यात्रीगण कृपया ध्यान दें, रेलवे बस ट्विटर पर दौड़ रही है

Posted by Ajayendra Tripathi in Hindi, Society
April 6, 2017

इस बार ट्रेन में चढ़े बहुत दिन हो गए थे, लगभग 8-9 महीने और इस बीच रपटों ने इसकी गुणवत्ता को सुधार दिया था। इस क्रांति के बारे में अखबारों, न्यूज़ चैनल्स, सोशल मीडिया में खूब चर्चा थी। एक ट्वीट पर रेल मंत्री पानी पहुंचाने से लेके भ्रष्टाचार तक पर नकेल कस रहे थे तो देख सुनके बहुत अच्छा लग रहा था।

फिर वो दिन आया जब हम इस बार होली मनाने के लिए छुट्टी लेके घर की तरफ निकले और पता चला की ट्रेन को Re-schedule कर दिया गया है। 2 बार Re-schedule होने के बाद ट्रेन शुरुआत में ही 7 घंटा लेट हो चुकी थी। हम ठहरे इन्टरनेट वाले सो आनंद विहार से हम लेट ही निकले। कुल आठ-नौ सौ किलोमीटर की यात्रा करके जब अगली आधी रात ‘बेल्थरा रोड’ पहुंचे तब तक ट्रेन 15 घंटे लेट हो चुकी थी। एक आम भारतीय की तरह तसल्ली दी कि चलो कभी-कभार हो जाता है।

होली के बाद फिर दिल्ली आने का दिन भी आया, ‘सीतामढ़ी’ से ‘बेल्थरा रोड’ स्टेशन आते-आते ट्रेन 6 घंटा लेट हो चुकी थी और दिल्ली तक पहुंचते -पहुंचते कुल 14 घंटे लेट रही। इन सबमे एक बात बड़ी कमाल की हुई, हुआ यूं कि मेरे आगे बैठे लोगों के बीच उत्तर प्रदेश के चुनाव के नतीजों की बहस धीरे-धीरे ट्रेन पर आई और फिर रेलमंत्री ‘प्रभु’ के किस्से शुरू हो गए। किसी ने कहा, “उन्होंने रेलवे को बदल डाला है” अब मुझसे रहा न गया तो कह दिया कि, “ट्रेन वैसे 12 घंटे लेट चल रही है अभी!” बस इतना सुनना था कि दो लोगों में से एक ने स्वच्छता अभियान पर लपेट कर दोष लोगों को दिया और दूसरे ने ये बताया की ये ट्रेन ही ‘घटिया’ है।

मेरे लिए इस ट्रेन से पहली यात्रा नहीं थी, मैं दिल्ली से जब घर गया हूं लगभग इसी ट्रेन से गया और आया हूं और 2-4 घंटे से ज़्यादा कभी लेट नहीं रहा। भारतीय रेलवे का हाल देखते हुए ट्रेन 2-4 घंटे लेट होने को ‘दूध-भात’ ही समझा जाता है। बहरहाल, मैंने भी सोचा कि यह एक-दो बार की बात है और इसमें ‘प्रभु’ को दोष देना ठीक नहीं है।

पर 14-14 घंटे लेट यात्रा करते हुए लोगों को रेलवे की तरफदारी करते हुए देखना आश्चर्यजनक था। निश्चय किया कि दिल्ली जाके सबसे पहले एक्सप्रेस ट्रेनों की एक लिस्ट निकालूंगा और 1-2 महीने में उनके लेट-लतीफी का एनालिसिस करूंगा। फिर ख्याल आया कि 1-2 महीने पहले तो कुहरा वगैरह था तो ट्रेन का थोड़ा लेट होना लाज़मी है, इसलिए जितना पीछे का मिल पाए निकालूंगा। संयोग से 1 जनवरी 2014  से अब तक का डाटा पाने में सफलता मिल गयी, हालांकि उसमें भी 3-4 दिन लग गए। कुल 16 लाख से ऊपर रिकार्ड्स और इनमे पैसेंजर/लोकल/सुविधा/स्पेशल ट्रेन्स को शामिल नहीं किया था।

अब जब इनका एनालिसिस किया तो जो आंकड़े सामने आए उसका कुछ हिस्सा आप तक पहुंचा रहा हूं। मुझे नहीं पता कि इतनी ट्रेन्स लेट होने के बाद भी ‘प्रभु’ के गुण क्यूं गाये जा रहे हैं? अगर ट्वीट देखकर ‘प्रभु’ का दूध पहुंचाना मीडिया देख सकता है, तो यह नंगी आंखों का सच क्यूं नहीं देख पा रहा है? 2016, 2015, 2014 के शुरूआती 3 महीनों में जितनी ट्रेन अमूमन लेट होती रही हैं, 2017 में उसकी कई गुना ज़्यादा हुई हैं। अब ऐसा भी नहीं है न कि कुहरा सिर्फ 2017 में ही पड़ा है।

एक ट्रेन जिसका औसत लेट समय 2-4 घंटे था वो 80 बार चलने में 41 बार 15 घंटे से ज़्यादा लेट रही है। जाने कितनी ट्रेन्स के यही हाल हैं।

यह आम लोग देख पाएं, इसलिए इस पूरे एनालिसिस को http://trainsuvidha.com पर अपलोड किया है और इसको पूरी हद तक पारदर्शी रखने की कोशिश की है। हालांकि यह पूरा डाटा प्राइवेट सोर्सेज़ से निकाला है, पर यह वही सोर्सेज़ हैं जिस पर विश्वास रख कर आम जनता रेलवे में सफ़र करती है।

इस वेबसाइट पर आप अपने सुविधानुसार फ़िल्टर करके ट्रेन्स की स्थिति देख सकते हैं, पिछले तीन महीने की समरी और उसकी पिछले सालों के उन्ही महीनों से तुलना सबसे ऊपर ही कर दी है।

अमूमन लाखों लोग रेल से सफ़र करते हैं, हमारी हर गलती पर रेलवे हमसे जुर्माना लेता है या उसके लिए सज़ा तय की जाती है। हम रेलवे को पिछले सालों के मुकाबले आज ज़्यादा पैसे दे रहे हैं, ट्विटर और मीडिया पर इनके काम की तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं पर ज़मीनी हकीकत ये है कि रेलवे की स्थिति पहले से बद्दतर हुई है और यह बात हवा में नहीं, आंकड़ों के बल पर बोल रहा हूं।

हमारी सबसे बड़ी पूंजी हमारा समय है और रेलवे अपने ज़िम्मेदारियों से विमुख होकर लाखों लोगों के समय के साथ खिलवाड़ कर रही है, बिना माफ़ी और मुआवज़े और तो और अपनी तारीफों का ढिंढोरा भी पीट रही है।

लोगों को क्या हुआ है, मुझे पता नहीं पर मैं चाहता हूं कि जब अगली बार ट्रेन से यात्रा करूं तो गाड़ी समय से चले। यदि न चले तो रेलवे मुझे इसकी अग्रिम सूचना दे और अगर ज़्यादा लेट हो तो रेलवे मेरे समय के बदले मुझे उचित हर्जाना दे। ये मेरा बुनयादी हक़ है।

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