भारतीय समाज में समानता के सूत्रधार बाबा भीमराव आंबेडकर के जन्मदिन पर विशेष

Posted by Ashish Kumar Yadav
April 14, 2017

Self-Published

भारत ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक विचारकों एवं दार्शनिकों को अपने इतिहास में पैदा किया है। इन राजनीतिक विचारकों और दार्शनिकों में निःसंशय ही डॉ. भीमराव आंबेडकर का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय समाज में इनके अनुदान को भुलाया नहीं जा सकता है। डॉ. आंबेडकर बहुमुखी  प्रतिभा के धनी थे जिन्होंने आधुनिक भारत को रचने में कभी न भुलाये जाने वाला योगदान दिया है। बाबासाहेब एक बहुत प्रभावी राजनीतिक चिंतक थे जिनके सामाजिक और राजनीतिक विचार विभिन्न विषय जैसे जाति प्रथा, अछूत प्रथा और राजनीतिक हस्तक्षेप से दबे लोगों को समाज में समान रूप का दर्जा दिलाना उन्हें सबसे ऊपर करता है।

तमाम अनगिनत बलिदानों के बाद कहा जा सकता है कि हम आजाद हैं लेकिन देश के हर नागरिक को उसका हक़ मिलने की लड़ाई आज भी जारी है। देश में सबको सामान अधिकार मिले, भारतीय समाज में सबको बराबरी मिले, ये सपना पहली बार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ही देखा था।

पंडित जवाहरलाल नेहरु ने एक बार उनके बारे में कहा था– डॉ॰ आंबेडकर को भारतीय हिन्दू समाज के तमाम अत्याचारी स्वरूपों के खिलाफ़ एक विद्रोह के प्रतीक रूप में याद किया जायेगा।  उन अत्याचारी स्वरूपों के खिलाफ़  जो आवाज उन्होंने बुलंद की है, उसने लोगों को झकझोर कर जागृत कर दिया है। यद्यपि उन्हें एक विवादास्पद व्यक्ति के तौर पर जाना जाता हो लेकिन वास्तविकता यही है कि उन्होंने देश के शासन-प्रशासन के उन मुद्दों पर बगावत की है जिन मुद्दों पर हर किसी को बगावत करनी चाहिए थी । डॉ॰ आंबेडकर इसलिए भारत के अति विशिष्ट लोगों में भी एक असामान्य एवं श्रेष्ठतम व्यक्तित्व थे।

डॉ. भीमराव राम जी आंबेडकर वर्तमान भारत के शिल्पियों में से एक थे। उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। वे भारतीय सामाजिक आन्दोलन के बड़े नेता थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर को अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने विश्व के सर्वोच्च 100 महान विद्वानों की सूची में स्थान दिया है। उन्हें भारतीय सर्वेक्षण में महान व्यक्तियों की सूची में भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। वे विश्वस्तर के विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, मानव विज्ञानी, वकील, समाज सुधारक और दलित एवं शोषित वर्ग के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष के प्रमुख नेता थे। वे ब्रिटिश भारत के मजदूर मंत्री और स्वतंत्र भारत के कानून एवं और सामाजिक न्याय मंत्री थे।  डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार, “डॉ॰ आंबेडकर न केवल लोकतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते थे, बल्कि वह राष्ट्रीय स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के भी समर्थक थे, वह सही अर्थों में राष्ट्रभक्त थे ”।

परन्तु आज उन्हें केवल दलितों का नेता कहकर उनकी महत्ता को कम कर दिया गया है। उन्हें जातियों की सीमा में बाँधना और दलित नेता कहना उनके व्यक्तित्व को कम कर आंकने जैसा है। जबकि बाबा साहब की कोशिश इन सब से ऊपर उठकर भारत के हर वर्ग को बराबरी और सम्मान का अधिकार दिलाने की थी। वे केवल दलितों के नेता नहीं थे बल्कि हर उस घटना के धुर विरोधी थे जो अमानवीय हो। वे इस बात से बखूबी वाकिफ थे कि देश की तरक्की के लिए देश के हर वर्ग को समानता का अधिकार मिलना बहुत जरूरी है। ये बात शत-प्रतिशत सच है कि उन्होंने दलित वर्ग पर ज्यादा ध्यान दिया क्योंकि वो उस समय सबसे ज्यादा दबे-कुचले और शोषित थे|

जब पूरा देश अंग्रेजों से लड़ रहा था तब वे सम्मान एवं बराबरी के जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे यह मानते थे कि अंग्रेज़ तो हमें आज़ादी दे देंगे परन्तु हम आन्तरिक गुलामी का क्या करेंगे? बाबा साहब को इस बात का एहसास बहुत पहले ही हो गया था कि भारत दो प्रकार की गुलामी से जकड़ा हुआ है। एक गुलामी थी अंग्रेजो की दमनकारी नीतियों से और दूसरी गुलामी जाति-वर्ण व्यवस्था से तिरस्कार की गुलामी।  अंग्रेजों की गुलामी से तो पूरा देश लड़ रहा था पर इस आन्तरिक जाति-वर्ण व्यवस्था से लड़ने के लिए और दलित व शोषित वर्ग के अधिकारों के लिए अकेले भीमराव आंबेडकर संघर्ष कर रहे थे।

डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म एक गरीब अछूत परिवार में हुआ था जिसके कारण उनका सारा जीवन संघर्षों में बीता। उन्होंने अपना सारा जीवन दलितों को उनके अधिकार दिलाने और हिन्दू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली एवं भारतीय समाज व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया| जैसा कि हिन्दू धर्म में समाज को चार वर्णों में विभाजित किया जिसमें शूद्रों को सबसे निचला दर्जा दिया गया जिनमें उन्हें मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। चूंकि डॉ. भीमराव आंबेडकर इसी वर्ण में पैदा हुए थे तो उन्होंने सारी विपदाएं झेली थी, इसलिए वह इस व्यवस्था के विरुद्ध आजीवन संघर्षरत रहे।

उनके अनुसार शिक्षा ही हर प्रकार कि समस्याओं का समाधान है। उनका ये नारा ‘शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो’ काफी प्रासंगिक है।

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