मै मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का समर्थक हूँ? और मेरा जवाब लॉक किया जाये.

Posted by Mukund Verma
April 14, 2017

Self-Published

दुनिया में या देश में कहीं भी हुए किसी भी घटना पर हर किसी की अपनी एक राय होती है. मेरी भी होती है. कभी-कभी ये राय मैं सोशल मीडिया पर डालता हूँ, कभी नही डालता, या समय के अभाव के कारण नही डाल पाता. आज मेरे किसी मित्र ने मुझे इनबॉक्स कर के बताया की वो मेरी पोस्ट्स पढ़ते हैं और मैं हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा देता हूँ. (उन्होंने एक ख़ास वर्ग कहा था, लेकिन उनका इशारा किधर था, मुझे ये समझने में कोई परेशानी नही हुई, और मै खुद भी ऐसे गोल घुमा कर “एक ख़ास वर्ग” लिखना या पढना पसंद नही करता.) तो उनको मैं ये बात साफ कर के कह देना चाहता हूँ, की मै मुस्लिम, दलित या जाट, किसी भी तरह की तुष्टिकरण में “बिलकुल भी” यकीन नही रखता.

Image Source: http://skepticlawyer.com.au/

क्यूँ, क्यूंकि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ने अगर सबसे ज्यादा नुकसान किसी का किया है तो वो सिर्फ मुस्लिमों का किया है. उसके बाद अगला नंबर हिन्दुओं और बाकि धर्म, जाति के लोगों का हुआ है. हिन्दुओं का भय दिखा कर मुस्लिमों का वोट ले कर हर सरकार ने सिर्फ अपनी कुर्सी गरम की है. वो चाहे उत्तरप्रदेश हो या बिहार हो या कोई और राज्य. वोट लिया तो मुस्लिमों से लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी कठपुतली बना कर रखा. पिछले 2 दशकों को ही अगर मान ले तो मुस्लिमों की दशा में आखिर क्या सुधार किया है उन सरकारों ने. क्या उनके लिए कोई स्पेशल शिक्षा या रोजगार के साधन जोड़े हैं? क्या उन्हें स्पेशल हेल्थ बेनिफिट मिले हैं? क्या उन्हें कभी मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश भर भी की है? क्या उनके नाम से कोई स्कूल, हॉस्पिटल या सरकारी योजना ही शुरू की है? और चूँकि हिन्दूवो को तुष्टिकरण करने वाली सरकारों ने कभी वोट बैंक माना ही नही, तो उनका विकास और उनकी परेशानियाँ गयी तेल लेने. अगर विकास किया तो सिर्फ अपने परिवार का और अपनी जाती के लोगों का.

 

ये बात मुसलमानों को भी समझ लेना चाहिए. उन्हें सिर्फ वोटबैंक बन कर नही, अपने विकास में भी सरकार से हिस्सा माँगना चाहिए. मैंने कभी उन्हें अपनी शिक्षा, रोजगार या अधिकारों के लिए सड़क पर गुज्जर, जाटों या किसानों जैसा प्रदर्शन करते नही देखा. हाँ ट्रिपल तलाक वाले मसले पर उनकी चिंता दिखने लगती है. उन्हें भी अपनी इस मानसिकता से ऊपर उठाना होगा. जो पुराने जनरेशन के लोग हैं, उनकी बात चलो मै समझ सकता हूँ, की उनके ख़यालात पुराने हैं, लेकिन नए जनरेशन के मुसलमान युवाओं को आगे आना चाहिए और अपनी कौम के विकास के लिए लड़ना चाहिए, न की शरिया क़ानून के लिए. उनको ये बात समझनी होगी, की न तो आपको किसी हिन्दू से खतरा है और न ही आपका इस्लाम खतरे में हैं. तभी आप अपने आपको, अपनी कौम को इस तेज़ी से बढती दुनिया के साथ जोड़ पाएंगे, नही तो वोट तो आप हर साल किसी न किसी को देंगे ही, लेकिन बस वोटबैंक बन कर रह जायेंगे.

 

मेरे मित्र ने कश्मीर और वहाँ आजकल में हुए उस घटना पर भी प्रतिक्रिया माँगी जिसमे उग्र भीड़ ने जवानों को बीच सड़क पर मारा या मारने की और चोट पहुचने की कोशिश की है. उसका जवाब फिलहाल मैं इतना ही दूँगा की ऐसी भीड़ को सलाखों के पीछे डाल कर भारतीय कानून के मुताबिक कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए. लेकिन हमारी सरकार उनके साथ ऐसा कर नही सकती, इसके पीछे कई कारण है. उन पर भी कभी लिखूंगा, क्यूंकि कश्मीर पर लिखने को काफी कुछ है, जो लिखना बाकी है. आज के लिए बस इतना ही. मेरे सवाल पूछने वाले मित्र या किसी और को मुझसे कोई शिकायत है, कुछ कहना चाहते हैं, पूछना चाहते हैं, तो बिलकुल whatsapp या इनबॉक्स करें. मै काफी टाइम खाली बैठा रहता हूँ, आपकी बातों का बिलकुल जवाब दूँगा.

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