विकराल रास्ते पर दलित समाज

Posted by Jitendra Kumar Lakhiwal
April 6, 2017

Self-Published

देश दुनिया के हालात बदलते जा रहे हैं, व्यवस्थाएं बदलती जा रही हैं, सरकारों की मंशा बदलती जा रही है लेकिन दुर्भाग्य है कि दलित समाज न बदल रहा है न बदलना चाहता है। हजारों साल की गुलामी अभी भी रगों में बाकी है, दलित समझना ही नहीं चाहता है कि राजनेतिक दल उसका इस्तेमाल करते हैं और अपना काम पूरा होने के बाद दलितों को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। जिस तरह के हालात देखने को मिल रहे हैं, वे यह बता रहे हैं कि दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यकों को पीछे धकेला जा रहा है, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है, उनके अवसर खत्म किए जा रहे हैं, उन्हें गरीब और कमजोर बनाए रखने की साजिशें की जा रही है लेकिन यह समाज इस बात को समझ ही नहीं रहा है। पिछले ढ़ाई साल में जो हुआ हो या न हुआ हो, एक बात जोर शोर से उठाई गई कि आरक्षण खत्म हो, सभी लोगों को लगता है कि देश की तरक्की में अगर कोई बाधा है तो वह आरक्षण है, इन लोगों को कौन समझाए कि मंदिरों में किसका आरक्षण है, उद्योगों पर कौन कुंडली मार कर बैठा है, देश के तमाम संसाधनों पर किन लोगों का कब्जा है, किसान, मजदूर का शोषण कौन कर रहा है। आरक्षण तो कुछ लोगों का है लोकसभा और विधानसभाओं में, ये ही लोग घूमफिर कर चुनकर आ रहे हैं, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को इन लोगों ने विशाषाधिकार तंत्र में बदल दिया है। कोई एक नेता अगर व्यवस्था का अंग हो गया तो उसके बेटे, पोते, नाती, रिश्तेदार ही चुनाव लड़ेंगे, सत्ता के मजे लेंगे, आम आदमी के हाथ तो कुछ आ ही नहीं रहा, दलित तो इस व्यवस्था में कहीं है ही नहीं। ऐसा लगता है कि दलित वोट डालने और सोट खाने के लिए ही पैदा हुआ है। देश में आरक्षण विरोधी माहौल बनता जा रहा है और दलित समाज या उसके तथाकथित नेताओं पर कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा, सरकारी नौकरियां तो पहले ही खत्म कर दी गई, सरकार ने अपने काम ठेके पर दे दिए, बाकी कुछ बचा तो नेताओं और अफसरों ने अपने चहेतों को दे दिए, दलितों को क्या मिला, कुछ नहीं। नोटबंदी को अगर दलित समाज अच्छा बताए तो इससे बडी विडम्बना कुछ हो ही नहीं सकती, ऐसा लगता है जैसे दलितों के सोचने समझने की शक्ति ही नहीं रही। इसमें दलित समाज की कोई गलती मैं नहीं मानता, दलित वर्ग तो पहले से ही नासमझ था, इसे समझदार बनाने की जिम्मेदारी दलित नेताओं और अफसरों की थी, जब उन्होंने कुछ किया ही नहीं तो समाज को क्यों दोष दिया जाए। यह देखकर ताज्जुब होता है कि देश और समाज में जो परिवर्तन हो रहे हैं, सरकार जो फैसले कर रही है हैं उनको पढ़-समझकर उसकी नुक्ताचीनी करने का माद्दा किसी नेता या अफसर में है ही नहीं। दलित नेता अपने अपने टिकट और मंत्री पद की चिंता में लगे हैं तो दलित युवा सरकारी नौकरी के लिए मरे जा रहे हैं, कोई विचार नहीं, कोई वाद विवाद नहीं, कोई संस्कार नहीं, कोई विरोध नहीं, कोई आंदोलन नहीं, कोई हलचल नहीं, आखिर दलित समाज को हो क्या गया है। नब्बे के दशक तक एक तड़प देखने को मिलती थी, दलित नेताओं में भी और समाज में भी, यह तडप थी आगे बढऩे की, गुलामी की जंजीरों को तोडऩे की, कुछ कर गुजरने की तडप पूरे समाज को तरंगायित किए हुए थी लेकिन अब वह तड़प दिखाई नहीं दे रही। कई लोगों को लगता है व्हाट्सएप और फेसबुक से समाज में परिवर्तन आ जाएगा, इन भोले पंछियों को कौन समझाए कि समाज में जो हताशा और निराशा छाई हुई है वह इन आभासी (वर्चुअल) साधनों से दूर नहीं होगी। इसके लिए काम करना पड़ेगा, जूझना पड़ेगा इस व्यवस्था का, यह तय है कि संघर्ष पहले से ज्यादा बढ़ गया है। किसी भी सरकार के एजेंडे में दलित, पिछड़ा, मजदूर, किसान नहीं है, इन्हें हाशिए पर डाल दिया गया है, इनको हाशिए से उठाकर मुख्य मुद्दा बनाने के लिए बहुत बडे संघर्ष की जरूरत है, बडी प्लानिंग करनी होगी, दलितों को एकजुट होना पड़ेगा, बडा त्याग करना होगा, बहुत बलिदान करना होगा। अब व्रती, त्यागी, तपस्वी नेता समाज में ढूंढ़े से भी नहीं मिलते, जो भी वे अपनी अपनी स्वार्थपूर्ति में लगे हुए हैं। दलित समाज के कई युवा जिन्होंने अपने बाप दादा की जमीनें बेच दी वे पैसे के दम पर चुनाव लडऩा चाहते हैं, न समाज के दर्द को जानते हैं न उसके इलाज को। रिटायर्ड दलित अफसर चुनाव लडऩा चाहते हैं, राजनीतिक दलों में काम कर रहा प्रत्येक दलित कार्यकर्ता एमपी, एमएलए, प्रधान बनना चाहता है, जब ऐसे हालात हों तो समाज की चिंता कौन करेगा। बाबा साहेब अंबेडकर दलित समाज को जहां छोडकर गए थे, समाज उससे आगे नहीं गया, पीछे ही लौटा है, दलित पहले की अपेक्षा अंधविश्वासों में ज्यादा जकड़ा है, रूढि़यां और नई नई तरह की समस्याएं बढ़ गई हैं। मंदिर और धर्मशालाए बनाने में बेतहाशा पैसा खर्च किया जा रहा है, बाबा साहेब की एक बात याद आ रही है कि जिस दिन मंदिरों में जाने वाली भीड़ पुस्तकालयों में जाने लग जाएगी उस दिन देश व समाज की तकदीर बदल जाएगी। दुर्भाग्य है पूरा दलित समाज मंदिरों, भागवत कथाओं, सत्संगों, डेरों और देवरों में तो जाता है, पुस्तकालयों में नहीं जाता, ऐसे में विनाश तो तय है। समाज घोर अंधकार में है और पहले से ज्यादा है, हम पढ़े लिखे लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, हम सब मिल कर समाज जागरण का काम करते, समाज परिवर्तन का काम करते लेकिन विड़म्बना है कि हम पेट भरने और अपनी हैसियत बढ़ाने में लग गए, समाज को उसके हाल पर छोड दिया। अब कुछ ऐसा किया जाए कि समाज जागृत हो, राजनीतिक रूप से चेतन हो तो हम सबका जीवन धन्य हो जाएगा। यह कोई एक दिन का काम नहीं है, समय लगेगा, पीढि़यां लगेगी लेकिन शुरूआत तो अभी करनी होगी। हम मंदिर बनाने के बजाय पुस्तकालय बनाएं और उसमें अध्ययन करना सुनिश्चित करें, जैसे भोजन और नींद अतिआवश्यक काम हैं उनमें पढऩा भी अतिआवश्यक करें। देश दुनिया में हो रहे परिवर्तनों पर नजर रखें, सरकार जो फैसले कर रही है उनकी जानकारी रखें, उनसे हमें क्या लाभ हो रहा है और क्या नुकसान होगा इस पर चर्चा करें। अब जो हालात हैं उसमें दलितों का मनुवादी युग में जाना तय है, ऐसे में हम सबको महात्मा फूले बनना होगा, अंबेडकर बनना होगा, तब ही हम समाज को अंधेरी सुरंग से खींच कर ला सकते हैं वरना आने वाली पीढि़यां हमें माफ नहीं करेगी।

साभार – गोपाल डेनवाल, दर्द की आवाज  

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