क्या सच में भारत एक कृषि प्रधान देश है ?

Posted by Prashant Kumar
May 26, 2017

Self-Published

भारत एक कृषि प्रधान देश है।

यह वाक्य सुनते,लिखते,बोलते हमलोग बड़े हुए है।बच्चों ने भारत या हमारा देश पर निबंध/लेख लिखते वक़्त यह वाक्य जरूर लिखा होगा।गांवों में चौपाल पर चर्चा करते वक़्त देश के बारे में कोई न कोई इस वाक्य को बोलकर अन्य सभी को प्रभावित कर देता है। टी वी चैनेलो पर भी कभी कभी आप किसी पत्रकार या विशषज्ञ को यह बोलते अवश्य सुने होंगे।अख़बार में तो  यह छपता ही रहता है।नेता चाहे कुछ जानते हो या नहीं परन्तु ये बोलना कभी नहीं भूलते की ‘भारत एक कृषि प्रधान देश है।’
इन सबसे मुझे कोई शिकवा या शिकायत नहीं है परन्तु व्हाट्सप्प पर आये एक सन्देश ने मेरे मन में वर्षों से सोये एक प्रश्न ने मुहे कचोट डाला फिर दूसरा, फिर तीसरा और ये जारी है। ये प्रश्न उचित व्यक्ति या संस्था से पूछ जायेगा ऐसी आशा लिए आप सबसे साझा कर रहा हूँ।
पहला प्रश्न है क्या अखबारें,न्यूज चैनल और अन्य माध्यम भारत को कृषि प्रधान देश नहीं मानते ?क्योंकि अख़बार वाले वर्षों से दो या तीन पन्ने खेल (खेल में भी क्रिकेट )को समर्पित करते है और चार पन्ने बॉलीवुड/हॉलीवुड या फ़िल्मी दुनिया को, जो बाकि बचे उसमे विज्ञापन और दुर्घटना समाचार भरा रहता है।एकाध पन्ना किसी मुद्दे या संपादक के नाम रहता है।तो क्या भारत खेल या मनोरंजन प्रधान देश है? सुना है अख़बार छपने में कागज एवं अन्य चीजों की जरुरत पड़ती है और ये सब तो राष्ट्र के हर आदमी का संशाधन है क्यों संशाधनो का प्रयोग देश के दो-तिहाई से अधिक जनसँख्या के लिए नहीं हो रहा है?
दूसरा प्रश्न ये है कि  न्यूज चैनल पर दो घंटे सास-बहु की कहानी दिखाया जाता है, दो घंटे सेलिब्रिटी क्या कर रहा है उस पर बहस हो सकता है तो प्रतिदिन एक घंटा भारत के किसानों के मुद्दे या समस्यायों पर चर्चा क्योंनहीं करवा सकते?
एक तरफ तो हर कोई किसान की बदहाली सुनाने में व्यस्त है।कहीं सूखा पड़ा है तो कहीं किसी गरीब किसान ने आत्महत्या कर ली, दिल्ली में जंतर मंतर पर महीनो तमिलनाडु के किसान लोगों  व्यथा सुनाने की कोशिश करते रहे।न्यूज वालों के लिए ये एक खबर मात्र होता है तो क्या वे भूल गएँ है कि किसान है तो भारत है।जब हिंदुस्तान की आबादी का आधा से ज्यादा हिस्सा कृषि एवं कृषि आधारित उद्योग पर आश्रित है तो क्यों उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिलती है ?
इतने सालो में उद्योग क्षेत्र एवं सेवा क्षेत्र में काम करने वालों की सैलरी दुगुनी-चौगुनी हो चुकी है पर किसान की आमदनी उतना का उतना ही है।नाता लोग कृषि राग अलाप कर भूल जाते है। एक बच्चे का प्रश्न है उनकी कथनी  अंतर क्यों है ?खेती-किसानी से जुड़े करोड़ों लोगो के साथ लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मिडिया कए कैसा मजाक है ?

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.