वो सोचती है

Posted by Asiya Naqvi
April 8, 2017

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जब आवाज़ निकलने से पहले गला दबा दिया जाता है ,तब वो सोचती है!

जब पैरों में बंधी पायल बेड़ी बन जाती है , तब वो सोचती है!

आज बाज़ार में अकेली निकली है , तो सोच रही है!

यह कविता उन हज़ारों लड़कियों के लिए जिनकी सोच भी रोशनी की आड़ से डरती है।

वो सोचती है
बाज़ार किनारे वो सोचती हुई निकली है
डरती है कहीं कोई बाँह पकड़ रोक ना ले
वो डर रही है संगीन निगाहों से,
मोटर गाड़ियों की बेतहाशा रफ़्तार से
एक बँटुवा लिए भागी जा रही है,
अपने नाम की पुकार से डरती है
ऐसे बेसाख़्ता दौड़ते हुए सोचती है
मैं कितनी बुज़दिल हूँ
कितनी बे ग़रज़ और एेमक़
अपने हक़ से भाग रही हूँ!

सुनसान सड़क पर कभी निकली नहीं
भरी सड़क पर भाग रही हूँ
अम्मी कहती थीं वो डरते हैं,
हमारी ख़ामोश निगारी से,
परदे में खोलती आँखों से
सितमग़र डरता है, डरी हुयी कठपुतलियों से।

क्या मेरे घर के सरदाना डरते हैं?
मेरे अरमानों से, जज़्बे से ,
मेरी आज़ादी से डरते हैं?
ये सोचते ही ठोकर खाती है
कहीं कैदख़ाने के मुसाफ़िर आज़ादी की सैर किया करते करते हैं?
फिर उठ जाती है
गोया वो ख़ुद आज़ाद नहीं तभी क़ैद करते हैं!
डर उन्हें डराता है, इसीलिए डरातें हैं।
बस यही सोचती हुई वो चलती जा रही है
आज पहली बार अकेली बाज़ार निकली है
आज़ाद और बेपरवाह पहली बार निकली है
बाज़ार किनारे वो सोचती हुई निकली है।
ASIYA NAQVI

 

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