आंतकवाद, बिना हथियार के नहीं हो सकता ?

Self-Published

आतंकवादी, इस शब्द से मैं काफी वाकिफ हूं, 1980 से पहले नक्सवाद, नक्सली जैसे शब्द आम थे, लेकिन 1980 के दशक में आतंकवादी, शायद भारत देश ने ये शब्द सबसे पहली बार सुना था, और यहाँ एक सिख के रूप में आतंकवादी की छवि को उभार कर दिखाया जाता था, ब्लूस्टार और उसके बाद 10 साल तक पंजाब भी अंधेर में था और एक सिख होने के नाते मैं भी, नजरे मुझे हर वक्त आतंकवादी कहती थी. लेकिन वक्त बदला अमेरिका के ट्रेड सेंटर पर हमला, अब आतंकवादी की छवि में एक मुसलमान दिखता था, लेकिन आतंकवादी की छवि में अभी भी दाढ़ी, मुछ, सर पर पगड़ी और हाथ में हथियार, ये सब कुछ शामिल था. लेकिन क्या वास्तव में आतंकवादी इस तरह होंगे जो हथियार के माध्यम से आतंकवाद को बढ़ावा देते हो. यहाँ उस आतंकवाद का विश्लेषण करना भी जरूरी हैं जो समाज में मौजूद हैं और बिना हथियार के एक तरह के आतंक को जिंदा रख कर बैठा हैं.

आतंकवाद या आतंकवादी, सामान्य शब्दों में अगर इसकी व्याख्या की जाये तो वह व्यक्ति या संगठन जो बल पूर्वक या किसी और तरीके से दूसरे व्यक्ति का या समाज के किसी वर्ग के अधिकार का हनन करता हो या उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर दे, उसे आतंकवाद या आतंकवादी कहा जा सकता.

इसी रूपरेखा में अगर हम हमारे समाज में मौजूद जाती प्रथा को परिभाषित करे तो, ये भी आतंकवाद का एक उदाहरण हैं जहाँ जाती के नाम पर हजारों सालों से समाज के 80% हिस्से को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया, ऐसा कहा जाता हैं की हर बस्ती में दलित समाज को दक्षिण दिशा में घर बनाने की इजाजत दी जाती थी. मंदिर इनसे बनवाये जाते थे लेकिन इन्हें उसी मंदिर में जाने की अनुमति नही दी जाती थी, ऐसा भी कहा जाता हैं कि इन्हें, चलने के वक्त अपने पैरों के पीछे पत्ता बांध के चलना पड़ता था ता की इनके पैरो के निशान ना रह जाये, समाज के एक हिस्से को इस तरह दबा कर रखना, शिक्षा, स्वास्थ्य, इत्यादि जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर देना, उन्हें इंसान ही ना समझना, इस से बड़ा आतंकवाद ओर क्या हो सकता है. इसी लिहाज पर पश्चिम के देशों में रंग भेद उभर कर आता हैं, यहाँ भी काले रंग के व्यक्ति को उसके नैतिक अधिकारों से वंचित रखा गया, क्या ये आतंकवाद नहीं हैं ?

अगर इसी तर्ज पर देखे, तो पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का शोषण, बचपन से हिंदू बहु समाज में रहा हु, और महामारी के समय, औरतों की बद हाली अपनी आँखों से देखी हैं की किस तरह महामारी के समय के दौरान इन्हें सूतक के नाम पर एक तरह से परिवार से अलग कर दिया जाता हैं, इन्हें उस समय रसोई में जाने की आज्ञा नहीं, पानी के बर्तन तक को हाथ लगाने की छूट नहीं होती और तो और उस समय ये जमीन पर अनाज की बोरी को बिछौना बनाकर सोते हुये देखा हैं. कहने को जननी हैं, माँ हैं लेकिन ऐसा क्यों की सूतक या महामारी के नाम पर महिला को अलग थलग कर दिया जाता हैं और ये सवाल भी हैं की समय को महामारी ही क्यों कहा जाता हैं ? लेकिन आम जिंदगी में भी इज्जत के नाम पर महिला को उसके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया जाता हैं, जहाँ इज्जत की ख़ातिर महिला की शिक्षा, बाहर आना-जाना, कपड़े, हर तरह से एक पाबंद जिंदगी बना दी जाती हैं. हमारा समाज जिस तरह एक महिला की जिंदगी को एक तरह से गुलाम बना देता हैं क्या ये आतंकवाद नहीं? लेकिन इस से भी एक कदम आगे, आज बेटी को कोख में ही मार दिया जाता हैं.

पूरे विश्व में जहाँ-जहाँ आतंकवादी शब्द का उपयोग किया जाता हैं, वहाँ-वहाँ इसका तात्पर्य उस इंसान से होता हैं जो व्यवस्था का हथियार बंद तरीके से विरोध कर रहा हो, लेकिन जब व्यवस्था हथियार का उपयोग करती हैं तब इस पर किसी भी तरह से कोई सवाल नही उठाया जाता, मसलन एनकाउंटर, हमारे ही देश में पहले पंजाब फिर कश्मीर में हो रहे एनकाउंटर पर सवालिया चिन्ह लगाया जाता रहा हैं, इसके इलावा भी देश भर में कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ पुलिस द्वारा किये गये एनकाउंटर पर संदेह प्रकट किया जाता रहा हैं, वही पुलिस हिरासत में किया जाता अत्याचार हम से किसी से भी छुपा नही हैं, इस से भी एक कदम आगे चले तो 1984 और 2002 के दंगों में एक तरह से निष्क्रय व्यवस्था, इन दोनों घटना में ये आरोप लगते रहे हैं की यहाँ पुलिस ने अपना दायित्व पूरी ईमानदारी से नहीं निभाया और यहाँ राजनीतिक महत्वकांशा भी मौजूद थी, लेकिन हजारों का कत्ल, बलात्कार, ओर क़ानूनी लड़ाई में छूट पुट लोगो को सजा, जहाँ सजा उम्र कैद से ज्यादा नहीं हैं, व्यवस्था के इस रविये को क्या आतंकवाद नहीं कहा जा सकता ? जहाँ समाज के एक हिस्से को पूरी तरह से अपाहिज करने की मंशा थी.

1990, के दशक में चर्चित शेयर घोटाला, जिसके बतोर सरगना का आरोप हर्षद मेहता पर लगा जिस के चलते शेयर बाजार बहुत घाटे में चला गया और नामी गिरामी कंपनियों के शेयर धड़ाम से जमीन पर आ गये थे, एक आम शेयर धारक के लिये जिसने उजवल भविष्य के लिये अपनी जीवन की सारी पूंजी शेयर बाजार में लगा रखी थी, एक ही पल में उसके अरमान धराशाही हो गये थे, और इसी के चलते ऐसी भी खबर सुनने में आयी थी की इस नुकशान के चलते कई लोगो ने आत्म हत्या कर ली थी. इस तरह के घोटालों से हमारे आजाद भारत का इतिहास भरा पड़ा हुआ है जहाँ अक्सर एक आम नागरिक को ही नुकशान होता है और इस तरह के आरोप से बड़ी छवि वाले नामी गिरामी लोग बच जाते है, अगर दूर ना जाये यो किंग फिशर एयर लाइन के घाटे में चलते कर्मचारियों को महीनो तक वेतन नहीं दिया गया लेकिन इसका मालिक जिस पर करोड़ो रुपये का बैंक लोन है वह लंदन भागने में कामयाब रहा, इस तरह के आर्थिक घोटालो को क्या आंतकवाद नहीं कहा जा सकता ? जिस के चलते हजारो लोगो की जिंदगी पर प्रभाव हुआ है.

आज अखबार की कलम हो या इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया, ये किस तरह झूठ को खबर बनाते है, ये हमसे छुपा नहीं है अभी कुछ ही अरसे पहले दिल्ली से गुमशुदा छात्र नजीब के खिलाफ एक अखबार में खबर छपी थी जहाँ ये बताया गया की नजीब किसी आंतकवादी संगठन के बारे में इंटरनेट पर सर्च कर रहा था, जिसकी पुष्टि किसी भी सरकारी एजेंसी ने नहीं की, लेकिन क्या किसी आंतकवादी सगठन के बारे में जानकारी लेना, या उसे समझना कीस तरह एक अपराध हो सकता है? इस तरह के अनेकों उदाहरण है, क्या झूठ को सच बताकर एक आम नागरिक की सोच को भृमित करना ये आंतकवाद नहीं है ? हमे ये याद रखना होगा की हम अगर किसी भी तरीके से किसी भी नागरिक या व्यक्ति के अधिकारों का हनन कर रहे है, तो ये एक तरह का आंतकवाद ही है जहाँ कलम, दिमाग, समाज, पुरुष प्रधान, जात-पात, व्यवस्था, राजनीति, पुलिस, इत्यादि भी एक तरह से आंतकवाद होने की पुष्टी करते है ओर ये आंतकवाद, हथियार वाले आंतकवाद से ज्यादा खतरनाक है, अगर समय रहते इसे समझ कर, समाज से दूर नहीं किया गया तो इसके कई गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते है. धन्यवाद.

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