सड़कों पर रहने वाला तीन में से एक बच्चा नशे का शिकार

राजधानी सहित मध्य प्रदेश के कई नगरों में पारिवारिक संरक्षण और सुविधाओं से वंचित बच्चे सड़कों पर गुज़र बसर कर रहे हैं। विशेष ज़रूरतमंद व अनाथ जैसी परिभाषा में आने वाले इन बच्चों का कोई सही आंकड़ा जुटाया ही नहीं जा सका है। इनमें शहर के प्रमुख स्थानों पर भीख मांगते, पन्नी बीनते, स्टेशन और चौराहों पर काम करते बच्चे हैं। इनके परिवार भी इन्हीं कामों में लगे हैं जो खुले में रात गुजारने को मजबूर हैं। रेलवे ने इन बच्चों के मामले में एक स्टैंडर्ड ऑपरेशन प्रोसीजर जारी किया है। बावजूद इसके बड़ी संख्या में बच्चे उपेक्षित हैं।

रिहैब्लिटेशन प्लान और सेंटर की है कमी –

मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2015-16 में भिक्षावृत्ति करते हुए 2722 बच्चे पाए गए थे, जिसमें 849 बच्चों को उनके माता-पिता को ही सौंप दिया गया था। ऐसे बच्चों के फिर से सड़क पर आने की पर्याप्त संभावना होती है। बाल कल्याण समिति के सामने भी ऐसे बच्चे आते रहे हैं किन्तु कोई ठीक रिहैब्लिटेशन प्लान न होने के कारण इन बच्चों के हित में कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो सकी है।

प्रदेश भर में सरकारी सेंटर्स की कमी और ठोस प्लान न होने की वजह से सड़क से जुड़े बच्चों को उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है। ये सभी बच्चे देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे हैं जिन्हें संरक्षण देना राज्य का काम है। महिला एवं बाल विकास विभाग ICDS (Integrated Child Development Services)  योजना चला रहा है बावजूद उसके स्वयं के आश्रय गृह अत्यंत कम हैं। जबकि लगातार सड़क पर आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। ये बच्चे पारिवारिक उपेक्षा और गरीबी के कारण सड़कों पर आ रहे हैं।

गंभीर नशे के शिकार हैं ये बच्चे –

राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के अनुसार सड़कों पर रहने वाले तीन में से एक बच्चा नशे का शिकार है। ये बच्चे गुटखा ,सुलोचन, व्हाइटनर,आयोडेक्स जैसे नशे कर रहे हैं। आवारा बच्‍चों द्वारा इन्‍हेलेंट पदार्थों का सेवन काफी अधिक किया जाता है। ये बच्‍चे 10-11 साल से नशीले पदार्थों का सेवन करना आरंभ कर देते हैं। सामाजिक न्याय विभाग, श्रम विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग की तमाम योजनाओं में ऐसे बच्चों के लिए स्वाथ्य और नशामुक्ति जैसे प्रयास दिखाई नहीं देते।

उठते रहे हैं सवाल –

सड़क के बच्चों के मामलों को लेकर बाल अधिकार पर काम करने वाली संस्थाएं तो आवाज उठाती रही हैं। हाल ही संसदीय सत्र में कई सांसदों ने भी इस मसले पर सवाल उठाये है। हेमा मालिनी, कोथापल्ली गीता, असदुद्दीन ओवैसी ,आलोक संजर , एसआर विजय कुमार, अशोक शंकरराव चव्हाण जैसे नेताओं ने इन बच्चों की गिनती, विकास योजना, आश्रय गृह, नशे और बीमारी की स्थिति तथा उपचार सहित इन्हें आरक्षण दिए जाने से जुड़े सवाल उठाये हैं।

(फोटो आभार – फ्लिकर)

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