भागलपुर में सांप्रदायिक तनाव की खबरों का वो सच जो आपको कोई नहीं बताएगा

Posted by Prashant Jha in Hindi, News, Staff Picks
April 15, 2017

10 अप्रैल को अलग अलग जगहों पर भागलपुर में सांप्रदायिक तनाव की खबरें आने लगी। बताया गया कि दो समुदायों के लोगों के बीच धार्मिक मतभेद हो चुका है और दंगे जैसे हालात बन चुके हैं। भागलपुर में दो दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं भी रद्द कर दी गईं ताकि कोई अफवाह तत्कालीन स्थिति को खराब ना कर सके। लेकिन जिस तरह से इस घटना को रिपोर्ट किया गया वो वाकई चौंकाने वाला था। क्योंकि असल में वहां कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं फैला था बल्कि किसी शरारती तत्व द्वारा अंजाम दी गई एक घटना को लेकर लोगों में रोष था। आईये अब ज़रा जान लेते हैं जो स्थानीय लोगों और पत्रकारों ने Youth Ki Awaaz को बताया पूरे मामले के बारे में-

वो हॉर्लिक्स का डब्बा जिसमें हड्डी और मांस का टुकड़ा मिला

भागलपुर-बौसी मार्ग पर मोजाहिदपुर थाना क्षेत्र के पास बाल्टी कारखाना चौक के पास  एक हनुमान मंदिर है, जहां किसी शरारती तत्व ने एक हॉर्लिक्स के डब्बे में हड्डियां और मांस के कुछ टुकड़े रख दिये थे। जब ये बात लोगों को पता चली तो लोग बड़ी संख्या में मंदिर पर पहुंचे और सड़क जाम करने की कोशिश की। पुलिस प्रशासन ने तेज़ी दिखाई और घटनास्थल पर पहुंची। हालात को काबू में कर लिया गया। आगे किसी तरह की अफवाह ना फैले इसको लेकर इंटरनेट सेवाएं भी स्थगित कर दी गई। हालांकि 26 जनवरी से ही पूरा माहौल रोष का बना हुआ है, लेकिन दो समुदाय के बीच नहीं बल्कि प्रशासन और लोगों के बीच।

 

क्या हुआ था 26 जनवरी को:

भागलपुर के हबीबपुर थाना क्षेत्र के अंबे पोखर के पास एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर उसमें एक हनुमान मूर्ति रखी गई थी। कुछ लोगों ने ये शिकायत की थी कि मंदिर की आड़ में लोग यहां आकर गांजा और अन्य नशा करते हैं जिससे लोगों को परेशानी होती है।

अंबे पोखर से मूर्ति ले जाने की कोशिश करती पुलिस

इस शिकायत के बाद तत्कालीन SDO कुमार अनुज अन्य बल के साथ वहां पहुंचे और मूर्ति को हटाकर कहीं और रखने का इंतज़ाम करने लगें। लेकिन मूर्ति को झोपड़ी से हटाना लोगों को नागवार गुज़रा और लोगों ने वहां पहुंच कर हंगामा करना शुरु कर दिया। जिसमें करीब 50 राउंड गोलियां भी चली।

हालांकि मूर्ति हटाने को लेकर नशे वाले कंप्लेन के आलावा एक और थ्योरी दी जाती है। वो थ्योरी ये कि कुछ ज़मीन माफिया तालाब समेत आसपास की ज़मीन को हड़पना चाहते हैं। उसी क्रम में माफियाओं के दबाव में पुलिस वहां पहुंची और सबसे पहले जहां मूर्ति रखी थी उस जगह को साफ करने लगी। इस मामले में कुमार अनुज की भूमिका की भी जांच की जा रही है कि आखिर क्यों अनुज कुमार ने भावनाओं को भड़काने वाला ये कदम बिना किसी नोटिस के लिया। कुछ लोग ये भी बताते हैं कि प्रशासन का भी इस मामले में माफियाओं से साठगांठ है।

उसके बाद भागलपुर-बौसी मार्ग वाले हनुमान मंदिर पर मांस रखने वाली घटना हुई लेकिन वो मामला भी शांत हो गया। और 10 तारीख को ये खबर आई की अंबे पोखर वाली झोपड़ी में रखे हनुमान की मूर्ति का किसी ने अंगूठा तोड़ दिया है और मूर्ति को भी नुकसान पहुंचाया है। जिसके बाद फिर लोग बड़ी संख्या में वहां पहुंचे। लेकिन इस मामले में भी किसी दूसरे धर्म के लोगों के शामिल होने की बात कहीं से भी सामने नहीं  आई। और ऐसी किसी अफवाह को फैलने से रोकने के लिए ही इंटरनेट बंद किया गया।

अंबे पोखर के पास वो झोपड़ी जहां मूर्ति रखी गई है

भागलपुर में बतौर सद्भावना कार्यकर्ता काम कर रहे उदय गिरी बताते हैं कि अच्छी बात ये हुई कि जिस तरह से अफवाह फैलती है उसी तरह से ये बात भी लोगों में फैल गई कि ये कोई सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने वाला मामला नहीं था। सभी लोगों ने  यह तर्क किया कि कोई मुस्लिम मंदिर के अंदर कैसे जाकर मांस या हड्डी रख सकता है? बात ये निकलकर आई कि मंदिर के पास ही जो बूचड़खाना है उसी को बंद करवाने के सिलसिले में किसी ने ऐसा किया ताकि बूचड़खाने को बंद करने की मांगों में तेज़ी आ सके।

बाल्टी कारखाना चौक का वो मंदिर जिसमें हड्डी और मांस रखा गया था

नाम ना बताने की शर्त पर एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं किसांप्रदायिक तनाव जैसी कोई भी बात नहीं है। कोई मुस्लिम भला ऐसी रिस्क क्यों लेगा किसी मंदिर में जाने का? बस 1989 के दंगों के बाद यहां लोग और प्रशासन ज़्यादा सावधान रहती है। 

भागलपुर में ही एक शांति समिति के सदस्य फारुक अली बताते हैं कि हिंदू-मुस्लिम वाला कोई एंगल नहीं है, बस कुछ तनाव था जिससे की लोग सड़क पर उतर आएं। ऐसी घटनाओं का यहां का मुसलमान भी विरोध करता है।

अंबे पोखर से मूर्ति ले जाने के प्रयास के बाद पुलिस और स्थानीय लोगों में हुई झड़प

इस पूरे मामले में जो सबसे खतरनाक था वो था जिस तरीके से इसे रिपोर्ट किया गया। दो समुदायों के बीच तनाव बताकर इसे सामने लाया गया जबकि दो समुदाय पूरे मामले में कहीं से भी शामिल ही नहीं थे। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां अफवाह आग की तरह फैलती है और हम बिना तथ्यों को परखे हुए  अपनी ओपिनियन बना लेते हैं वहां हमें ऐसी खबरों को चलाने से पहले सावधानी ज़रूर बरतनी चाहिए।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.

हर हफ्ते Youth Ki Awaaz हिंदी की बेहतरीन स्टोरीज़ अपने मेल में पाने के लिए यहां सब्सक्राइब करें।