“हीरा पहनने के लिए एक औरत को किसी पुरुष की ज़रूरत नहीं”

सुष्मिता सेन ने सिमी ग्रेवाल से खास कार्यक्रम के दौरान कहा था “ऊंगली में हीरा पहनने के लिए किसी भी स्त्री को अपनी ज़िंदगी में एक पुरुष के आने का इंतज़ार नहीं करना चाहिए। हम क्यूं किसी का इंतज़ार करें! हमें ‘अपना’ इंतज़ार करना आना चाहिए। अपने आपको सराहना जिसे आ जाए उसे खुश होने के लिए किसी बहाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो इंसान खुद में एक त्योहार है।”

उस वक़्त उम्र कम थी इसे समझने के लिए लेकिन कहीं कुछ क्लिक किया तो ज़रूर था। उनका ये फलसफ़ा मुझे बहुत पसंद आया था। मसला किसी रिश्ते को कमतर या गैर-ज़रूरी कहने का नहीं है। बल्कि यहां खुद को अपनी लाइफ का पहला और सबसे ज़रूरी हिस्सा मानने का इरादा है। सेल्फ़-लव कहते हैं जिसे। यानी आप अपने लिए कुछ करना शुरू करें, जीना शुरू करें।

मेरी मां बारह साल की उम्र से रसोई संभाल रही हैं। आज बासठ पर पहुंचकर भी उनके लिए ये सोचना नामुमकिन है कि वो उसी रसोई में अपने लिए कुछ बना लें। वो दूसरे शहरों में रह रहे मेरे भाई-बहनों को मिठाइयां, अचार और दुनिया भर की घंटों की मेहनत से बनने वाली चीज़ें बनाकर भेजती हैं। पापा के लिए और मेरे लिए भी हमारी पसंद का बनाना और खिलाना उन्हें खुशी देता है। लेकिन वो अपनी पसंद की चीज़ें तभी बनाती हैं जब कोई और घर में उसकी डिमांड करे।

एक दोस्त है जो सीरिया से लेकर सुल्तानपुर तक की ख़बर रखती है। इतिहास हो या भूगोल किसे बदला जा रहा है और क्यूं बदला जा रहा है इसकी जानकारी उसे बराबर रहती है। इस सारे क्रम में उसे अगर नहीं पता है तो ये कि दुनिया के तमाम विषयों पर बोलते-बोलते वो अपनी निजी ज़िंदगी पर सोचना और उस पर कुछ साझा करना भूल चुकी है। वो थोड़ा-थोड़ा डिप्रेशन की ओर झुक रही है। उसे इसका इल्म कतई नहीं रहता कि लोग उसे डिक्शनरी की तरह एक दिन के लिए खोजते हैं और फिर कहीं कोने में रख देते हैं। वो बस इस खुशफहमी में थी कि लोग उसके बारे में बात करते हैं। जबकि लोग उसके बारे में नहीं बल्कि उससे दूसरों के बारे में, दूसरी घटनाओं और मुद्दों पर बात करने आते थे। वो अपने इसी मुगालते में यूज़ और डम्प होती रही।

ऐसे तमाम लोग जो सिर्फ़ अपने आस-पास को जीते और सहेजते हैं। उनमें से किसी ने भी कभी भी खुद को किस हद तक केंद्र में स्थापित किया है ये सवाल आज पीछे छूट चुके हैं। ये न्यू मीडिया की देन है। इसमें आप खुद को खपा देना चाहते हैं। सबसे ज़्यादा तेज़, सबसे ज़्यादा कंटेंट और सबसे पहले लेकर आने की होड़, संवेदना के स्तर पर मन को मशीन बनाती जा रही है। ऐसे में सुष्मिता सेन ने जो सालों पहले कहा था वो फिर से याद आता है और इस बार सिर्फ़ याद नहीं, कहीं गहरे समझ आता है।

एक और काम की बात बीते साल कलिंगा लिटेरचर फेस्टिवल में पीयूष मिश्रा ने कही थी। उन्होंने कहा, “हर गैर-ज़रूरी बात और बेकाम की बात को भी हम डिस्कस कर रहे हैं और इस तरह हम दस ज़रूरी कामों को करने से महरूम रह जाते हैं।” हड़बड़ी के इस दौर में हमें शायद थोड़ा सेलेक्टिव हो जाना चाहिए। ज़रूरी हो तभी कहना और जानकारी के साथ कहने की बजाए सिर्फ़ कहते रहना ज़रूरी होता जा रहा है।

एक ही दिन में सोनू निगम के ट्वीट से लेकर, बाबरी मस्जिद और विनय कटियार, शाहिद अफरीदी के खेल से सन्यास और बीएसएफ़ जवान की बर्खास्तगी, हर मुद्दे पर हम कैसे बोल सकते हैं? क्या हर विषय की जानकारी हमें है? इसके जवाब की दोनों सूरतों में हम खुद को प्राथमिकता की दूसरी ड्योढ़ी में खड़ा करते हुए सिर्फ़ एक्सपर्ट बनने की दौड़ लगा रहे हैं। यह हमारी क्रीएटिविटि और रचनाप्रक्रिया दोनों के लिए नुकसानदेह है।

हम खुद को डेटा कलेक्शन मशीन से इतर कुछ अच्छा और बेहतर गढ़ सकने के लिए तैयार कर सकते हैं। उस वक़्त में हमें सबसे पहले सेल्फ़-लव और सेल्फ़-कंट्रोल सीखना चाहिए। सुष्मिता ने हीरा खरीदा तो आप अपने लिए एक किताब, एक पेन या एक रुमाल भी अगर चुनकर घर ले आएंगे। तो आप उसे याद रखेंगे। अपनी अनगिनत चीजों के बीच में वो एक पज़ेशन जो आपने अपने लिए किया होगा।

करने को ये भी मुमकिन है कि बाज़ार को भूलकर घर में अपने लिए एक दिन सजाया जाए, कुछ अच्छा पढ़ा जाए, दिलखुश कर देने वाला कोई स्वाद चखा जाए या किसी पुराने बिसरे रिश्ते से बतिया लिया जाए। दरअसल वो आपका खुद पर खुद के लिए इनवेस्टमेंट है। जिसमें कोई मार्केट रिस्क भी नहीं और जिसकी वैल्यू दिनोंदिन बढ़ती ही रहेगी। कोई ऐसी याद जो ज़रूरत के रिश्ते में नहीं बनी। बल्कि आपने उसे याद रखने के लिए रचा है और ये करते हुए हम खुद अपनी स्मृतियों का संसार रचने लगते हैं। ज़िंदगी का एक ककहरा ये भी तो है।

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