भारतीय मुसलमान अपनी समस्याओं से ज़्यादा मज़हब पर ध्यान दे रहे हैं?

जब आप एक ऐसी दुनिया को देखते हैं जहां घर से बाहर निकलते ही खराब सड़कों, गन्दी नालियों और गलियों का एक पेचदार सिलसिला दूर तक चला गया हो तो आप सोचते हैं कि वो कौन सी बातें हैं जो इस मोहल्ले को साफ़ और अच्छा नहीं बनने देतीं, हर बार जब लोकल चुनाव होते हैं, तो ऐसी बातें की जाती हैं कि आप सोचने लगें कि इस मुल्क में मुसलमानों की जो बेसिक प्रॉब्लम्स हैं, उनकी तरफ ध्यान क्यूं नहीं दिलाया जाता

समझ में आने वाली बातें या सामने की बातें ऐसे लोगों को क्यों समझ में नहीं आतीं जो बड़ी मेहनत के साथ WhatsApp और facebook पर इस्लाम के प्रचार में जुटे हुए हैं, जो दूसरों तक अपने मज़हब की बात पहुंचाने को भलाई समझते हैं, इस बात पर गर्व करते हैं कि उनके मज़हब में तस्वीर हराम है, इसलिए कोई उन पर पीके जैसी फिल्म नहीं बना सकता। दरअसल ये बातें सोचने पर मजबूर करती हैं कि मुसलमान कौन से वक्त में जी रहे हैं।

मैं उन लोगों की तरह ये बातें नहीं कर रहा जिन्होंने सिर्फ मुसलमानों के बारे में दूर से सुना हो, बल्कि मैं एक ऐसे इलाके में रहता हूं जो मुस्लिम बहुसंख्यक इलाका है और जिसमें आप को जगह-जगह ‘इस्लामिक स्कूलों’, ‘इस्लामिक झंडों’ ‘लाउड स्पीकरों’ और ‘मस्जिदों’ की बहुतायत मिलेगी। मेरा मकसद किसी एक कौम को निशाना बनाकर उसके मज़हब का मज़ाक उड़ाना भी नहीं है। हम अगर किसी बात को नहीं मानते तो ज़रूरी नहीं कि सब न मानें, लेकिन ये सोचना ज़रूरी है कि क्या मुसलमान ये समझते हैं कि भारत में उनको एक आने वाले बेहतर कल के लिए किस किस्म की सोच से छुटकारा पाना ज़रूरी है?

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मैंने इस इलाके में दस से ज़्यादा साल गुज़ारे हैं और कभी नहीं देखा कि मस्जिदों में ‘ईव टीज़िंग’, ‘सफ़ाई’, ‘साउंड पोल्युशन’ ‘सेहतमंद एन्वॉयरन्मेंट’ ‘तलाक के सही तरीके’ या फिर ‘हिन्दुस्तान में मौजूद दूसरी कौमों के साथ घुल-मिलकर जीने के मामलात पर रौशनी डाली गई हो’, मज़हब को यहां सिर्फ एक ऐसी दुनिया की तैयारी के लिए ज़रूरी समझा जाता है जिसकी शुरूआत मौत के बाद होती हो मौत के इस चार्म ने लोगों को तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ती हुई दुनिया से दूर किया है तो दूसरी तरफ़ उन पर मुल्ला एलिमेंट के दावों को मज़बूत किया है।

लोग अपनी छोटी छोटी मुश्किलों का दुनियावी हल ढूंढने के बजाय मज़हबी हल ढूंढते हैं, जिसकी वजह से वो एक तरफ इक्कीसवीं सदी में मज़ाक बनते जाते हैं तो दूसरी तरफ हुकूमत पर हर वक्त एक किस्म का शक उन्हें दूसरी कौमों और खुद हुकूमत से दूर करता जाता है।

इन मामलात के सियासी हल ढूंढने के साथ ज़मीनी स्तर पर एक किस्म की तब्दीली लाने की ज़रूरत है ताकि लोग अपनी रूढ़ीवादी सोच से निकल कर नई दुनिया में सांस ले सकें। हुकूमत के अच्छे फैसलों को कुबूल करें और अपने बच्चों को एक सेक्युलर एजुकेशन की तरफ ले जाएं जिससे उनके अंदर सोचने और समझने की सलाहियत पैदा हो सके। जो सबसे खास बात है उसे समझें, अपने यहां मौजूद किसी ऐसी बात को, जो इक्कीसवीं सदी में रेलेवेंट नहीं है, बचाने या कायम रखने की कोशिश ना करें।

मैं देखता हूं कि हिंदुस्तानी मुसलमान पर्सनल लॉ बोर्ड के बचाव में लगे हुए हैं, पहली बात तो हमें ये समझने की ज़रूरत है कि एक मुल्क में दस तरह के कानून नहीं चलते अगर आप को हुकूमत के किसी कानून से प्रॉब्लम है तो उसमें अमेंडमेंट की मांग का एक लीगल तरीका है, अपनी बातें सामने रखने का एक सही तरीका है, उसे अपनाएं। और अपनी नुमाइंदगी ऐसे लोगों के हाथ में न सौंपे जिन्हें ठीक से स्मार्टफोन इस्तेमाल करना नहीं आता है। जो पुरानी रिवायतों के इतने आदी हो चुके हैं कि वक्त के दिए गए किसी भी नए इशारे से डरते हैं।

ये बात भी सोचने लायक है कि इस्लामिक हिस्ट्री या किसी इंडिविजुअल की आलोचना को मज़हब की आलोचना ना समझा जाए। मेरे अपने मोहल्ले में पच्चीस से कम क्या मस्जिदें होंगी, उन में काम करने वाले इमाम हों या मोअज़्ज़िन, ये दस से पंद्रह हज़ार पर काम करने वाले ऐसे लोग होते हैं जो ज़्यादा तर सिर्फ क़ुरआन को ज़बानी रट कर नौकरियां हासिल कर लेते हैं। मैं खुद ऐसे लड़कों को भी जानता हूं, जिन्होने क़ुरआन हिफ़्ज़ तो कर लिया है यानी उन्हें वो अरबी में पूरा याद है मगर उनसे जब इस बात की तस्दीक़ कराना चाहो के फलाना बात क़ुरआन में लिखी है या नहीं तो वो कहते हैं कि हमें इस बारे में कुछ भी नहीं पता, वजह ये है कि वो मतलब जानते ही नहीं।

तो इस सिस्टम में पैदा होने वाले ऐसे लोग क्या मुसलमानों की सोशल और पॉलिटिकल प्रॉब्लम्स को हल करने की सलाहियत रखते हैं? बिलकुल नहीं, वो वही बातें आगे बढ़ाते हैं जो अपने से पहले लोगों से सुनते आये हैं। वो ऐसे इश्यूज पर बात ही नहीं कर सकते, जो नई दुनिया में जन्म लेते हैं क्यूंकि वो उसके बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं।

वो ये भी नहीं जानते कि बहुत सी मुस्लिम हुकूमतों ने इस्लामिक लॉज़ में अपने वक्त के हिसाब से अमेंडमेंट्स किये हैं। मुगलों ने अपने शासन काल में कई बार गाय की हत्या पर पाबंदी लगाई है, गुलामी और जज़्ये जैसी लानतों को खत्म किया है। लेकिन प्रॉब्लम ये है कि इस किस्म के सेक्युलर बादशाह मुसलामानों की निगाहों में उतनी अहमियत नहीं रखते जितनी औरंगज़ेब जैसे कट्टरपंथ हासिल कर चुके हैं। वो ये भी नहीं जानते कि औरंगज़ेब ने कभी मज़हबी लड़ाई लड़ी ही नहीं, उसका मकसद सिर्फ सत्ता बनाए रखना था, जिसमें वो अपनी गलत नीतियों की वजह ना सिर्फ खुद नाकाम रहा बल्कि पूरी मुगल सल्तनत को ही ले डूबा।

भारत में मुसलामानों को इतिहास के साए से बाहर आकर नए वक्त की चमकीली धूप का सामना करना चाहिए, वो जिसे बदन झुलसा देने वाली धूप समझ रहे हैं, वो असल में हड्डियों के लिए ज़रूरी विटामिन देने वाली दवा भी साबित हो सकती है। मैं समझता हूं कि एक नए सेक्युलर एजुकेशन सिस्टम की इस वक्त भारत में मुसलमानों को बहुत ज़रूरत है, ताकि वो सभी के साथ चल सकें, मज़हब को दुनियावी मामलात से दूर रखने का हुनर जान सकें, आलमी मुस्लिम बिरादरी के झूठे तसव्वुर से बाज़ आएं और भारत के लोगों और यहां की हुकूमत पर भरोसा करने की हिम्मत दिखा सकें।

अपने यहां मौजूद गैर ज़रूरी मज़हबी कानून को डिफेंड करने की कोशिश ना करें और अपने मोहल्लों में उन बातों पर ज़्यादा ध्यान दें जिनसे उनका आज और आने वाला कल बेहतर हो सके। पर्दे, तलाक और बहुत से दूसरे सेंसेटिव इश्यूज़ पर साफ और दो टूक नीति अपनाएं और भारत में अपनी एक्सट्रीम छवी बनने देने से खुद को बचाएं, इसी सूरत में मुसलमानों  का विकास ठीक तौर से मुमकिन है और यही वक्त की ज़रूरत भी है।

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