राजनीति मे परिवारवाद

Posted by Abhay Lakshya Chaudhary
April 6, 2017

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राजनीति मे सत्तासीन व्यक्ति से समाज सेवा त्याग तथा समर्पण की आशा की जाती है।लेकिन आज के युग मे ये त्याग तथा समर्पण परिवार तक ही सीमित रह गया है।जो व्यक्ति प्रतिभा के सहारे राजनीति मे प्रवेश करना चाहता है।तो उसे परिवार रूपी तालो से जूझना पड़ेगा। उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक ऐसी कोई राजनेतिक पार्टी नही रही जो परिवारवाद से अछूती रही हो,यहा तक की भ्रस्टाचार तथा ईमानदारी का बिगुल बजाकर दिल्ली की सत्ता पर विराजमान हुई आम आदमी पार्टी भी इससे नही वच सकी उनकी ही पार्टी के नेता तथा हरियाणा राज्य के प्रभारी नवीन जयहिंद जिनकी पत्नी स्वाति मालिवाल जो अरविन्द केजरीवाल के रिश्ते मे मौसी की लड़की लगती है उन्हें दिल्ली महिला आयोग का अध्यछ बना दिया गया।
यह आशचर्य का विषय है की 2014 के लोकसभा चुनावो मे 100 से अधिक ऐसे प्रत्याशी थे जो किसी न किसी बड़े राजनैतिक घराने से आते है। जिनमे दो तिहाई से अधिक जीतकर दिल्ली भी पहुच गए
परिवार को टिकट देने से राजनीतिक पार्टियो को एक फायदा ये भी होता है की कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद नही करेंगे और जिससे पार्टी मे गुटबाज़ी न होकर एकता बनी रहेगी और पार्टी टूटने का खतरा उत्पन्न नही होगा ।
चुनाव मे कांग्रेस उम्मीदवारों की बात करते है माधव राव सिंधिया की राजनैतिक दुकानदारी चल पड़ी ।माधव राव सिंधिया और राजेश पायलट का जो दबदबा गुना और दौसा मे है उसी के दम पर दुबारा ज्योति राधित्य सिंधिया और सचिन पायलट संसद तक पहुँच गए।। वहीँ दूसरी और भारतीय जनता पार्टी की बात उसने भी 50 से अधिक टिकट नाते रिश्तेदारो को दिए जिसमे संभवता प्रत्याशी जीतकर दिल्ली पहुँच गए
अब बात करते है कुछ क्षेत्रीय दलों की उसमें प्रमुख उत्तर प्रदेश की सत्ता पर विराजमान समाजवादी पार्टी जो समाज सेवा की बात करती है। पर उसने पाँच सीट जो लोकसभा लोकसभा चुनावों मे जीती वो पांचों उनके ही परिवार से हैं।
बही दूसरी और कांग्रेस भी सूबे मे दो सीटों पर सिमट गयी और वो सीटें क्रमश अमेठी तथा रायबरेली की रही जिनपर माता पुत्र ने जीत दर्ज की तथा बिहार मे लोक जनशक्ति पार्टी जिसने राजग के द्वारा अपने खाते मे आयी 7 सीटो पर चुनाव लड़ा जिनमेँ 6 सीटों पर जीत दर्ज की और उन 6 मे से 4 सीटों पर परिवार के लोग जीते जिनमे खुद पार्टी के मुखिया रामविलास पासवान हाजीपुर से तथा जमुई से उनके बेटे ने जीत दर्ज की।
उसी तरह ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ।राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्दरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह (झालाबार) जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र (बाड़मेर) महाराष्ट के पूर्व मुख्यमंत्री तथा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक के पुत्र मनोहर नाईक आदि
तात्पर्य हर पार्टी तथा राजनीति मे स्थापित नेता ने अपने परिवार को अपनी राजनेतिक विरासत सौपने मे कोई संकोच नहीँ किया है। राजनीति मे परिवारवाद एक विष की तरह घुल गया है। ये उन लोगोँ के लिए सर्पदंश की तरह घातक है जो अपनी प्रतिभा के दम पर राजनीति मे प्रवेश करना चाहते है।

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