लेखक के दिल में क्या छुपा है?

Posted by Bittu Meena AB
April 20, 2017

Self-Published

आप कही भी सफर में हो या फिर खुद को अकेला महसूस कर रहे हो तो आप सबसे पहले “किताब” ढूंढोगे, सिर्फ इसलिए की किताब ही इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती है और किताब ही तो है जो हमे सबकुछ सिखाती है लेकिन दुनिया कुछ भी माने मेरा पर्सनल मानना है की “किताबे सिर्फ ज्ञान दे सकती है, तुम्हारी सोच बदल सकती है, तुम्हारी जिंदगी में तुम्हारा आदर्श सथापित कर सकती है” लेकिन जो किताबो से बाहर निकलकर हम सीखते है वही तो जिंदगी है।

 

 

कुछ ऎसे भी लोग होते है जो अपनी जिंदगी के ऎसे किस्सों को किताब के पेपर पर उकेरते है और लेखक कहलाते है, कुछ लोग कवी सम्मेलनों में अपनी जिंदगी के तजुर्बो को गाते है तो दुनिया वाह-वाह तो बहुत करती है पर कभी उसके पीछे के दर्द को नही समझ पाती…

 

मुझे याद है रात के 2 बजे कवि सम्मेलन चल रहा था, उसी वक्त कवि सम्मेलन के सबसे बड़े नाम डॉ. कुमार विश्वास को पुकारा गया उन्होंने माइक थामते ही पहली शायरी बोली की:-

 

“मेरा जो भी तजुर्बा है तुम्हे समझा रहा हु मैं,

कोई लब छु गया था तब की अब तक गा रहा हु मैं…!

बिछुड़ कर तुमसे अब कैसे जीया जाये बिना तड़पे,

जो खुद ही नही समझा वही समझा रहा हु मैं…!!”

 

उसी वक्त पीछे मंच सञ्चालन कर रहे कवि के मुँह से निकल पड़ा:-

कुमार हमारे सामने हंसते बहुत हो..!

कही दिल पर चोट खाये हुए तो नही हो…??

 

 

मैं यह सब इसलिए नही लिख रहा की मैं लिख सकता हु, बल्कि सिर्फ इसलिए अवगत करा रहा हु की एक कवि/लेखक वही लिखता है जो वो महसूस करता है।

 

जिस दिन कवि/लेखक महसूस न करके सिर्फ सोचकर लिखेंगे उस दिन कोई नही पढेगा न गायेगा। और यदि एक लेखक या कवि प्यार पर या आक्रोश पर कुछ भी लिखे तो पढ़ने वाले बहुत शौक से पढ़ते है और अंत में वाह वाह या तालिया तो निकल ही पड़ती है, लेकिन वही वाह वाह करने वाला शख्स अगर लेखक को मिले और लेखक/कवि उसे ही प्यार के लिए या आक्रोश/आंदोलन के लिए बोले तो मजाक उड़ाया जाता है।

क्योकि हम सोचते है की हमने उनकी कविताये,लेख,कहानी,उपन्यास जो भी पढ़ा उसकी कीमत लौटा दी है किताब खरीदकर।

लेखको/कवियों को पढ़ने से कुछः नही होगा जब तक हम यही जान पाते की उनके अंतर्मन में क्या है और क्यों वो ऐसा लिखने पर मजबूर हुआ…

धन्यवाद

Bittu Meena AB

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