हमें भाषाई अवसाद पर भी ध्यान देना पड़ेगा???

Posted by कुमार रोहित
April 8, 2017

Self-Published

हम सभी डिप्रेशन या अवसाद के विभिन्न रूपों से परिचित हैं लेकिन भाषाई अवसाद इनमें से सबसे नया व अलग है क्योंकि इसकी अभी तक परिभाषा ही स्थापित नहीं हो पायी है और जो लोग इसकी वजह से कुछ बुरे की सोचते भी हैं, तो वे इसका नाम नहीं ले पाते हैं क्योंकि उन्हें समाजनिकाला का डर रहता है।

भाषाई अवसाद एक ऐसा विषय है जिसके बारे में लोग आज भी अंजान है और इसकी कई वजहें भी हैं जो लोगों को कई दफा इससे मुँह मोड़ने के लिये मजबूर कर देती है लेकिन यह चीज उन कई अनगिनत कारणों में भी शामिल है जिसके कारण हममें से कई अवसादग्रस्त हो जाते हैं और इसकी परिणीति कभी-कभी आत्महत्या (मामला1, मामला2) तक हो जाती है।

अवसाद के बारे में हम सभी ने अंतर्जाल (इंटरनेट) से काफी सूचनाएँ प्राप्त करके इसके बारे में काफी कुछ जान लिया है लेकिन इससे जुड़ी अधिकतर सामग्रियाँ अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं और शायद यही वजह है कि हमारे लोग आज भी अवसाद व इससे जुड़ी विसंगतियों से अंजान हैं।

इसके अलावा हमारे पास उचित माहौल भी उपलब्ध नहीं है जो लोगों को खुलकर बोलने का मौका दे। हमें हमेशा हमारी सफलताओं से आँका जाता है और शायद यही वजह है कि हम कहीं भी खुलकर नहीं बोल पाते हैं। हम कई दफा भूल जाते हैं कि हम भी आखिरकार एक इंसान ही हैं।

कड़ी1: मेरी डिप्रेशन की कहानी, जब दुनिया मेरी बीमारी को पागलपन समझती थी

कड़ी2: Let’s Get It Straight: People Living With Depression Aren’t ‘Crazy’

कड़ी3: Here’s How Going Through A Near-Death Experience Pulled Me Out Of Depression

भाषाई अवसाद एक ऐसी मानसिक अवस्था है जब कोई व्यक्ति किसी भाषा की अज्ञानता या नासमझी को अपनी कमजोरी मान लेते हैं और यह धीर-धीरे मानसिक कुंठा तक बन जाती है। हमारे देश में कइयों ऐसे अनाम मामले हैं जहाँ पीड़ित ने सिर्फ इसलिये आत्महत्या किया क्योंकि वे अंग्रेजी से सुपरिचित नहीं थे या अंग्रेजी किताबों को पढ़ नहीं पाते थे या कक्षा में पाठ्यक्रमिक सामग्रियों को सुनकर (अंग्रेजी में) भी समझ नहीं पाते थे। इन मामलों में हमारी पुलिस व्यवस्था ने भी इन्हें आत्महत्या के अन्य मामलों की तरह ही अप्राकृतिक मौत मानकर रफा-दफा कर दिया।

यह तो अच्छा है कि भाप्रौस (अंग्रेजी: आइआइटी) परिषद ने इस बात को समझा और हिंदी विद्यार्थियों के लिये हिंदी कोष्ठ की स्थापना की मंजूरी दे दिया लेकिन इसे हमारी सभी जरूरतमंद भाषियों तक पहुँचाया जाना चाहिये।

मैं किसी भी भाषा के विरूद्ध नहीं हूँ लेकिन यह भी एक अनाम तथ्य है कि इनमें से कुछ लोगों ने सिर्फ इसलिये आत्महत्या किया क्योंकि वे अंग्रेजीआधारित शिक्षण व्यवस्था से त्रस्त थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस समस्या से कैसे निपटा जाये और उन्होंने अंग्रेजी से मित्रता करने के बजाय अपनी जिंदगी को त्यागना बेहतर समझा।

हमारे देश में ऐसे भी परंपरा रही है कि किसी भी मामले को इतना प्रचारित कर दो कि वही अगले चार-पाँच दिनों तक हमारे दिमाग में बसा रहे लेकिन हमारी व्यवस्था ने इसे जगह देने के बजाय इसे नकारना ही बेहतर समझा।

मुझे समझ नहीं आता कि जब हमारे देश में लोगों को भाषाई स्वतंत्रता हासिल है तो वही भाषाई स्वतंत्रता उन्हें शैक्षिक स्तर पर क्यों नहीं मिल पाती है। अंग्रेजी जानना हमारे देश में एक फैशन सा हो गया है और जो लोग इसे अच्छी तरह जानते हैं, वे गौरवान्वित होते हैं लेकिन कई दफा इससे उनलोगों को मानसिक आघात भी पहुँचती है जो अंग्रेजी नहीं जानते हैं।

इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिये हमारे देश में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये जो सुनिश्चित करे कि किसी के साथ किसी भी तौर पर मानसिक पक्षपात न हो। और खासकर भाषाई तौर पर तो बिल्कुल नहीं क्योंकि भाषा लोगों को जोड़ने के लिये होती है। भाषा दो संस्कृतियों का मिलन है जैसे हमारे यहाँ विवाहों में दो व्यक्तियों (दुल्हन-दुल्हा) के साथ-साथ दो परिवारों का भी मिलन होता है।

अंग्रेजी जानना या न जानना लोगों का हक है और इसे न जानने का परिणाम अवसाद तो बिल्कुल ही नहीं होना चाहिये। हमें लोगों को जागरूक करना पड़ेगा कि अंग्रेजी न जानने से वे कहीं से भी गवार नहीं सिद्ध हो जाते हैं। मैं मानता हूँ कि आज के वैश्विक परिदृश्य में हम अंग्रेजी या इसके अस्तित्व को नकार नहीं सकते हैं लेकिन इसकी एक परिभाषित सीमा तो होनी ही चाहिये।

हममें से कुछ लोग बोल सकते हैं कि अंतर्जाल पर उपलब्ध सूचनाएँ अंग्रेजी में ही हैं और हमारी भाषाओं के पास इनका विकल्प अभी भी मौजूद नहीं है लेकिन यह भी गौर करनेवाली बात है कि तकनीक या प्रौद्योगिकी मस्तिष्क आधारित होती है। इसका किसी भी भाषा से लेना-देना नहीं होता, यद्यपि इसे परिभाषित करने के लिये किसी माध्यम की जरूरत होती है और यही से हमारी भाषाओं की मौजूदगी शुरु हो जाती है।

और मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हम अभी भी अपने सभी भाषाओं पर कार्य करके ऐसी सामग्रियों की बाढ़ यानि अधिकता ला सकते हैं।

इसके लिये मैं भोपाल के अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विवि को धन्यवाद कहना चाहूँगा जो हिंदी में अभियंत्रण (इंजीनियरिंग) की शिक्षा दे रहा है। मैं मानता हूँ कि यहाँ भी कई विसंगतियाँ मुँह पसारे खड़ी है लेकिन समस्याएँ कहाँ नहीं हैं। हम अपने घरों से निकलते ही समस्याओं को न्यौता दे जाते हैं, तो इसका मतलब यह तो कतई नहीं होना चाहिये कि हम घरों से निकलना ही बंद कर दे???

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