नॉर्थ ईस्ट की संस्कृति पढ़ना हर स्कूल में हो सकता है कंपलसरी

Posted by Youth Ki Awaaz in Art, Education, Hindi, Staff Picks
April 10, 2017
नीदो टानिया

हाल ही में, बेंगलुरू में अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र हिगिओ गुंगटे को अपने ही मकान मालिक द्वारा नस्लीय हमले का सामना करना पड़ा। करीबन 9 0 मिनट तक मकान मालिक ने गुंगटे के साथ मारपीट की और नस्लीय टिप्पणी की। कुछ ऐसा ही 2014 में हुआ जिसमे नस्लीय हमले में दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश के एक छात्र निदो टानिया की हत्या कर दी गई थी।

यह कुछ ऐसे खबर हैं जो सामने आ पाएं लेकिन पूर्वात्तर से आयें छात्रों और कामगारों के लिए नस्लीय भेदभाव एक प्रमुख मुद्दा है। भारत के अन्य राज्यों में नस्लीय टिप्पणी पूर्वोत्तर के छात्रों की दिनचर्या सी बन गई है। इस प्रकार के भेदभाव की मुख्य जड़ें पूर्वोत्तर राज्यों का भारत के अन्य हिस्सों से एकाकीपन और पूर्वोत्तर संस्कृति के बारे में जागरूकता की कमी है।

इसी मुद्दे पर निजी सदस्य विधेयक “शिक्षा संस्थानों में पूर्वोत्तर संस्कृति का अनिवार्य अध्यापन, 2017” एक नई दिशा दे रहा है। यह विधेयक हाल ही में पूर्वी अरुणाचल के सांसद निनोंग एरिंग ने लोकसभा में प्रस्तुत किया है। और अगर यह विधयेक लागू होता है तो पूर्वोत्तर राज्यों के लोगो पर हो रहे नस्लीय भेदभाव को जड़ से खत्म करने में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।

इस विधेयक की नीव बेजबुरुआ समिति द्वारा जारी रिपोर्ट पर आधारित है। जब 2014 में टानिया की मौत के बाद पूर्वोत्तर लोगों पर हो रहे नस्लीय भेदभाव पर बहस शुरू हुई थी, इसके तुरंत बाद सरकार ने एम.पी. बेजबुरुआ के आधीन एक कमेटी का गठन किया। रिपोर्ट के अनुसार यह बात सामने आई की देश के आठ पूर्वोत्तर राज्यों जैसे की असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, सिक्किम, नागालैंड, मेघालय और मिजोरम के लोगों के साथ देश अन्य राज्यों के जाने पर भेदभाव होता है।

साथ ही रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया कि पूर्वोत्तर राज्यों से 2 लाख से ज्यादा लोग 2005 से 2013 के बीच दिल्ली आए हैं और उनमें से करीब 86 प्रतिशत लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा यह पाया गया कि जब पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव की बात आती है तो मेट्रो शहरों में दिल्ली में हालात सबसे ज्यादा खराब है। रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों की संस्कृति के बारे में जागरूकता की कमी है और साथ ही गलत धारणाए है। जिसके कारण अन्य भारत के राज्यों में रह रहे पूर्वोत्तर के लोगो में असुरक्षा की भावना मौजूद है। जब पूर्वोत्तर राज्यों के लोग विभिन्न शहरों, विशेषकर मेट्रोपॉलिटनों जैसे कि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में काम और पढ़ाई के लिए जाते हैं, तो न केवल उन्हें कलंकित किया जाता है बल्कि नस्लीय शोषण और हिंसक हमलों का सामना करना पड़ता है।

इस प्रकार, यह विधेयक कम आयु से ही पूर्वोत्तर संस्कृति के बारे में जागरुकता पैदा करने की परिकल्पना करता है। यह स्कूलों में पाठ्यक्रम के भाग के रूप में पूर्वोत्तर शिक्षा शामिल करने की बात करता है। जिसमें पूर्वोत्तर शिक्षा का अर्थ है पूर्वोत्तर भारत का इतिहास, लोकाचार और संस्कृति का ज्ञान, और जिससे भारत के अन्य हिस्सों से लोगों में पूर्वोत्तर सभ्यता के प्रति संवेदना बढ़ाई जा सके।

इसके अलावा, यह विधेयक एक सलाहकार परिषद स्थापित करने की बात करता है जिसमें पूर्वोत्तर भारत के इतिहास और संस्कृति का विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव वाले विशेषज्ञ शामिल होंगे। साथ ही यह परिषद विधयेक के प्रावधानों जैसे की पाठ्यक्रम तैयार करने और शिक्षको का प्रशिक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए उत्तरदायी होगा।

इस प्रकार यह विधेयक पूर्वोत्तर राज्यों के लोगो के प्रति प्रचलित पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को दूर करने में मदद करेगा। साथ ही, उत्तरपूर्व संस्कृति के अधयन्न से न केवल पूर्वोत्तर राज्यों का एकाकीपन कम होगा साथ ही इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोड़ेगा। इसलिए इस विधेयक का उद्देश्य है कि सभी प्राथमिक और माध्यमिक शैक्षणिक संस्थानों में पूर्वोत्तर संस्कृति का अध्ययन अनिवार्य किया जाये और इसे स्कूल के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा बनाया जाये।

हालंकि निजी सदस्य विधेयक को एक अधिनियम बनने की संभावना बहुत कम होती है, अगर यह बिल लागू हो जाता है, तो यह भारत में पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव पर काबू पाने के लिए एक प्रमुख कदम होगा।

फोटो आभार-फेसबुक पेज Beauty of North East

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