क्या मुसलमान समुदाय प्रॉब्लम्स से ज़्यादा मज़हब पर ध्यान दे रहा है?

Posted by Tasneef Haidar in Hindi, Society, Staff Picks
April 15, 2017

जब आप एक ऐसी दुनिया को देखते हैं जहाँ घर से बाहर निकलते ही ख़राब सड़कों, गन्दी नालियों और गलियों का एक पेचदार सिलसिला दूर तक चला गया हो तो आप सोचते हैं कि वो कौन सी बातें हैं जो इस मोहल्ले को साफ़ और अच्छा नहीं बनने देतीं, हर बार जब लोकल चुनाव होते हैं, तो ऐसी बातें की जाती हैं कि आप सोचने लगें कि इस मुल्क में मुसलमानों की जो बेसिक प्रोब्लम्स हैं, उनकी तरफ़ ध्यान क्यूँ नहीं दिलाया जाता।

समझ में आने वाली बातें या सामने की बातें ऐसे लोगों को क्यों समझ में नहीं आतीं जो बड़ी मेहनत के साथ WhatsApp और facebook पर इस्लाम के प्रचार में जुटे हुए हैं, जो दूसरों तक अपने मज़हब की बात पहुंचाने को भलाई समझते हैं, इस बात पर गर्व करते हैं कि उनके मज़हब में तस्वीर हराम है, इसलिए कोई उन पर पीके जैसी फ़िल्म नहीं बना सकता। दरअसल ये बातें सोचने पर मजबूर करती हैं कि मुसलमान कौन से वक़्त में जी रहे हैं।

मैं उन लोगों की तरह ये बातें नहीं कर रहा जिन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के बारे में दूर से सुना हो, बल्कि मैं एक ऐसे इलाक़े में रहता हूँ जो मुस्लिम बहुसंख्यक इलाक़ा है और जिसमें आप को जगह जगह ‘इस्लामिक स्कूलों’, ‘इस्लामिक झंडों’ ‘लाउड स्पीकरों’ और ‘मस्जिदों’ की बहुतायत मिलेगी। मेरा मक़सद किसी एक क़ौम को निशाना बना कर उसके मज़हब का मज़ाक़ उड़ाना भी नहीं है। हम अगर किसी बात को नहीं मानते तो ज़रूरी नहीं कि सब न मानें, लेकिन ये सोचना ज़रूरी है कि क्या मुसलमान ये समझते हैं कि भारत में उनको एक आने वाले बेहतर कल के लिए किस क़िस्म की सोच से छुटकारा पाना ज़रूरी है?

मैंने इस इलाक़े में दस से ज़्यादा साल गुज़ारे हैं और कभी नहीं देखा कि मस्जिदों में ‘ईव टीज़िंग’, ‘सफ़ाई’, ‘साउंड पोल्युशन’ ‘सेहतमंद एन्वॉयरन्मेंट’ ‘तलाक़ के सही तरीके’ या फिर ‘हिन्दुस्तान में मौजूद दूसरी क़ौमों के साथ घुल मिल कर जीने के मामलात पर रौशनी डाली गई हो’, मज़हब को यहाँ सिर्फ़ एक ऐसी दुनिया की तैयारी के लिए ज़रूरी समझा जाता है जिस की शुरूआत मौत के बाद होती हो मौत के इस चार्म ने लोगों को तेज़ रफ़तार से आगे बढ़ती हुई दुनिया से दूर किया है तो दूसरी तरफ़ उन पर मुल्ला एलिमेंट के दावों को मज़बूत किया है।

लोग अपनी छोटी छोटी मुश्किलों का दुनियावी हल ढूंढने के बजाय मज़हबी हल ढूंढते हैं, जिसकी वजह से वो एक तरफ़ इक्कीसवीं सदी में मज़ाक़ बनते जाते हैं तो दूसरी तरफ़ हुकूमत पर हर वक़्त एक क़िस्म का शक उन्हें दूसरी क़ौमों और ख़ुद हुकूमत से दूर करता जाता है। इन मामलात के सियासी हल ढूंढने के साथ ज़मीनी स्तर पर एक क़िस्म की तब्दीली लाने की ज़रुरत है ताकि लोग अपनी रूढ़ीवादी सोच से निकल कर नई दुनिया में सांस ले सकें। हुकूमत के अच्छे फ़ैसलों को क़ुबूल  करें और अपने बच्चों को एक सेक्युलर एजुकेशन की तरफ़ ले जाएँ जिससे उनके अंदर सोचने और समझने की सलाहियत पैदा हो सके और जो सबसे ख़ास बात है उसे समझें, अपने यहाँ मौजूद किसी ऐसी बात को, जो इक्कीसवीं सदी में रेलेवेंट नहीं है, बचाने या क़ायम रखने की कोशिश न करें।

मैं देखता हूँ कि हिंदुस्तानी मुसलमान पर्सनल लॉ बोर्ड के बचाओ में लगे हुए हैं, पहली बात तो हमें ये समझने की ज़रुरत है कि एक मुल्क में दस तरह के क़ानून नहीं चलते अगर आप को हुकूमत के किसी क़ानून से प्रॉब्लम है तो उसमें अमेंडमेंट की मांग का एक लीगल तरीक़ा है, अपनी बातें सामने रखने का एक सही तरीक़ा है, उसे अपनाएं। और अपनी नुमाइंदगी ऐसे लोगों के हाथ में न सोंपें जिन्हें ठीक से स्मार्ट फ़ोन इस्तेमाल करना नहीं आता है। जो पुरानी रिवायतों के इतने आदी हो चुके हैं कि वक़्त के दिए गए किसी भी नए इशारे से डरते हैं।

ये बात भी सोचने लायक़ है कि इस्लामिक हिस्ट्री या किसी इंडिविजुअल की आलोचना को मज़हब की आलोचना न समझा जाए। मेरे अपने मोहल्ले में पच्चीस से कम क्या मस्जिदें होंगी, उन में काम करने वाले इमाम हों या मोअज़्ज़िन, ये दस से पंद्रह हज़ार पर काम करने वाले ऐसे लोग होते हैं जो ज़्यादा तर सिर्फ क़ुरआन को ज़बानी रट कर नौकरियां हासिल कर लेते हैं, मैं ख़ुद ऐसे लड़कों को भी जानता हूँ, जिन्होने क़ुरआन हिफ़्ज़ तो कर लिया है यानी उन्हें वो अरबी में पूरा याद है मगर उनसे जब इस बात की तस्दीक़ कराना चाहो के फ़लाना बात क़ुरआन में लिखी है या नहीं तो वो कहते हैं कि हमें इस बारे में कुछ भी नहीं पता, वजह ये है कि वो मतलब जानते ही नहीं। तो इस सिस्टम में पैदा होने वाले ऐसे लोग क्या मुसलमानों की सोशल और पोलिटिकल प्रॉब्लम्स को हल करने की सलाहियत रखते हैं? बिलकुल नहीं, वो वही बातें आगे बढ़ाते हैं जो अपने से पहले लोगों से सुनते आये हैं। वो ऐसे इश्यूज पर बात ही नहीं कर सकते, जो नई दुनिया में जन्म लेते हैं क्यूंकि वो उसके बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं।

वो ये भी नहीं जानते कि बहुत सी मुस्लिम हुकूमतों ने इस्लामिक लॉज़ में अपने वक़्त के हिसाब से अमेंडमेंटस किये हैं, मुग़लों ने अपने शासन काल में कई बार गाय की हत्त्या पर पाबंदी लगाई है ग़ुलामी और जज़्ये जैसी लानतों को ख़त्म किया है, लेकिन प्रॉब्लम ये है कि इस क़िस्म के सेक्युलर बादशाह मुसलामानों की निगाहों में उतनी अहमियत नहीं रखते जितनी औरंगज़ेब जैसे कट्टरपंथ हासिल कर चुके हैं। वो ये भी नहीं जानते कि औरंगज़ेब ने कभी मज़हबी लड़ाई लड़ी ही नहीं, उसका मक़सद सिर्फ सत्ता बनाए रखना था, जिसमें वो अपनी ग़लत नीतियों की वजह न सिर्फ़ ख़ुद नाकाम रहा बल्कि पूरी मुग़ल सल्तनत को ही ले डूबा।

भारत में मुसलामानों को इतिहास के साए से बाहर आकर नए वक़्त की चमकीली धूप का सामना करना चाहिए, वो जिसे बदन झुलसा देने वाली धूप समझ रहे हैं, वो असल में हड्डियों के लिए ज़रूरी विटामिन देने वाली दवा भी साबित हो सकती है। मैं समझता हूँ कि एक नए सेक्युलर एजुकेशन सिस्टम की इस वक़्त भारत में मुसलमानों को बहुत ज़रुरत है, ताकि वो सभी के साथ चल सकें, मज़हब को दुनियावी मामलात से दूर रखने का हुनर जान सकें, आलमी मुस्लिम बिरादरी के झूठे तसव्वुर से बाज़ आएं और भारत के लोगों और यहाँ की हुकूमत पर भरोसा करना की हिम्मत दिखा सकें। अपने यहाँ मौजूद ग़ैर ज़रूरी मज़हबी क़ानून को डिफ़ेंड करने की कोशिश न करें और अपने मोहल्लों में उन बातों पर ज़्यादा ध्यान दें जिनसे उनका आज और आने वाला कल बेहतर हो सके। पर्दे, तलाक़ और बहुत से दूसरे सेंसेटिव इश्यूज़ पर साफ़ और दो टूक नीति अपनाएं और भारत में अपनी एक्सट्रीम छवी बनने देने से ख़ुद को बचाएं, इसी सूरत में मुसलमानों  का विकास ठीक तौर से मुमकिन है और यही वक़्त की ज़रुरत भी है।

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