आवाज: कलम से कीबोर्ड तक

Posted by Rajdeep Jain
May 29, 2017

Self-Published

अगर दीवारों के सच में कान होते है तो गांवों की माटी की दीवारों से लेकर शहरों की सीमेंट से बनी दीवारे भी महिलाओं की चीखें सुनती होगी.
देशी शराब के नशे में धुत्त आवारा पति से लेकर समाज के इज्जतदार और महिलाओं का सम्मान करने वाले पति भी घरों में अपनी पत्नियों को पीट रहे है.
पहले घरेलू हिंसा पर चर्चा हुआ करती थी तो लोग कहते थे कि जब महिलाएं शिक्षित और जागरूक हो जाएगी तो उनकी आवाज बुलंद होगी और वे अत्याचार बिलकुल भी नही सहेगी.
लेकिन बधाई हो साहब, आपने तो शिक्षित और जागरूक महिलाओं को भी चुप रहना सिखा दिया.
खैर, आपने जन्म होने दिया यही बड़ी बात है. उसके बाद पढ़ने दिया ये तो गजब हो गया और अगर शादी के बाद नौकरी करने दी तो आप से ज्यादा प्रोग्रेसिव कोई है ही नही. अब तो जिंदगी भर उन्हें आपके एहसान तले ही जीना होगा. चाहे दोनों साथ में ऑफिस जाये लेकिन सुबह जल्दी उठकर नाश्ता बनाना पत्नी का धर्म है और जब शाम को थक कर बापिस आये तो आप सोफे पर फैलेंगे और वो आपके लिए फिर खाना बनाने में जुट जायेगी. और हाँ, अगर आप को भूख तेज लग रही होगी तो आप उस पर चिल्ला सकते है और जरुरत पड़ने पर हाथ भी उपयोग में ला सकते है.
वो भी क्या करे साहब, शादी के पहले बड़े-बड़े ख्वाब देखे थे उसने. जिन माँ-बाप ने राजकुमारी की तरह रखा था वही आज फ़ोन पर रोता देखकर खुद को सख्त कर के बोलते है “बेटा, जैसा भी है निभाना तो पड़ेगा, थोड़ा बहुत एडजस्ट सब करते और वो तुमसे प्यार भी तो बहुत करता है, काम का बोझ होने की वजह से कभी-कभी फ्रस्ट्रेट हो जाता है”. वो भाई जो शादी से पहले अपनी बहिन से किसी का तेज आवाज में बात करना भी बर्दाश्त नही करता था, आज सब कुछ जानते हुए भी चुप है. पिछली बार कहा था तो सास बोल रही थी कि मेरे बेटे को खुश रखना नही आता इसे. जबसे शादी हुयी है परेशान रहता बेचारा. अभी भी मेरे बेटे के लिए रिश्तों की लाइन लगी हुई है , ज्यादा परेशानी हो तो ले जाइए बापिस घर.
और वो बेचारी आँसू पौछते हुए अपने पुराने दिनों को याद करती रहती है जब वो स्कूल में “घरेलू हिंसा” पर तेज तर्रार भाषण दिया करती थी और पूरा सभागार तालियों से गूंजता था.
साहब, आपने महिला सशक्तिकरण कर दिया, उन्हें खुद के पैरों पर खड़ा होना भी सिखा दिया लेकिन आज भी वो अकेली नही रह सकती. तलाक़ देकर अकेले रहकर खुद का खर्च निकलने वाली महिलाओं को ये समाज न जाने क्या-क्या ताने देता है. समाज के तानों से ज्यादा बेहतर वे मौत को समझती है.
सही कहते हो साहब, पुरुष के बिना महिलाओं का अस्तित्व ही नही और होगा भी कैसे जब तक आप जैसे दोमुंहे लोग इस समाज में रहेंगे.
महिलाओं से बस इतना कहूंगा कि भगवान भी उन्हीं की मदद करते है जो स्वयं की मदद करते है तो किसी की मदद के इंतजार में जिंदगी बर्बाद मत कीजिये.अभी मेरे जैसे हजारों लोग आपके साथ खड़े है.

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