आखिर क्या है मानवाधिकार?

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मानवाधिकार एक ऐसा विषय है जो सभी सामाजिक विषयों में सबसे गंभीर है जिसे हम एक तरफा हो कर नहीं सोच सकते. लेकिन फिर भी हमें इसके ऊपर बहस करते समय उस रास्ते को चुनना चाहिए जो समाज के लिए सबसे बेहतर हो और हो सकता है इस रास्ते पर हमें कुछ कुर्बानियां देनी पड़ें.
मानवाधिकार शब्द एक ऐसा अस्त्र है जिसके होने से इंसान को किसी भी समाज में जीने का अधिकार मिलता है. अगर इसका तात्पर्य समझा जाए तो मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता.
प्राचीन सभ्यताएँ मानवाधिकारों से कोसों दूर थीं, यूरोप में भी पुनर्जागरण के काल तक इसके बारे में कोई चिंता न थी। गनीमत इतनी ही थी कि लोग अपने धर्मभीरुपन के कारण कई बार ऐसे कार्यों से बचते थे जिनसे मानवाधिकारों को चोट पहुँच सकती थी। जीवों पर दया, करुणा, परोपकार, धर्म-कर्म, पाप-पुण्य, कर्मफल आदि भावनाओं का प्राबल्य था जससे समाज के सदस्य कुछ हद तक मानवाधिकारों के हनन से बचे रहते थे । मनुष्यों के दु:खों का कारण व परिणाम चूँकि पूर्व जन्म से जोड़ा जाता रहा, अत: मानवाधिकारों की बात ही बेमानी थी ।
पिछले दो-तीन सौ वर्षों में दुनिया में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, चिंतकों, समाजसुधारकों तथा नास्तिक विचारधारा के लोगों ने जन्म लिया । शिक्षा का दायरा बढ़ा और इसकी परिधि में आम लोग बड़ी संख्या में आने लगे जिसने सामाजिक जाति फैलाने का काम किया । पौराणिक बातों को बुद्धि के पलड़े पर तोला गया तब कहीं जाकर मानवाधिकारों के प्रति संकल्प की भावना से काम हुआ । समानता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था लाने तथा शोषितों को उनका वाजिब हक दिलाने की कम्यूनिस्ट अवधारणा ने भी मानवाधिकारों के प्रति सम्मान करने का मार्ग प्रशस्त किया । विश्व के अनेक देशों में लोकतांत्रिक सरकारों के गठन से इस मार्ग के अवरोध दूर होने लगे क्योंकि सबों को न्याय मिल सके, लोगों को उन्नति के समान अवसर झप्त हों, यह लोकतंत्र का मूलमंत्र है ।
भारत में मानवाधिकार से संबंधित प्रमुख चुनौतियां नस्लीय एवं जातीय भेदभाव, महिला एवं बाल- शोषण, दलितों पर अत्याचार, जेल में कैदियों की अमानवीय स्थिति आदि हैं. भारत में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम वर्ष 1993 में पारित किया गया तथा इसे 2006 में संशोधित किया गया.
बाल मजदूरी, महिलाओं का यौन शोषण, धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, जातिगत भेद-भाव, लूट- पाट, बलात्कार आदि सभी बातें मानवाधिकारों के खिलाफ जाती हैं । दंगे-फसाद, आतंक व दहशत पर आधारित सामाजिक व्यवस्था में हमारे मूलभूत अधिकारों का हनन सर्वाधिक होता है । सबल सरकारी तंत्र अपने निहत्थे नागरिकों का उत्पीड़न करता है, तो मानवाधिकारवादी फिर किससे गुहार करें । जब निर्धन और असहाय व्यक्ति को मामूली अपराध में वर्षों जेल में सड़ना पड़ता है तब मानवाधिकारों की बात बेमानी हो जाती है । युद्धबंदियों को जब अमानवीय यातनाएँ दी जाती हैं तो मानवधिकारों पर कुठारघात होता है । कानूनी दाँवपेचों में फँसकर रह जाने वाला हमारा न्यायतंत्र उचित समय पर न्याय नहीं कर पाता है तो इसका कुफल भी आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है।

समस्या का एक और पहलू यह है कि लोग मानवाधिकारों की व्याख्या अपने- अपने ढंग से करते हैं । कई देशों में इसे लोगों के धार्मिक अधिकारों से जोड़कर अधिक देखा जाता है । कहीं-कहीं व्यक्तियों के अधिकार धार्मिक कानूनों की आड़ में कुचल दिए जाते हैं । जनसंख्या बहुल देशों में पुलिस तंत्र समाज के दबे-कुचलों पर अधिक कहर बरसाता है । बच्चों के अधिकार, अभिभवाकों द्वारा कम कर दिए जाते हैं ।

Human rights in India 2012
भारत सदैव से ही मानव मात्र की स्वतंत्रता का पक्षधर रहा है, लेकिन अलग-अलग आधार पर यहां शोषण का दाग भी बना रहा. कमजोरों के संरक्षण के लिए कानूनों का निर्माण एवं उनका वास्तविक अमल बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं. भारत कानूनों के निर्माण में शायद कभी भी पीछे नहीं रहा, परंतु दुर्भाग्य से इसके निर्वहन का पक्ष सदैव से कमजोर रहा. समस्या की जड़ हमारी असंवेदनशीलता है, जो किसी और की पीड़ा को देखकर व्यथित नहीं होती और इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि मानवाधिकारों का उल्लघंन करने वाले जानते हैं कि यदि वे सलाखों के पीछे पहुंच भी गए तो उनके बाहर निकलने के गलियारे भी बहुत हैं. जरूरत इस बात की है कि हम अपने समाज में दूसरों का दर्द समझें और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करने की संवेदना उत्पन्न करें. लेकिन हां यह भी एक सच है कि मानवाधिकार की सीमा क्या है? जब तक बात अपराधियों की है तब तक तो सब सही है क्योंकि एक बलात्कारी, आतंकवादी या हत्यारे का कोई मानवाधिकार तो होना ही नहीं चाहिए लेकिन इन्हीं अपराधियों के साये में जब कोई निर्दोष हत्थे चढ़ जाता है या प्रशासन सच उगलवाने के लिए गैर-कानूनी रूप से किसी को शारीरिक या मानसिक यातना देता है तब समझ में आता है कि मानवाधिकार कितना जरूरी है. मानवाधिकारों के नाम पर आज का युवा वर्ग पार्क और गार्डनों में जो अश्लीलता का नंगा नाच मचा रहा है उसे देखते हुए जब कुछ तालिबानी शख्सियतें इज्जत के नाम पर प्रेमी जोड़ों का कत्ल
कर देती हैं तो समझ नहीं आता कि मानवाधिकार की क्या सीमा होनी चाहिए? प्यार करना इंसान का अधिकार है लेकिन उस प्यार से अगर समाज में अश्लीलता फैले तो उसका जिम्मेदार कौन है?

मानवाधिकार दिवस को मनाने के कारण और उद्देश्य-
मानव अधिकार दिवस मनुष्य के लिए वास्तविक अधिकार प्राप्त करने के लिए दुनिया भर में लोगों द्वारा मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में लोगों के शारीरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भलें और कल्याण में सुधार करने के लिए मनाया जाता है। इसे मनाने के कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य और कारण निम्न है:
दुनिया भर के लोगों के बीच में मानव अधिकारों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना।
समग्र मानव अधिकारों की स्थिति में प्रगति के लिये संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रयासों पर जोर देना।
एक साथ मानव अधिकारों के विशिष्ट मुद्दों को उजागर करने के लिए सहयोग और चर्चा करना।
इस कार्यक्रम में अल्पसंख्यक समूहों जैसे: महिलाओं, नाबालिगों, युवाओं, गरीबों, विकलांग व्यक्तियों और आदि अन्य को राजनीतिक निर्णय लेने में भाग लेने और मनाने के लिये प्रोत्साहित करना।
मानव अधिकार दिवस के उद्धरण “नागरिकों को राज्य की संपत्ति बनाने के लिए संघर्ष करना हमारे लिए वास्तविक संघर्ष है।”
“हम में से बहुत से मानवाधिकारों और कलात्मक स्वतंत्रता की परवाह में रंगने के लिये प्रोत्साहित करते हैं।”
“लोगों को उनके मानव अधिकारों से वंचित करना उनके द्वारा मानवता को बहुत बड़ी चुनौती है।”
“एक व्यक्ति के अधिकार वहाँ समाप्त हो जाते हैं जब वो किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करते हैं।”
“युद्ध के समय में नियम शान्त होते हैं।”
“ज्ञान एक आदमी को एक गुलाम होने के लिए अयोग्य बनाता है।”
“जब भी पुरुषों और महिलाओं को उनकी जाति, धर्म, या राजनीतिक विचारों की वजह से सताया जाता है, वो जगह – उस पल में – ब्रह्मांड का केंद्र बन जाना चाहिये।”
“सबसे बड़ी त्रासदी बुरे व्यक्तियों का अत्याचार और दमन नहीं बल्कि इस पर अच्छे लोगों का मौन रहना है।”
“हम सिर्फ दो लोग हैं। ऐसा नहीं है कि हमें बहुत ज्यादा अलग करती है। जैसा मैनें सोचा था उससे ज्यादा, लगभग नहीं के बराबर।”
“कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना करुणाजनक या दयनीय है, हर मानव को अपने जीवन में एक पल नसीब होता है जिसमें वो अपने भाग्य को बदल सकते हैं।”
“दूसरों को बढ़ावा देने के लिए अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करें।”
“आप मानवाधिकारों को अधिकृत नहीं कर सकते हैं।”
“आज मानव अधिकारों का उल्लंघन कल के संघर्षों का कारण हो सकते हैं।”
“हम विश्वास करते हैं कि मानव अधिकार सीमाओं के पार और राज्य की संप्रभुता से अधिक प्रबल होने चाहिए।”
“किसी एक के खिलाफ अन्याय प्रतिबद्ध हर किसी के लिए एक खतरा है।”
“हम एक साथ होकर नरसंहार को फिर से होने से रोक सकते हैं। एक साथ हम अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य बना सकते हैं।”
“आप एक इंसान हैं। वास्तविकता में आपको जन्मजात अधिकार प्राप्त है। आप कानून से पहले मौजूद गरिमा और श्रेय के लिए हैं।”
“याद रखें जो परिवर्तन आप दुनिया में और अपने स्कूल में देखना चाहते हैं, , वो आप से शुरू हो।”
“यदि कैदी पीटा जाता है, ये एक भय की अभिमानी अभिव्यक्ति है।”
“स्वास्थ्य एक मानवीय आवश्यकता है; स्वास्थ्य एक मानव अधिकार है।”

आतंकवाद और उग्रवाद भारत की एक प्रमुख समस्या है । विषाक्त मानसिकतावाले असामाजिक तत्त्व हिंसक वारदातों को अंजाम देने के उद्देश्य से आम जनता से लेकर सरकार के बड़े पदाधिकारियों और समाज के अन्य वर्गो के व्यक्तिाएं के अपहरण से लेकर हत्या तक का दुष्कृत्य कर देते हैं । आज कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवादियों का बोलबाला है । इन आतंकवादियों को पाकिस्तान का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है । भाड़े के प्रशिक्षित उग्रवादियों को कश्मीर भेजा जा रहा है, जो वहाँ मानवता की हत्या कर मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन करने में लगे हैं । इस दौरान हमारे सुरक्षा बल सामान्य स्थिति की बहाली और मानवाधिकारों की सुरक्षा हेतु संघर्षरत हैं, किंतु पाकिस्तानी हुक्मरान तथा अमेरिकी सुरक्षाबलों को ही मानवाधिकारों के उल्लंघन का दोषी मानते हैं । उग्रवादियों द्वारा की गई निर्दोष लोगों की हत्या का उन्हें स्मरण तक नहीं आता ।
पिछले कुछ वर्षों में-मुंबई बम विस्फोट, मद्रास बम विस्फोट प्रकरण, हजरत बल कांड आदि सब पाकिस्तानी साजिश का परदाफाश करते हैं, जो भारत को तोड़ने के लिए ऐसी घिनौनी हरकत कर रहा है और ‘उलटा चोर कोतवाल को डांटे’ कहावत को चरितार्थ करते हुए अमेरिका के समर्थन पर विभिन्न सम्मेलनों में भारत के सुरक्षा बलों पर ही मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगता है ।
इस संदर्भ में भारत ने हमेशा धैर्य से काम लिया है और मानवाधिकारों के संरक्षण की इसी भावना से उत्पेरित होकर पाकिस्तान की ओर हमेशा दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, किंतु ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ की कहावत ही पाकिस्तान चरितार्थ करता आ रहा है ।

लेखिका- जयति जैन, रानीपुर, झांसी उ.प्र.

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