क्या हम आज़ाद हो गए हैं?

Posted by Akram Shakeel
May 24, 2017

Self-Published

लेखक- युवा पत्रकार प्रशांत तिवारी

आज का वक़्त. ऐसा है की जहां अगर आप कुछ निष्पक्ष होकर बोलते हैं या लिखते हैं तो भी आपको किसी एक पक्ष का पक्षधर बना दिया जाएगा क्योंकि ये वो दौर नहीं हैं जब पत्रकार की उठी कलम से क्रांति खडी हो जाया करती थी.. और आज अगर कोई चाहे भी क्रांति लिखना तो उसे बिका हुआ साबित करने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता. फिर भी लोगों ने लिखना बंद नहीं किया बोलना भी बंद नहीं किया… और बांट दिए गए एक-एक गुट में कोई देशभक्त बना तो कोई देशद्रोही और किसी को बना दिया सिर्फ भक्त…. और शायद पत्रकारिता का मतलब ही बदल गया… देश कि राजनीति की तरह….. आज़ादी के बाद राजनीतिक दल इसलिए आये ताकि हिंदुस्तान का नेतृत्व कर सके… उन करोडों लोगों के समस्या को खत्म नहीं पर उसका समाधान करें जो बरसों की गुलामी के बाद आज़ाद हुए… पर हुआ क्या…….कोई हिन्दू का नेता, कोई मुसलामानों का, कोई दलितों का, कोई सवर्णों का आज राजनीति में देश के विकास से ज्यादा जातिवाद और सम्प्रदाय की बातें होने लगी… कोई एक पक्ष का पक्षधर हो गया तो कोई दूसरों का मसीहा….. मकसद तो बीच में ही ख़त्म हो गया… गरीब आज भी गरीब हैं… बच्चे आज भी मजदूरी करने पर मजबूर हैं पर उनके काम करने पर रोक हैं नारा दिया गया ‘बाल मजदूरी बंद हों’ पर शायद किसी ने ये नहीं सोचा की एक बच्चा आखिर क्यों.. मजदूरी करने पर मजबूर हुआ… और अगर किसी बच्चे को खाना तक नसीब नहीं हुआ तो वो क्या करेगा.. या तो वो भीख मांगेगा या फिर उसका बचपन उन अपराध की गलियों में घुस जाएगा जहां से वापस सिर्फ उसकी लावारिश लाश ही आती हैं…. ये सवाल नहीं हैं देश की राजनीति पर ….ये एक तमाचा हैं उन सभी नेताओं के गाल पर जिन्होंने जाकर देश की जनता से वोट मांगे थे…

देश की दूसरी तस्वीर देखते हैं 

क्यों आज हिंदुस्तान का एक तबका सडकों पर रहने को मजबूर हैं…. और इस बात को साबित करने के लिए मुझे कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं हैं देश की राजधानी में लोग सड़कों पर खाना बनाते हैं… सोते हुए सभी ने देखा होगा पर शायद आज की भाग दौड़ में किसी के पास इतना वक़्त नहीं जो ये जानें की वो कहा से आये हैं और क्यों उनको अपने घर से ज्यादा सुकून इन महानगर की सड़कों पर सोने में आता हैं….. तब मैं आपको बता देता हूँ इसकी वज़ह भी उनकी और उससे भी ज्यादा ज़रूरी अपने बच्चों और परिवार की भूख मिटाने की ज़िम्मेदारी निभाने की कोशिश बड़ी इमानदारी से करते हैं और उनमें से कई अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हुए नशे में डूबे एक तबके की बड़ी गाड़ियों के पहियों तले रौंद भी दिए जाते हैं…. पर मौत सिर्फ उनकी नहीं होती जो रौंदे जाते हैं मौत होती हैं पूरे परिवार की….. पर ये दर्द कौन समझे ? वैसे भी बात जब इन्साफ की आती है तो उसमें भी बची हुई ज़िन्दगी ख़त्म हो जातीं हैं और मिलती हैं सिर्फ तारीख…

आखिर क्यों एक तबका आज भी सडकों पर जीता हैं.. मरता हैं… कौन ज़िम्मेदार हैं.. वो जिसने कुचला… या फिर वो जो तरक्की के नाम पर खुद को देश का महाराज समझ बैठे हैं…….. ये भी सवाल नहीं हैं.. दरअसल ये दूसरा तमाचा हैं…. अब तक देश में हुए ठेकेदारों के मुंह पर..

हिंदुस्तान की रक्षा सरहद पर जवान करता है और अन्दर किसान ये भी किसी महान व्यक्ति ने कहा हैं शायद उन्होंने जवान और किसान दोनों के दर्द को समझा और नारा भी दिया गया ‘जय जवान जय किसान’ तो क्या देश में कुर्बानी का ठेका सिर्फ जवानों और किसानों ने ले रखा हैं वहां सरहद पर जवान शहीद होता हैं सिर्फ उस आदेश के इंतज़ार में जिसमे उसे पता चलता की उसे लड़ना हैं की नहीं… फिर उसके परिवार को मिला क्या एक शहीद की निशानी.. मुआवजा .. चिता पर सलामी कुछ दिन की उसके बहादुरी के किस्से जो धीरे-धीरे सुनाई देने भी बंद हो जाते हैं… बचती हैं सिर्फ उसकी पत्नी, बच्चों, माँ-बाप के आँखों से छलकती सुखी हुई आंसुओं की धार जो शायद किसी को दिखाई नहीं देती…….. तो दूसरी ओर शहीद होता खेतों में खून बहाता क़र्ज़ में डूबा वो किसान जिसके खून से सिंची फसलों को पानी के भाव की कीमत नहीं मिलती… और गिद्ध रूपी बैंक साहूकार उसके शरीर की बोटियों को नीलाम कर अपना क़र्ज़ वसूलना चाहते हैं… और वो किसान घुट-घुट कर अपने परिवार के साथ खुद को उन्हीं खेतों में दफन कर लेता हैं जिसे उसने अपने खून से सिंचा था…… या फिर बिना किसी गुनाह के खुद को सजाए मौत सुना कर चूम लेता उस फ़ासी के फंदों को जिसे गले लगाया था देश की आज़ादी के खातिर भगत सिंह, बिस्मिल,अशफाकुल्ला जैसे देश भक्तों ने…….. पर खेत में शहीद होने वाले किसान को मुआवजा तक नहीं मिलता ना ही मिलती हैं सलामी… उसे मिलती हैं सिर्फ कुर्की और नीलामी..

ये तीसरा तमाचा हैं अब तक के देश के भाग्यविधाताओं के मुंह पर…

देश को आज़ाद हुए सत्तर साल बीतने को हैं और हम आज भी लड़ रहे हैं भुखमरी,गरीबी से अब आप सोचेंगे कि ये गरीब, गरीब क्यों हैं?  गरीब इसलिए गरीब हैं की उसके पास पेट भर खाने को नहीं हैं, है तो वो शिक्षित कहां से होगा.. जब शिक्षित नहीं हो पाया तो काम नहीं मिलता . जब काम नहीं मिलता तो वो भुखमरी का शिकार बनता जाता हैं..और वो गरीब कहलाता हैं.

और हम और हमारे नेता इन बुनियादी ज़रूरतों को छोड़ कर लड़ रहे हैं सांप्रदायिकता, जातिवाद, आरक्षण की लड़ाई…  पर आज भी हमारे देश में लोग भूख से मर रहे हैं…..

ये क्या मैं पत्रकारों की बात करते करते कहां की बात करने लगा… डरता हूँ..,कही आप मुझे भी औरों की तरह देशभक्त या देशद्रोही ,भक्त, चमचा, दलाल, जैसे महान उपाधियों से सम्मानित ना कर दें इसलिए लिखने से डरता हूँ.. पर फिर भी दिल में ठहरी हुई बात आज निकल गई… मैं किसी को भी इन सभी घटनाओं का कसूरवार नहीं मानता क्योंकि हम सभी भटके हुए हैं तो कौन बात करेगा बुनियादी सवालों की……….  और जल्द ही तारीख 15 अगस्त 2017 आने वाली हैं और देश अपनी आज़ादी की 70वीं वर्षगांठ का जश्न मनाने में डूब जाएगा उस दिन सब अपने किये गए थोड़े से कामों का गुणगान ऐसे करेंगे जैसे की कोई एहसान कर दिया हो… हमेशा से यही होता आ रहा हैं.. आप सब भी सुनियेगा पर जब वापास आने लगिएगा उस कार्यक्रम के बाद तो थोड़े लड्डू ज़रूर बचा लीजियेगा और सड़क पर भीख माँगते लोगों, सडकों पर रहने वालों को, मजदूरों को, उन गरीब रेहडी वालों को दर्द से तड़पते अस्पताल के बाहर बिना इलाज हुए मरीजों को, बाज़ार में दुकानों के पास घूमते उन भूखे मासूम बच्चों को जो खाने के लिए गिडगिड़ाते हुए आशा भरी निगाहों से हाथ आगे किये कुछ खिलाने की गुहार लगाते रहते हैं .. इन सभी में से किसी को भी अपनी गाड़ी से उतर कर इनकी आँखों में आखें डाल कर इनके हाथों में 70वीं आज़ादी के जश्न का लड्डू रखकर सिर्फ एक बार कहना Happy Independence Day… खुद-ब-खुद अहसास हो जायेगा आज़ादी का मतलब …… आप सभी को मेरी तरफ से आज़ादी की सबसे पहले शुभकामनायें सिर्फ एक सवाल के साथ… क्या हम आज़ाद हो गए हैं !

 

 

 

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