सर्दी या मच्छर काटे, नीचे ज़मीन पर बैठ के देखना होता था। चारपाई पर नहीं बैठ सकते थे। कई बार घर का मालिक इधर-उधर होने पर उनकी कुर्सी और चारपाई पर बैठ कर अच्छा लगता क्योंकि वो प्रतिबंधित था। प्रतिबंध तोड़ने का अपना मज़ा था, काफी बाद में पता चला ये प्रतिबंध जातिगत भेदभाव का ही रूप है जिसके बारे में अंबेडकर वाला नाटक था। फिर मैंने जाना छोड़ दिया।

दसवीं कक्षा के बाद पढ़ाई के लिए शहर में रहने की योजना बनी। सुना था भेदभाव सिर्फ गाँव में होता है शहरों में नहीं, ये विश्वास भी वहां जाकर टूट गया। अलग-अलग जाति के नाम पर रहने के लिए धर्मशालाएं हैं, आर्थिक और सामाजिक दर्ज़े के हिसाब से ये भिन्न थी। वहां घुसना भी कई बार ऐसा लगता जैसे चारपाई पे बैठ गए हों जो प्रतिबंधित है।

कुछ दिनों बाद परिवार भी शहर में आ गया। किराये पर मकान खोजने का काम अपने आप में ज़ोखिम भरा था। कहीं भी जाओ सबसे पहले पूछा जाता ‘किस जात के हो भाई?’  कोई बिरला ही परिवार मिलता जो जात नहीं पूछता या जात से ज्यादा किराये से मतलब रखता। कई जगह तो ऐसा भी हुआ कि जात पूछे बगैर मकान दे दिया, जैसे ही घर की सफ़ाई करके सामान रखना चाहा, मकान मालिक को जात पता चल गई और सारी मेहनत बेकार। सामान वापिस उठा के अब नया मकान ढूंढ़ो!

खैर जैसे तैसे आगे बढ़ें, कुछ आंदोलनों से जुड़ें जो हर तरह के भेदभाव मिटाने की दिशा में साहित्य और रंगमंच के माध्यम से काम करते रहे, जिसका मुख्य काम दलित और महिला मुद्दों को साहित्य और कला के विभिन्न माध्यमों से समुदाय में ले जाना और दबे हुए मुद्दों पर संवाद करना; न कि दबा रह के वो ज्वालामुखी की तरह विभिन्न घटनाओं और त्रासदियों के रूप में आएं।

बीच-बीच में अनेक संगठन जो जाति विशेष के लिए बने हैं और उसी जाति के लोग उसमे शामिल हैं से लगातार शामिल होने और दूसरे लोकतांत्रिक और जनवादी संगठनों में शामिल नहीं होने के उपदेश देते थे और एक कास्ट ओनरशिप में ले जाना चाहते थे । उनसे मुझे दूर रहना ही ठीक लगा। किसी समुदाय के प्रति भेदभाव मिटाने या दलित मुक्ति के लिए काम करने के लिए ज़रूरी नहीं कि जाति आधारित संगठन ही बनाये जाएं। मेरा अनुभव ये कहता है कि जब कोई भी आपकी जाति या धर्म के बारे में गलत बोले तो प्रतिक्रिया सिर्फ इस वजह से मत दो कि आप उस जाति या धर्म से संबंध रखते हो। अपनी बड़ी पहचान जो कि मानवता है उसके साथ जियो, उसके अधिकारों की बात करो।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।