मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक जीत है ऑस्ट्रेलिया-भारत यूरेनियम डील

Posted by Shubham Gupta Purwar in GlobeScope, Hindi, News
April 14, 2017

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की तीन दिनों (9 अप्रैल-12 अप्रैल) की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और संगठित अपराध से निपटने, नागरिक उड्डयन क्षेत्र में सहयोग, स्वास्थ्य एवं औषधि क्षेत्र में सहयोग, मौसम एव वन्य जीव, खेल और सेटेलाइट नेवीगेशन के क्षेत्र में छह समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

टर्नबुल सितंबर 2015 में प्रधानमंत्री बने थे, उसके बाद से यह उनका पहला भारत दौरा है। हालांकि, इससे पहले 2015 में जी-20 समिट और 2016 में चीन के होंगझु में हुई ब्रिक्स समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री टर्नबुल की मुलाकात हो चुकी है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल के साथ द्विपक्षीय बातचीत के बाद जारी बयान में कहा, “मुझे उम्मीद है कि भारत की आपकी यात्रा भी एक अन्य ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीवन स्मिथ की बल्लेबाज़ी की तरह ही सार्थक होगी।”

वहीं, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल ने कहा कि उनका देश जितना जल्दी संभव हो सके, उतनी जल्दी भारत को यूरेनियम का निर्यात शुरू करने के लिए तैयार है। यूरेनियम निर्यात शुरू करने के मसले पर ऑस्ट्रेलिया ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विद्युत उत्पादन समझौते पर हस्ताक्षर के तीन साल बाद अब वह भारत को यूरेनियम निर्यात करने को लेकर आशान्वित है। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की संसद में दोनों दलों के समर्थन से विधेयक पारित होने के साथ ऑस्ट्रेलिया अब भारत को यूरेनियम का निर्यात करने को तैयार है।

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच असैन्य परमाणु समझौता-एक ऐतिहासिक कदम

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने सितंबर, 2014 में पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के समय “असैन्य परमाणु समझौता (civil nuclear deal)” पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत भारत अब ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीद सकेगा। भारत ऐसा पहला देश होगा, जो कि परमाणु अप्रसार संधि (nuclear non proliferation treaty) पर हस्ताक्षर किए बिना ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम खरीद सकेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया था।

दुनिया भर के यूरेनियम भंडार का 40 प्रतिशत ऑस्ट्रेलिया के पास

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री का यूरेनियम निर्यात करने के बयान को अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है। भारत को शांतिपूर्ण कार्यों के लिए यूरेनियम देने का बिल संसद के दोनों दलों में पास हो चुका है और कुछ कानूनी प्रक्रिया के बाद भारत के पास यूरेनियम आने लगेगा। आंकड़ों के मुताबिक, यदि पूरे विश्व में यूरेनियम की बात करें, तो पूरे विश्व का 40% यूरेनियम ऑस्ट्रेलिया के पास है। ऑस्ट्रेलिया, जिस देश में अभी तक कोई परमाणु बिजली संयंत्र (न्यूक्लियर पावर प्लांट) नहीं है, वह दुनिया में यूरेनियम का निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, वित्त-वर्ष 2011/12 में ऑस्ट्रेलिया ने 7529 टन यूरेनियम का खनन किया था, जिसकी कीमत 782 मिलियन अॉस्ट्रेलियन डॉलर (A$782) के बराबर है। ऑस्ट्रेलियाई मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया हर वर्ष करीब 70,000 टन येलो केक (यूरेनियम का एक प्रकार) का निर्यात करता है।

ऑस्ट्रेलिया जिसने पहले यूरेनियम देने से इनकार किया था, वह बाद में राज़ी कैसे हो गया?

भारत और ऑस्ट्रेलिया के हिन्द-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र (Indo-Pacific Region) पर साझा हित हैं। हिन्द-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में चीन के बढ़ते दबदबे से कई देश चिंतित हैं। इसका संकेत हमें मोदी की जापान यात्रा में भी मिल जाता है, जिसमें मोदी ने अप्रत्यक्ष तौर पर चीन का नाम लिए बिना कहा था, “कुछ देश अभी भी 18वीं सदी की विस्तारवाद की नीति में विश्वास रखते हैं, लेकिन मेरा विश्वास विकासवाद की नीति में है।” ऐसे में अमेरिका भी चीन से प्रतिद्वंदी के तौर पर एशिया महाद्वीप में भारत को खड़ा करना चाहता है, जिसके कारण 2008 में अमेरिका भारत को शांतिपूर्ण कार्यों में परमाणु सहयोग देने में सहमत हो गया था।

अमिताभ मातो (डायरेक्टर, इंडिया-ऑस्ट्रेलिया संस्थान, प्रोफेसर मेलबर्न विश्वविद्यालय और जे.एन.यू.) का अपने लेख “The New Promise of India-Australia Relations” में कहना है कि पूर्व में भारत, जापान और अमेरिका के साथ ऑस्ट्रेलिया के सैन्य रिश्ते स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देते थे, लेकिन अपने हितों को देखते हुए, विश्व अर्थव्यवस्था में शक्ति के केंद्र को बदलने के कारण अब इन्हीं देशों को एक साथ आगे आना पड़ रहा है।

भारत को यूरेनियम निर्यात के लिए ऑस्ट्रेलिया का राज़ी होने का कारण वहां की गिरती अर्थव्यवस्था भी है। कई शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने चेतवानी दी है कि यदि चीन की अर्थवयवस्था लड़खड़ाई तो अगले 2 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में करीब 5 लाख रोज़गार खत्म हो सकते हैं, घरों के दाम 9% तक कम हो सकते हैं और देश को खरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हो सकता है। वर्तमान समय में चीन की अर्थव्यवस्था भारत की अपेक्षा बुरे दौर से गुज़र रही है।

यदि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाले व्यापार के विकास की बात करें, तो पिछले कुछ वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोत्तरी हुई है। एक दशक पहले भारत, ऑस्ट्रेलिया को निर्यात के आकड़ों के मामले में शीर्ष दस में नहीं था, लेकिन आज हम ऑस्ट्रेलिया के पांचवे सबसे बड़े निर्यातक देश और 10वें सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार (ट्रेडिंग पार्टनर) हैं। साथ ही, भारत ऑस्ट्रेलिया में अाप्रवासन का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत, कुशल श्रमिकों का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत और ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने के लिए आने वाले विदेशी छात्रों के मामले में दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है।

भारत की कई कंपनियों जैसे टाटा कंसलटेंसी, इंफोसेसिस, महिंद्रा एयरोस्पेस और अडाणी समेत कई कंपनियों ने ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था में काफी मात्रा में निवेश कर रखा है। आकड़ों की बात करें, तो यह इस समय तक लगभग 11 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच व्यापार 2003 में 5.1 बिलियन आस्ट्रेलियन डॉलर से बढ़कर 2014-2015 में करीब 18 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है। असैन्य परमाणु संधि हो जाने से भारत और आस्ट्रेलिया के बीच व्यापार और अधिक बढ़ेगा लेकिन इसमें आस्ट्रेलिया को लाभ होने की अधिक उम्मीदें हैं।

मेलबर्न विश्वविद्यालय के ऑस्ट्रेलिया-इंडिया संस्थान के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया भारत के व्यापारिक साझेदारी के पसंदीदा देशों में अमेरिका, जापान और सिंगापुर के बाद चौथे स्थान पर है।

भारत की बिजली ज़रूरतों को पूरा कर सकेगा यूरेनियम निर्यात

भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निकाय लिमिटेड (Nuclear Power Corporation of India Limited) के अनुसार, भारत 20 छोटे, 4780 मेगा वाट क्षमता वाले नाभिकीय  रियेक्टर संचालित कर रहा है, जो कि कुल ऊर्जा खपत का 2-3.5% है। सरकार को आशा है कि 2032 तक नाभिकीय ऊर्जा क्षमता 63,000 मेगा वाट तक बढ़ जाए, जिसमें लागत लगभग 85 डॉलर बिलियन होगी | भारत के कई क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति न हो पाने के कारण कई स्थानों में विकास अवरुद्ध हो गया है। भारत में 20 रियेक्टर में से कुछ रियेक्टर अब भी अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) की निगरानी में हैं। इन रियेक्टर के लिए इस्तेमाल होने वाला अधिकतर यूरेनियम रूस और कज़ाकिस्तान से आता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर की बात करें तो भारत समेत पूरे विश्व समुदाय में बिजली के लिए परंपरागत स्रोत लगातार कम होते जा रहे हैं। ऐसे में ऊर्जा संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भारत पर नए ऊर्जा स्रोत से बिजली पैदा करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कोयला जैसे परंपरागत स्रोतों पर निर्भर रहकर देश की बिजली जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है। हमारे देश में जल संसाधनों से भी उतनी बिजली नहीं मिल पा रही है। यदि जल संसाधनों की तरफ निर्भरता बढ़ाते हैं, तो उसमें कई पर्यावरणीय खतरे सामने आ सकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए नाभिकीय ऊर्जा का योगदान 2-3.5% है, जबकि फ्रांस में यही 73% है और दक्षिण कोरिया में 28% है। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 तक पूरे देश में बिजली पहुंचाने का वादा किया है जिसके लिए भारत को यूरेनियम की काफी ज़रुरत होगी।

अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट की संख्या बढ़ेगी तो उससे कंपनियों के बीच प्रतियोगिता बढ़ेगी। प्रतियोगिता बढ़ेगी तो न्यूक्लियर ऊर्जा सस्ती भी होगी। हालांकि, प्रारम्भिक अवस्था में न्यूक्लियर पावर महंगी होगी और न्यूक्लियर रियेक्टर के रख-रखाव में खर्चा भी बहुत अधिक आता है। लेकिन अगर संपोषणीय विकास (Sustainable Development) की बात करें तो उस मामले में यह ऊर्जा कोयला और जीवाष्म ऊर्जा के मुकाबले काफी सस्ती हो सकती है। इस समय फ्रांस, रूस, अमेरिका और कई देशों की नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाली कंपनियाँ भारत आने को इच्छुक हैं। ऐसे में जब आपूर्तिकर्ता (Supplier) बहुत ज्यादा होंगे, तो ऊर्जा की कीमत उतनी ही गिरेगी, हालांकि ये सब संभव होने में काफी वक्त लग सकता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की घोषणा भारत के लिए महत्त्वपूर्ण मायने रखती है।

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच मुक्त व्यापार समझौता काफी लंबे समय से लंबित

ऑस्ट्रेलिया की मीडिया के मुताबिक, प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नुबल मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में असफल रहे, जो काफी लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है। ‘द सिडनी मॉर्निग हेराल्ड’ में छपी खबर के अनुसार, मैल्कम टर्नबुल ने पूर्व प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के भारत मुक्त व्यापार समझौते (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) को मार डाला है। पूर्व राष्ट्रपति एबॉट ने 2014 में इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए 12 महीने की समयसीमा तैयार की थी और तब से यह मामला लंबित पड़ा हुआ है। मीडिया को टर्नबुल के दौरे से काफी समय से रुकी हुई व्यापार वार्ता को नई आशा मिलने की उम्मीद थी। हालांकि, टर्नुबल की यात्रा के दौरान इस मसले में ऑस्ट्रेलिया का रुख काफी बदला हुआ नज़र आया। टर्नुबल ने इस मसले पर कहा, “समझौते के लिए मनमानी समयसीमा तय करने का कोई मतलब नहीं है।”

परमाणु अप्रसार संधि और असैन्य परमाणु संधि है क्या?

जब तक परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non Proliferation Treaty) को नहीं समझ लेते हैं तब तक असैन्य परमाणु संधि (Civil Nuclear Deal) नहीं होने का कारण नहीं समझ पाएंगे।  परमाणु अप्रसार संधि परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण ढंग से प्रयोग को बढ़ावा देने और परमाणु हथियारों का विस्तार रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का एक नतीजा है। इसे 1970 में बनाया गया था, जिसका उद्देश्य था कि परमाणु हथियारों को पाँच देशों (अमेरिका, सोवियत संघ{आज का रूस}, चीन, ब्रिटेन, फ़्रांस) देशों तक सीमित रखना, जिनके पास परमाणु हथियार थे और जो ये स्वीकार करते थे। चीन और फ़्रांस ने इस संधि पर शुरू में हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, पर 1992 में इस संधि पर चीन और फ़्रांस ने हस्ताक्षर कर दिए।

इस संधि पर 187 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं , हालांकि भारत, पाकिस्तान,उत्तर कोरिया और इज़रायल ने अभी तक इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस संधि की कई शर्ते हैं , जैसे कि यह गैर परमाणु देशों को न तो हथियार देंगे और न ही इन्हें हासिल करने में उनकी मदद करेंगे। हालांकि, उन्हें इस बात की इजाज़त होगी कि वे परमाणु ऊर्जा शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए विकसित कर सकते हैं लेकिन वह भी वियना स्थित अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों की देखरेख में होगा।

बात करते हैं असैन्य परमाणु संधि (Civil Nuclear Deal) से होने वाले फायदे की। भारत जैसे देश के लिए असैन्य परमाणु संधि होना देश के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। अॉस्ट्रेलिया ने पहले भारत को यूरेनियम देने से मना कर दिया था। उसके पीछे अॉस्ट्रेलिया का तर्क था कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non Proliferation Treaty) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। आस्ट्रेलिया ने यह भी सवाल उठाया था कि भारत के पास नाभिकीय सुरक्षा के लिए सुरक्षा मानक उचित हैं या नहीं। भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है। बतौर भारत सरकार, इस संधि में बहुत अधिक खामियां हैं। यदि भारत इसमें हस्ताक्षर कर देता है, तो उसके परमाणु संसाधन बहुत सीमित हो जाएंगे।

 

(PTI Input, BBC, MEA, DW, International Relations- Dr. Tapan Biswal, Dr. Vivek S. Raj से इनपुट लेते हुए)

फोटो आभार- फेसबुक पेज मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेयर

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