शुकुलपुर की ये अंजान कहानी . . .

*नेता हम ही हैं कल के*

ये कविता आपने बचपन में ज़रूर सुनी होगी। लेकिन ये कहानी है उत्तर प्रदेश के उस ज़िले की जहाँ से असल मायने में नेतागीरी शुरू होती है। देश की राजधानी दिल्ली ज़रूर है लेकिन वहाँ का सिंघासन या यूँ कहें *प्रधानमंत्री* की कुर्सी यहाँ से रिश्ता रखने वाले 8 नेता संभाल चुके हैं। बात है इलाहाबाद जिला के मेजा क्षेत्र की जहाँ हर घर का युवक और लड़का अपने में ही नेता है। यहाँ नेता तो बहुत हैं लेकिन जनता की समस्या और मदद करने वाले विलुप्त हैं या फिर बहुत ही कम हैं।


देश को आज़ाद कराया लेकिन परिवार रोटी के लिए परेशान।

  • स्वतंत्रता संग्राम सेनानी देवता दीन मिश्र ने देः को तो अज़ाद कराया लेकिन हालात कुछ ऐसे हुए की परिवार रोटी को परेशान है। 

पहले देश के लिए लड़ाई लड़ी फिर बेटे शशिकांत मिश्रा जो केंद्र सरकार के कर्मचारी थे उनके एक्सीडेंट के बाद उनके पेंशन और VRS की लड़ाई लड़ते लड़ते हार गए और इस दौड़ा भागी में वो भी चल बसे।

बेटा पेट की व्यवस्था करे या बड़े बाबू और नेताओ की पैरवी


सरकार बदल गयी लेकिन हालात नहीं बदले।

4 साल में सरकार तो बदल गयी लेकिन हालात अभी भी वही है। भाजपा से तो उम्मीद थी की न्याय होगा और एक हद्द तक ये दिख भी रहा था । लेकिन अंतिम जगह फ़ाइल आकर जो रुकी तो साल भर से रुकी ही है। एक साल पहले बताया था MD साहब के हस्ताक्षर के बाद पेंशन मिलने लगेगा लेकिन एक साल बाद भी वाही मामला अटका है। प्रदेश में भी सर्कार बदल गयी और अब मेजा की विधायिका से भी आस है लेकिन उनतक ये खबर पहुचे कैसे । 

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