दारिद्र्य दर्शन

Posted by srivarmunshi
May 26, 2017

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एक अध्ययन के अनुसार अपनी मातृभाषा में अभिब्यक्ति के लिए मानव मस्तिष्क में 350000 शब्दों का विशाल भंडार होता है। जबकि किसी अन्य भाषा में लिखने या बोलने के लिए उसके पास मात्र 5000 शब्द ही होते है जिन्हें वह तोड़ मरोड़ कर अपनी बात कहता और लिखता है। कुछ मामलों में 300 से 500 अतिरिक्त शब्द भंडार तब होता है जब वह इंसान किसी खास क्षेत्र में अध्यन किया हो। एक चिकित्सक या रसायनशास्त्री या अर्थशास्त्री अपने अध्ययन क्षेत्र के कुछ अतिरिक्त शब्दों का धनी हो सकता है।
अन्य भाषा में बोलने और लिखने के प्रति उसके प्रयास के पीछे अपने अतिरिक्त ज्ञान बखान करने और दूसरे को नीचा दिखाने की हिंसक प्रवृति काम करती है। हर समाज में एक ऐसा वर्ग होता है जो इस मानसिक विकृति का शिकार होता है, जो अपने आपको प्रबुद्ध और अभिजात्य वर्ग का समझता है। जैसे ब्रिटेन का अभिजात्य वर्ग फ्रेंच भाषा में बोलना अपनी शान समझता है वैसे ही हिंदुस्तान में टूटी फूटी अंग्रेजी में लिखने और बोलने का प्रयास करता हुआ मिल जाता है। अपनी अभिब्यक्ति की विफलता पर शर्मिंदा होने से बचने के लिए कुछ क्लिष्ट शब्दों के तलाश में रहता है।
हाल ही में एक नई प्रवृति देखने को मिली है जब नए शब्दो सृजन और प्रयोग प्रचलन में आया है। किंतु इनमे ज्यादातर शब्द या तो प्रतिक्रियात्मक, भड़काऊ और अपमानजनक पाये गए हैं। ये शब्द भी मूल शब्द नहीं होते और मात्र शब्द संग्रह होते हैं जो भाषायिक शब्दो के परिधि में नहीं आते।
कितना अच्छा होता कि हम कुछ कह पाते और सुन पाते।

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