हिंदू राष्ट्रवादी मित्रों के नाम एक ख़त

Posted by garvit garg
April 6, 2017

Self-Published

मेरे प्रिय मित्र,

में तुम्हे यह पत्र इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आजकल हम लोग ज्यादा बातचीत नहीं करते है, या बातचीत करते भी है तो भावुक हो जाते है और एक दुसरे को भला बुरा कहने लगते है. में बहुत दिनों से ये लिखने की कोशिश कर रहा हूँ. पहले मैंने सोचा कि तुम्हे बहुत भला-बुरा कहूँगा, तुम्हे गलत साबित करने कि कोशिश करूँगा, पर उसका कोई ख़ास फायदा होने वाला नहीं है. हमारे बीच में जो दीवार खड़ी हो गई है वो अब तर्क-वितर्क से मिटने वाली नहीं है. अभी शायद तुम मेरा यह पत्र न पढना चाहो पर कभी तुम्हारा गुस्सा शांत हो तो मेरी बात सुनने की कोशिश करना.

 

मुझे पता है कि आजकल तुम बहुत गुस्सा हो, बहुत नाराज हो, शायद अपने आप को ठगा ठगा सा भी महसूस करते हो. आखिर इतनी पुरानी सभ्यता होने के बावजूद हमारे साथ सैकड़ों वर्षों से कुछ अच्छा नहीं हुआ है. हमनें हजारों सालों पहले वाले अपने स्वर्णिम काल के बारे में सुना है, और फिर उसके पतन के बारे में भी. कितना हसीन ख्याल लगता है न कि हम फिर से अपनी सभ्यता को ऊँचाई पर पहुंचा दें. और कितना अच्छा इरादा है पर इसके लिए शायद तुम जो रास्ता चुन रहे हो वो इतना हसीन नहीं है.

में जानता हूँ कि मेरी बात सुनना तुम्हारे लिए कठिन है. में तुम्हे उन लोगों की तरफ खड़ा हुआ प्रतीत होता हूँ जिन्होंने इस देश को गर्त में पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, जिन्होंने आजादी के बाद सेकुलरिज्म का ठेकेदार बनकर इस देश को लूटा है, भ्रष्टाचार और अपराधिकता की सारी हदें पार की है, तुम्हे बहुत सारी परेशानिंयों में जीने के लिए मजबूर किया है. इस देश को पिछले साठ साल से वही लोग चला रहे थे और वो हमेशा ‘सेक्युलर’ बनने का ढोंग कर बच निकलते है. में जानता हूँ कि तुम उन लोगो से भी नाराज़ हो जो बुद्धिजीवी होने का ढोंग करते है, जो सालों तक सत्ता के तलवे चाटते रहे. जो दो चार किताबें पढ़कर अपने आप को तुम से ज्यादा समझदार मानते है और अब बौखलाकर अख़बारों में तुम्हे पागल साबित करने वाले लेख लिखते फिर रहे है.

तुम्हारी नाराज़गी जायज है, हमने सालों तक अंग्रेजों को झेला और फिर जब आज़ादी मिला तो कुछ लोगों ने देश बाँट दिया. उसके बाद भी तुमने इतने सालों तक सेक्युलर लोगों को सत्ता में रखा. उन लोगों ने तानाशाह बंनने की कोशिश की, जीतने के लिए गुंडों से लेकर हत्यारों से हाथ मिलाया, और अब भी वो इसी तर्क पर जीतने की उम्मीद करते है कि वो तथाकथित रूप से सेक्युलर है. तुम्हारी नाराज़गी से मेरी पूरी सहमती है.

पर मेरी कुछ शिकायतें भी है मित्र. तुम बहुत नफरत करते हो. इतनी नफरत के सहारे तुम एक अच्छा समाज बना नहीं पाओगे. इस दुनिया में तीन में से एक और इस देश में पांच में से एक व्यक्ति मुसलमान है, कभी सोचना कि तुम कितने सारे लोगों से नफरत करते हो. तुम लोगों को बिना जाने हुए उनसे नफरत करते हो. तुम बहुत जातिवादी भी हो मित्र. हमारा समाज कभी भी एक आदर्श समाज नहीं था, हमने अपने ही लोगों पर अनगिनत जुल्म ढाएं है, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक रहने पर मजबूर किया है. तुम्हे एक सीढ़ीनुमा समाज में रहने की आदत पड़ गई है मेरे मित्र. तुम अपने आप को जन्म के आधार पर दूसरों से बेहतर मानते हो, इसलिए तुम्हे दिक्कत हो जाती है जब कल को जो तुम्हारे आँख नीची करके चलने वाले आज तुम्हारे सामने सर उठाकर बात करते है.

तुम डरते भी हो मित्र. तुम संघठन से डरते हो. तुम्हे हमेशा लगता है कि मुसलमान इकट्ठे रहते है, दलित भी इकट्ठे हो जाते है तो हम लोग क्यों नहीं. पर मेरे मित्र, इस संघठन का जवाब तुम्हारे गुस्से से कुछ घंटे के लिए इकठ्ठा भीड़ नहीं है. भीड़ संगठन नहीं होती. भीड़ से एकता नहीं आती है. तुम बड़े इनसिक्योर भी हो. तुम्हे लगता है कि आने वाले समाज में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं बचेगी, पर ऐसा नहीं है मित्र.

तुम्हारा महिलाओं के बारे में भी कुछ ख़ास अच्छा ख्याल नहीं है मित्र. तुम दहेज़ जैसी कुरीतियों के बोझ तले दबे हुए हो. तुम तरक्की करती महिलाओं के सामने बड़ा छोटा महसूस करते हो, तुम उन्हें कैद करना चाहते हो. मेरे मित्र, तुम्हे यह समझना होगा कि अब महिलाओं के सर उठाकर जीने का समय आ गया है. वरना तुम अफगानिस्तान बनकर रह जाओगे.

मेरी तुमसे यह भी शिकायत है कि तुम अपने बच्चों को बिल्कुल भी आज़ादी नहीं देते हो. कुछ नया करने की, प्यार करने की, अपनी मर्ज़ी का जीवनसाथी चुनने की, सेक्स पर बात करने की. तुम एंटी रोमियो स्क्वाड का समर्थन करते हो. आज के समय में तुम यह सब करकर एक बुझदिल जनरेशन पैदा कर रहे हो. तुम अमरीका बनना चाहते हो, इजराइल बनना चाहते हो, जापान बनना चाहते हो, पर वो सब कुछ तुम्हे बिना अपने आप को बदले हुए चाहिए. तुम व्हात्सप्प और फेसबुक चलाने लगे हो तो तुम मॉडर्न नहीं हो गए हो. सबके हाथ में स्मार्टफ़ोन आते ही कोई देश विकसित नहीं हो जाता, उसके लिए बहुत पेनफुल प्रोसेस से गुज़ारना पड़ता है, अपने बने बनाय विचारों को चैलेंज करना पड़ता है.

अभी इतना ही लिखूंगा मित्र. हम अपने बीच का कडवापन धीरे-धीरे मिटा लेंगे. बस तुम भीड़ से दूर रहना. तुम्हारे गुस्से से बनी भीड़ कभी-कभी जानलेवा हो जाती है. तुम तो सबको शाकाहारी बनने की सलाह देते हो तो उम्मीद है कि तुम्हे लड़ाई झगड़ा कम पसंद होगा. में फिर दोबारा चिट्ठी लिखूंगा. अगर मेरी बातों से असहमत हो तो जवाब जरूर देना.

तुम्हारा ही एक हमवतन,

गर्वित

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