संस्कारों की बातें

Posted by Harshit Tripathi
April 9, 2017

नमस्कार मित्रो आज के समयगत सन्दर्भ में आपके कानो में कही न कही एक शब्द अवश्य गूंजा होगा “संस्कार”…..  आज की बात की जाए तो ऐसा नही है की  मै खुद युवा पीढ़ी का नहीं | आप हीकी तरह मै भी एक साधारण युवा हूँ जिसकी सोच अपने शब्दों के माध्यम से सबके सामने रखना चाहूँगा ,हालांकि इन सब का इरादा ज्ञान प्रदान करना या किसी वर्ग विशेष की आलोचना नही अपितु एक खुली सोच ही है जो आपसे बांटना चाहता हूँ

“संस्कार क्या है”

प्रश्न ही इस प्रकार से है की इसका जवाब तो सटीक रूप से शायद कोई भी ना दे पाए ,खुद मै भी थोडा बहुत प्रयास करना चाहता हूँ ,साधारण शब्दों में कहू तो एक ऐसी मान्यता जो की इंसान को जानवर से अलग दर्शाए,शब्द भले ही साधारण हो पर अर्थ बड़ा ही गूढ़ समेटे हुए है,समझिएगा 

युवा पीढ़ी को देख कर वाकई में बुजुर्गो और हमारे देश को आजादी दिलाने वाले क्रांतिकारियों के मन में आज भी यही   टीस है की देश को उन्होंने अंग्रेजो से आजाद करवाया,गुलामी से नही 

हालांकि मेरा यह मानना है की बुरा तो कुछ भी नही होता है जैसा की आज की पीढ़ी तथाकथित यंग जनरेशन की      अवधारणा का ढोल पीटती है,जहा हमारी परम्पराओं की बात होती है,युवा बस परम्पराओ का बहिष्कार करते है रुढियो के नाम पर 
हालांकि मै समझता हूँ की रुढियो और परम्पराओं में इन्हें शायद फर्क भी पता नही होगा 


कुछ वैज्ञानिक सोच भले ही हो जहां तक की सही है लेकिन पाश्चात्य सोच को स्थान देकर हम अपनी शान नही अपितु  मानसिक गुलामी ही प्रदर्शित करते है 

जैसा की पहले आपको बताया था की गलत तो कुछ भी नही होता बस आपकी सोच पर निर्भर करता है उसका सही या  गलत होना,लेकिन उसके लिए आपकी सोच भी सही होनी चाहिए ,आपका मन्तव्य अच्छा हो तभी आप सही मायनों में आदर्श व्यक्तित्व की ओर कदम बढा पाते है ,

मै ये नही कहता की मांसाहार ,शराब,ड्रग्स ,लिव इन,अफेयर,आदि सब बुरा है ,लेकिन क्या ये सब कर लेने के बाद आप अपने अंदर के इंसान को जानवर बना हुआ देख सकेंगे?जरा सोचिएगा


मान्यताओं को ठुकराना वह भी सिर्फ फिल्मो के घटिया किस्म के हीरोज की अपील पर!!!


जबकि ये सब बोलने वाले हीरो भी खुद खुदा की शरण में जाते है ,मन्दिरों मस्जिदों के दरवाज़े खटखटाते है,अरे वो क्या बहस करेंगे मान्यताओं पर ,जिनकी फिल्मे भी त्योहारों के दिन रीलिज की जाती है 

मेरा मानना ये है की अनुकरण करो पर उसमे कुछ तर्क संगत भी हो तब न ?      

सब भेड़ चाल है ,अगर आप भी इसी लाइन में चल रहे है तो सम्भलिए जनाब आईने में देख लीजिये खुद को ,की कही आपका मूल स्वरूप परिवर्तित तो नही हो रहा !!

मेरा मानना ये है की ये सब आपके पेरेंट्स निर्धारित करते है की आपके लिए क्या सही है 

जो आपके लिए सही है अआपके पेरेंट्स की नजर में ,व्ही कीजिये लेकिन सोच समझ कर 


बहरहाल इतना ही ,फिर किसी दिन मिलूँगा आपसे संस्कारों की बातें