बिहार का ये अंडा बेचने वाला बता देगा आपको कि ‘व्हाट इज़ लाइफ’

Posted by Deepak Yatri in Hindi, Society
April 29, 2017

यह सक्सेस स्टोरी नहीं है, ना ही कोई चमत्कार जैसा कुछ। शिवनारायण कामत उर्फ बुढ़वा देश के किसी प्रतिष्ठित संस्थान से पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी नहीं है और ना ही उसने कोई ऐसा काम किया है कि जिसे आप सुनकर या पढ़कर हस्तप्रभ रह जाऐं। बुढ़वा एकदम ही साधारण आदमी है। दिल्ली के आम आदमी से भी पिछड़ा हुआ। अपने जीवन की वयस्क अवस्था से लेकर अपने प्रौढ़ तक बस एक छोटे से ठेले पर सड़क के किनारे अंडा बेचने वाला मामूली सा आदमी।

शिवनारायण कामत उर्फ बुढ़वा

शिवनारायण कामत उर्फ बुढ़वा का जन्म बिहार में मधुबनी जिले के एक छोटे से गांव बेहटा में 1967 में भीखो कामत और सुदामा देवी के सातवें बच्चे के रुप में हुआ। तीन भाई और तीन बहनों के बीच बुढ़वा का पालन –पोषण भी ठीक वैसा ही हुआ जैसा कि घोर गरीबी में किसी बच्चे का होना चाहिए था। पिता झाड़-फूंक और खेत में पत्नी के संग मजदूरी करके अपना और अपने बच्चों का पालन-पोषण करते रहे। बचपन से लोगों के भैंस-बकरियोँ की चरवाही करते बुढ़वा कब 16 साल का हो गया पता ही नहीं चला और इसी बीच शादी का हो जाना उसके लिए किसी मुसीबत से कम न थी। बुढ़वा के शब्दों में-

शादी के तीन साल के भीतर ही परिवार में अलगाव हो गया। माई-बाबू को मैंने अपने साथ ही रखा और इस बीच दो बच्चों की जिम्मेवारी भी सर पर आ चुकी थी तो कुछ समझे में नहीं आ रहा था करें तो करें क्या? दुनु प्राणी खेत में काम करते थे तो सांझ तक एक-एक सेर धान कमा लेते थे पर इससे कुछ होना-जोना नहीं था। फिर अपने मालिक रामसुंदर झा से दो सौ रुपए का उधार लेकर अंडे का नया काम शुरु किए। लेकिन इससे भी पेट नहीं भर पात था।

यह जीवन की ऐसी अवस्था होती है जहां व्यक्ति का सोचना बंद हो जाता है। कुढ़ और चिड़चिड़ापान बढ़ जाता है। सही और गलत का भेद खत्म सा हो जाता है। बस किसी तरह पैसा चाहिए होता है क्योंकि भूख जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ है जिसे भागा नहीं जा सकता है। इसी सच ने बुढ़वा को जेल की हवा भी खिलाई। पत्नी से कुछ बातों को लेकर हुई हाथा-पाई ने उसे दस दिनों के लिए जेल का खाना भी खिलाया। बुढ़वा अपने इस गलती पर प्रश्चयाताप करते हुए कहते हैं –

हाँ, वह हाथ उठाना गलत था लेकिन उसके बाद से फिर मैंने उसे कभी नहीं मारा। पर पैसे तो चाहिए थे सो मुंबई चला गया पर वहां भी नहीं टिक पाया तो फिर लौटकर बनारस आ गया। यहां तीन महीने तक रिक्शा चलाता रहा, पर उतनी कमाई नहीं हो पा रही थी। फिर लगा कि थोड़ा कम खा लेंगे पर घर से दूर रहकर जीना जीवन नहीं है।

अपने इस उठा-पटक के जीवन के बीच शिव नारायण का परिवार बढ़ता ही रहा। अपने आठ बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना उनके लिए किसी पहाड़ तोड़ने से कम ना था। फिर भी बुढ़वा ने हिम्मत नहीं हारी और घर पर रहते ही दिन में मजदूरी और शाम को अंडा और आम्लेट बेचने का करोबार फिर से शुरु कर दिया। फिर कभी लौटकर पीछे नहीं देखा। उसी पैसे से जैसे-तैसे परिवार चलाते रहे। मगर कभी फिर परिवार से अलग रहकर कमाने-धमाने की नहीं सोची। जितनी चादर थी उसी चादर में पैर समेटकर सोना सीख लिया। धीरे-धीरे परिवार में बच्चे बड़े होते गए और उनकी शादियां होती गई। बेटों ने कम उम्र से कहीं-कहीं काम करते हुए पिता को बोझ को थोड़ा-थोड़ा कम करना शुरु कर दिया था।

अब सवाल उठता है कि शिव नारायण उर्फ बुढ़वा के बारे में मैं क्यों लिख रहा हूं। हजारों ऐसे शिव नारायण हैं जो कहीं चाय-पान-तम्बाकू और जाने क्या-क्या बेचते ही आ रहे हैं। फिर शिव नारायण में विशेष क्या है। तो मैं कहूंगा – बुढ़वा अपने आप में विशेष है, क्योंकि  मैंने उसे अपने बचपन से ऐसे ही देखा है। उसी जगह, उसी ठेले पर। उन्हीं पांच-सात कैरेट अंडों के साथ कभी उबला अंडा और कभी आम्लेट बनाकर बेचते हुए।  उसी दूर तक आवाज करती केरोसिन तेल वाली स्टोव पर। पतले कद-काठी का हमेशा मुंह में पान गुलगुलाए हंसता हुआ इंसान। फकीरों की तरह अपनी दुनिया में मस्त, चेहरे पर कोई शिकन नहीं। किसी से कोई शिकायत नहीं। एक नया जीवन दर्शन गढ़ चुका अलग ही इंसान जिसे हम देख ही नहीं पा रहे हैं। हम भाग रहे हैं यहां से वहां। अपना घर छोड़कर, अपना परिवार छोड़कर। इस नाम पर कि हम दो वक्त की रोटी कमा रहे हैं लेकिन शर्त बहुत महंगी है – हमारा आपका परिवार।

कुछ रेंडम सवाल

असली संपत्ति क्या है आपके लिए?

मेरी असली संपत्ति मेरे बाल-बच्चे हैं। मेरा परिवार ही मेरी पूंजी है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है मेरे लिए।

सुख क्या है आपके लिए।

पूरा परिवार एक छत के नीचे रहते हैं यही मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सुख है। हर दिन उठकर अपने बच्चों को मुंह देखने को मिलता है इससे बड़ा सुख और क्या होता होगा।

आपके जीवन जीने का दर्शन मतलब मंत्र क्या है। क्या सोचकर जीवन जी रहे हैं?

(पहले तो ठहाके वाली हँसी फिर मुस्कुराते हुए) बस, अपने में मग्न रहो। परिवार के साथ रहो। जितना में हो सके उतने में गुजारा करो। नहीं मिले तो भूखे सो जाओ, लेकिन अपने परिवार के साथ रहो। यही संतुष्टि है और यही जीवन है।

अच्छा अंतिम दो सवालों के जवाब दीजिए।

राब दिन  – एक बार बाढ़ में घर टूट जाने के कारण बच्चों को लेकर इधर-उधर भटकते रहना आज भी याद है। वह मेरे जीवन का सबसे बुरा दिन था।

अच्छा दिन – पंद्रह अटैची भर के रुपया लेकर आ रहा था शहर से लेकिन पुलिस पीछे पड़ गई और नींद टूट गई। आंख खुली तो कुछ भी नहीं था, मेरे घर और मेरे परिवार के सिवा। (फिर जोर का ठहाका)

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