निचली जाति के आदिवासियों से जो किया मेलजोल तो जुर्माना होगा 1000 रूपए

Posted by 101reporters in Caste, Hindi, Staff Picks, Stories by YKA
April 21, 2017

21 फरवरी 2017 को देओभोग छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय राजगोंड समाज ने एक तुगलकी फरमान ज़ारी किया था। इसमें समुदाय की ऊंची जाति के लोगों को, निचली जाति के लोगों के साथ उठने-बैठने, सामाजिक मेलजोल और किसी भी तरह के दोस्ताना सम्बन्ध ना रखने को कहा गया है।

यह सीधे तौर पर भारत के संविधान के आर्टिकल 14 से लेकर आर्टिकल 18 तक का उल्लंघन है, जिसमें भारत के हर नागरिक को जाति, समुदाय और धर्म से परे सामान नागरिक अधिकार दिए गए हैं।

आमतौर पर ये माना जाता है कि आदिवासी समुदायों में जाति व्यवस्था का कोई वजूद नहीं है। लेकिन कुछ समाजशास्त्रियों का कहना है कि अपने मूल स्थान से विस्थापित हो चुके आदिवासी समुदायों में समय के साथ जाति व्यवस्था जैसी कुप्रथाएं आ गयी हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य में ही ऐसे 20 आदिवासी समुदाय हैं, जो विभिन्न जातियों में बंट चुके हैं। राजगोंड समाज की बात करें तो इनमें अहीर (पशुपालक), अगरिया (लोहार), धूलिया (ढोल बजाने वाले) और प्रधान (गायक और कवि) निचली जातियों में आते हैं। वहीं शर्मा और पुजारा ऊंची जातियों में आते हैं।

रायपुर से करीब 220 किलोमीटर की दूरी पर जंगलों के बीच बसे देओभोग में छुआछूत का बोलबाला है और ऊंची जातियों की हर इच्छा को एक फरमान की तरह निचली जातियों द्वारा माना जाता है। हालांकि करीब 42,000 की आबादी वाले राजगोंड समुदाय में निचली जातियों की आबादी लगभग 20,000 है।

देओभोग की सामाजिक संरचना की बात करें तो विभिन्न जातियों के लोग एक-दुसरे से दूरी बनाकर रखते है और एक-दुसरे के मसलों में दखल नहीं देते हैं। हालांकि इस आदिवासी समुदाय में जाति की व्यवस्था शुरू से ही मौजूद है लेकिन ऊंची जातियों के इस फरमान ने अलग-अलग जातियों में बीच के दोस्ताना संबंधों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

निचली जातियों के लोगों को ऊंची जातियों की शादियों या किसी अन्य कार्यक्रम में शामिल होने की इजाज़त नहीं है। सार्वजनिक जगहों पर पानी भरने के वक्त निचली जाति के लोगों को ऊंची जाति के लोगों से दुरी बनाकर रखनी होती है, साथ ही अगर कहीं उन्हें खाना दिया जाता है तो उसके लिए अलग बर्तनों की व्यवस्था है जिन्हें उन्हें धोना भी होता है।

यह फरमान आदिवासी समाज अंतरराज्य कमिटी, केंद्र सभा झारगांव और चारघर द्वारा बनाए गए 83 नियमों में से एक है। नियम संख्या 61 जिसमे इस फरमान के बारे में बताया गया है, के अनुसार इस नियम का पालन ना करने वाले को 1000 रु. का जुर्माना भरना होगा।

इस इलाके में छुआछूत और जाति व्यवस्था किस कदर मौजूद है, इसका अंदाज़ा इसी से लग जाता है कि ऐसे आदिम आदेशों के बावजूद समाज में किसी भी तरह का तनाव भी नहीं फैला है। हालांकि इस फरमान के आने के बाद और हरि भूमि के रिपोर्ट करने के बाद 22 फरवरी को 101Reporters.com के पत्रकार धनंजय समेत निचली जाति के कुछ युवाओं ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सीनियर सुप्रिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के समक्ष, एफ.आइ.आर. दर्ज करने के लिए एक एप्लीकेशन दाखिल की।

मानव समाज एन.जी.ओ. के प्रेसिडेंट सुबोध देव और एप्लीकेशन दाखिल करने वालों में से एक व्यक्ति के अनुसार, पुलिस ने इस मामले में कोई एफ.आइ.आर दर्ज नहीं की है।

रायपुर के सब-डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बी.आर. साही ने 101Reporter.com को बताया कि प्रशासन तब ही कोई कदम उठाएगा जब इसकी शिकायत राजगोंड समाज के लोगों द्वारा की जाएगी। वहीं पुलिस चीफ संजीव शुक्ला ने इसे आदिवासी समुदाय का अंदरूनी मसला बताते हुए 101Reporter.com से किसी भी तरह की बात करने से इनकार कर दिया।

इस पर सुबोध देव का कहना है, “इस तरह के नियम और फरमान देश के लिए अच्छे नहीं है और अगर पुलिस इस पर कोई कदम नहीं उठाती है तो हम अदालत का रुख करेंगे।“ उन्होंने आगे कहा कि, “जब संविधान के आर्टिकल 14 और 18 सभी नागरिकों को सामान अधिकार देते हैं तो इस तरह के फरमान कैसे ज़ारी किए जा सकते हैं?”

वहीं राजगोंड समाज के प्रमुख डमरूधर पुजारी का इस फरमान का बचाव करते हुए कहना है कि यह समुदाय का अंदरूनी मसला है और इसे किसी भी अन्य आदिवासी समुदाय की भावनाओं को आहात करने के लिए ज़ारी नहीं किया गया है।

वहीं पुजारा जाति के एक व्यक्ति बिना किसी संकोच के कहते हैं कि, “हमारे समाज के कुछ अपने नियम हैं जो सालों से चले आ रहे हैं, इसमें कुछ भी नया नहीं है। हमारे समाज से बाहर किसी भी अन्य व्यक्ति का इससे कोई लेना-देना नहीं है।”

प्रदेश कांग्रेस कमिटी के जनरल सेक्रेटरी अरुण वोहरा का इस विषय पर कहता हैं कि, “इस तरह के फरमान समाज को बांटने का एक प्रयास हैं और हमारे देश के विविधतापूर्ण समाज की सौहार्दता के लिए एक बड़ा खतरा है।” वहीं प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के नेता दिनेश देवांगन ने इस फरमान को बेहद ‘शर्मनाक’ बताया है।

सन 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद से ही राज्य असेंबली में ऊंची जातियों का बोलबाला रहा है। वर्तमान में भी राज्य के 90 विधायकों में से 35 ऊंची जातियों से हैं, जबकि राज्य की 31.76% आबादी आदिवासी समुदायों से आती है। ऊंची जातियों का यही दबदबा माइनिंग (खनन) व्यवसाय में भी देखने को मिलता है।

सुबोध देव कहते हैं कि, छत्तीसगढ़ के सभी राजनीतिक दल इस मसले में हाथ डालना नापसंद करते हैं, क्यूंकि उन्हें इसमें कोई राजनीतिक फायदा नज़र नहीं आता।

यही कारण है कि कोई भी राजनीतिक दल इस फरमान के विरोध में ना तो खुलकर सामने आया है और ना ही इसके खिलाफ कोई कदम उठाया जा रहा है।

 

लेखकों के बारे में:

हितेश शर्मा दुर्ग के और धनंजय बिहारी देवभोग के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। दोनों ही ज़मीन से जुड़े पत्रकारों के आला संगठन 101Reporters.com के सदस्य हैं। लखनऊ के सौरभ शर्मा ने भी इस रिपोर्ट को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है।  

हिन्दी अनुवाद: सिद्धार्थ भट्ट

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