राष्ट्रवाद के खेत में भी किसानों के लिए बस आत्महत्या उगती है

Posted by Amit Vikram in Hindi, News, Staff Picks
April 12, 2017

ये पोस्ट पढ़ कर हो सकता है कि आप मुझे देशद्रोही करार दे दोगे लेकिन जब बात मन में आयी है तो फेसबुक पर भी आएगी ही।

बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ ये देख कर कि सभी राजनीतिक पार्टियाँ एकजुट हैं भारतीय सैनिक कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी हुकूमत के द्वारा फाँसी की सज़ा सुनाए जाने के ख़िलाफ़। क्या पक्ष क्या विपक्ष, सभी ने एक स्वर से इसकी निंदा की है और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने का भरोसा दिया है सभी देशवासियों को। सबसे अच्छी बात लगी कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्वयं जाकर कांग्रेसी सांसद व पूर्व मंत्री शशि थरूर से आग्रह किया कि वो इस बाबत एक प्रस्ताव तैयार करें। राजनैतिक एकता की जो मिसाल बनी वो क़ाबिले-तारीफ़ है और साथ ही हमें सन्देश देती है कि जब बात देश हित की हो तो सभी गिले शिक़वे भूल कर हमें एक साथ खड़े होना चाहिए।

लेकिन इस घटना से मेरे मष्तिष्क में कुछ सवाल खड़े हुए हैं। उनमें से सबसे पहला ये है कि क्या देशभक्ति या राष्ट्रवाद केवल हमारे सैन्य जवानों के लिए होती है। क्या हमारी एकता और सहयोग की भावना केवल सैन्य बलों के प्रति है। या हमारे किसान भी इस राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना में कहीं छोटा सा स्थान पाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि एक सेना जवान की मौत हमें आंदोलित कर उठती है और हमारे राजनेता एकजुट हो जाते हैं। लेकिन यही मौत अगर देश के किसान की हो तो उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगता है। कोई फ़र्क नहीं पड़ता इन्हें कि हमारे किसान जीएं या मरें। और सबसे दुःखद बात ये है कि ऐसा सिर्फ़ नेताओं के साथ नहीं है, हम आम देशभक्त भी ऐसा ही सोचते और करते हैं।

कल-परसों की बात है बिहार में कुछ गन्ना किसानों ने आत्मदाह कर लिया। लालकिला पर कुछ किसानों ने नंग-धड़ंग प्रदर्शन किया। लेकिन संसद तो क्या गली के नुक्कड़ पर भी किसी ने एकजुटता नहीं दिखाई। एक तरफ़ मोतिहारी में किसान आत्मदाह कर रहे थे और दूसरी तरफ़ जातीय समीकरण फिट बैठाने में माहिर हमारे सुशासन बाबू 400 करोड़ में बने पूर्णतः वातानुकूलित ज्ञान भवन में बैठ कर गाँधीवाद पर भाषण दे रहे थे। गाँधी के पोते/पड़पोते तुषार गाँधी भी उनसे गलबहियाँ डाले गांधी के विचारों पर अपनी ज्ञान-सुधा बरसा रहे थे। सोचता हूँ कि अगर आज गाँधी ज़िंदा होते तो क्या कर रहे होते। एयर कंडिशन्ड सभागार में भाषण दे रहे होते या गन्ना किसानों के साथ सत्याग्रह कर रहे होते।

खैर मेरा मुख्य विषय हमारे सुशासन बाबू की गाँधीलीला (रघुवंश बाबू के शब्दों में) नहीं है। मैं बात कर रहा था राष्ट्रवाद और देशभक्ति की। हम सभी ने, चाहे वो नेता हों, छात्र हों या आम जनता हों, राष्ट्रवाद की कैसी परिभाषा पढ़ी है जिसमें एक सेना के जवान की मौत पर खून खौलता है, हम एक सर के बदले दस सर लाने के लिए उद्वेलित हो जाते हैं और ‘युद्ध-युद्ध-युद्ध हो’ के नारे से पूरे देश को गुंजायमान कर देते हैं। लेकिन मोतिहारी में आत्मदाह करने वालों किसान के लिए हल्की सी आवाज़ भी नहीं उठा पाते हैं। क्यों हम जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों से हमदर्दी भी नहीं जता पाते हैं। ऐसा क्यों हैं कि हमारी देशभक्ति सिर्फ़ देश के रक्षक जवानों के लिए है लेकिन अन्नदाता किसानों के लिए नहीं है। कहीं हमने देशभक्ति की गलत परिभाषा तो नहीं पढ़ ली है।

कहीं ये देशभक्ति का ज्वार तो झूठा तो नहीं? या जान-बूझ कर इस देश के हुक्मरानों ने देशभक्ति की ऐसी परिभाषा तो नहीं गढ़ी कि हमारा सारा क्रोध बाहरी दुश्मनों के लिए ही निकले। या अपने देश के अन्नदाता किसान जिनकी वजह से जाती है, उनके लिए क्रोध उत्पन्न ही न हो। इन सवालों पर हमें सोचना होगा। हमें जितनी संवेदना सेना के जवानों के लिए होनी चाहिए उतनी ही संवेदना किसानों के लिए भी होनी चाहिए। आख़िर एक इस देश के रक्षक हैं तो दूजे इस देश के पोषक भी हैं। अगर हमारे खून में उबाल एक रक्षक की मौत पर आता है तो पोषक की मौत पर भी उतना ही उबाल आना चाहिए। और अगर ऐसा नहीं है तो मुझे लगता है कि हमने देशभक्ति की गलत परिभाषा गढ़ ली है।

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