भूख हड़ताल पर बैठे साउथ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के नाम एक ख़त

Posted by Youth Ki Awaaz in Campus Politics, Hindi
April 21, 2017

विद्यार्थियों,

तुम पिछले दो साल से (चार वर्षीय बी.ए./ बी.एड., बी.एस.सी./ बी.एड.) अपनी डिग्री के लिए संघर्ष कर रहे हो। तुम या तुम्हारे अभिभावक सपने में भी नहीं सोचे होंगे कि एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय बग़ैर मान्यता के नामांकन ले सकता है। आज तुम्हारे भूख हड़ताल का तीसरा दिन है। तुमने शायद दुष्यंत को नहीं पढ़ा- “मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।”

मुझे तुम्हारी नादानी और भोलेपन पर दुःख होता है। तुमने पत्थर पर दूब उगाने का फ़ैसला किया है या फ़िर तुम, पत्थर पर अपना सर पटकने के इरादे से निकले हो। इसमें पत्थर का तो बाल भी बांका नहीं होगा पर तुम्हारा सर चकनाचूर हो जाएगा। डिग्री तो मिलने से रही, सेहत भी चली जाएगी। सुनो, तुम इस ग़लतफ़हमी में हो कि संतान के सामान विद्यार्थियों को भूख हड़ताल पर देख प्रशासकों को चिंता होगी, भूख से तुम्हारी ऐंठी अंतड़ियों और पपड़ी पड़े होंठ देख कर उन्हें अपना निवाला नहीं निगला जाएगा।

वह कुछ और ज़माना था, जहां भूख हड़ताल से विदेशी अंग्रेज़ भी पिघल जाते थे। आज तो तुम्हारे हक़ की मांग को, तुम्हारे शान्तिप्रिय प्रतिरोधात्मक निवेदन को आनन-फ़ानन में राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाएगा। आम जनता के सामने तुम्हें खलनायक बना दिया जाएगा और तब चुटकी बजा कर तुम्हारी मांग को विलोपित कर दिया जाएगा।

तुम कितने भोले हो, कि आज की भाषाई छटा को नहीं समझते। आज दो ही तरह की भाषा चलन में है। एक भाषा वह है जो स्वीकार की है, पादवंदन की है, स्प्रिंगनुमा ग्रीवादोलन की है। दूसरी भाषा, कटार और कृपाण की है, लत्तम-जुत्तम की है। ऐसे भाषाई माहोल में, तुम पठन पाठन की भाषा, गांधी की भाषा, संवाद की भाषा, विमर्श की भाषा में बोलना चाहते हो। तुम छलनी से पानी भरने की ज़िद पर अड़े हो।

तुम कितने अनाड़ी हो, कि MHRD (Ministry of Human Resource Development या मानव विकास संसाधन मंत्रालय) से आशा लगा बैठे हो कि वह तुम्हारी समस्या का समाधान करेगी। उसके पास तो बड़े-बड़े मसले हैं। उसे तो प्रोजेक्ट्स के द्वारा रामायण, महाभारत को सत्य सिद्ध करवाना है, प्राचीन काल में पुष्पक विमान की सत्यता सिद्ध करनी है, बॉडी पार्ट्स का ट्रांसप्लांटेशन (आदमी के सर पे हाथी का मुंह!) की सत्यता सिद्ध करनी है। और तुम सौ विद्यार्थी हो जो अपनी डिग्री की समस्या ले कर बैठे हो!

तुम दिवा-स्वप्न क्यों देखते हो? तुम यह क्यों मान बैठे कि तुम्हारी समस्या से कुलपति से लेकर शिक्षक तक परेशान हो जाएंगे? तुम्हारी चिंता में शिक्षकों-अधिकारियों-कर्मचारियों की नींद हराम हो जायेगी? वे सभी इसके लिए डेलीगेट के रूप में शिक्षा मंत्री और राष्ट्रपति से मिलेंगे, प्रेस कॉन्फ़्रेन्स करेंगे, सांकेतिक हड़ताल करेंगे। तुम्हारी समस्या को अपनी समस्या मानेंगे क्योंकि यह सवाल सिर्फ़ डिग्री का नहीं है, यह सवाल है विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता का। विश्वविद्यालय की शाख का।

JNU में चल रहे छात्र आन्दोलन के बाद सरकार एक भी विद्यार्थी का बाल बांका नहीं कर पायी क्योंकि हमारी मीडिया केवल दिल्ली केंद्रित है और तुम्हारी यूनिवर्सिटी तो गया (बिहार) में है। इससे उनकी TRP थोड़े ही बढ़ेगी? इसलिए खतरा है कि कहीं तुम्हारी आवाज़ नक्कारखाने में तूती बन के ना रह जाए।

तुम्हारा हौसला बुलंद है। एक लोकोक्ति के सहारे कहूं, तो यह तुम्हारा ‘तीन फूंके चानी’ है। तुम्हारा यह तीसरा प्रयास तुम्हें ज़रूर सफ़लता दिलाएगा। तुम्हारे जज़्बे को देख कर, फ़िर दुष्यंत याद आते हैं- “होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिये, इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिये।”

तुम्हारी लड़ाई के साथ,
कमलानंद.

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