धर्म के नाम पर विवाद क्यों? by kamna

Posted by kamna ks
May 27, 2017

Self-Published

भारत एक विशाल देश है| इसमें अनेक धर्मानुयायी, विभिन्न जातियों, अलग -अलग भाषा वाले  लोग रहते है|  यहाँ वेषभूषा, खान -पान, बोलचाल की दृष्टि से विभिन्नता लक्षित होती है, किन्तु  इस अनेकता के पीछे एकता की भावना निहित रही है|  यह यहाँ की सामाजिक संस्कृति की विशेषता रहती है|  एकता की इस अनुभूति ने हमें सामाजिक, राजनैतिक जीवन के निर्माण में मदद की है|

वर्तमान समय में राष्ट्रीय एकता की सर्वाधिक आवश्यकता अनुभव की जा रही है| ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? इस पर विचार  करने की  आवश्यकता है| आज देश में विघटनकारी तत्व तेज़ी से अपना ज़ोर पकड़ रहे है| कश्मीर, पंजाब, असम, आदि स्थानों पर उग्रवादी शक्तियाँ खुलकर खेल रही है|  इससे हमारे राष्ट्र की एकता और अखंडता को ख़तरा उत्पन्न हो गया है| कश्मीर और पंजाब की आतंकवादी गतिविधियों ने न जाने कितने ही निर्दोष व्यक्तियों की निर्मम हत्या की है|   यह दौर अभी तक थम नहीं पाया है, यद्दीप सरकार   विभिन्न उपाय बरत रही है| किंतु अभी तक कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं हो सका है| इन  विघटनकारी तत्वों को सख्ती के साथ दबाने की  आवश्यकता है|

हमारे देश में कुछ लोग या समुदाय सांप्रदायिक बुद्धि उत्पन्न करने  में बढ़ -चढ़  कर काम करते है| देश में राम -जन्म मंदिर और बाबरी मस्जिद का संघर्ष इसी  बुद्धि का परिणाम  है| ऐसा प्रतीत होता है कि देश के सम्मुख यही सबसे बड़ी समस्या है|  सांप्रदायिक  विद्वेष को मिटाना अत्यंत आवश्यक है|  सभी धर्मों में सही कहा गया है – “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना”| हम नि:संकोच कह सकते है कि यदि हमने अपनी सांप्रदायिक बुद्धि का परित्याग नहीं किया और जात-पात के भेदभाव को नहीं मिटाया तो हमारा पतन निशिचत है|  प्रतिशोध और विदवेष की भावना से किया गया कोई भी काम ठीक से नहीं होता है| प्रतिगामी शक्तिया कुछ समय के लिए भले ही विजय हो जाएं, पर अंत में मानव-धर्म की विजय निशिचत है|

भारत में कुछ समय से ऐसा वातावरण बनता चला जा रहा है की छोटी-छोटी बातों पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे है| जैसे कि गुजरात, कश्मीर, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुए हिंसक प्रभाव इस बात के सबूत है| यहाँ युवाओं और आम जनता में आपसी विश्वास समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है|   इसमें राजनीतिज्ञों एव मीडिया ने भी दुरंगी चाल चली है| स्वार्थी  राजनीतिज्ञों ने लोगो को धर्म और मज़हब के नाम पर भड़काया और मीडिया ने नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ा-चढ़ा कर उछाला| विदेशों तक में ऐसी छवि प्रस्तुत की गई है कि भारत में सांप्रदायिक सदभावना का वातावरण नहीं है| किसी एक विशेष दल को कुटिल राजनीति का निशाना बनाया गया| इस स्थिति अत्यंत चिंताजनक है|  हमें यह बात भली प्रकार से समझ लेनी चाहिए कि कोई सा भी धर्म किसी के साथ बैर-भाव रखना नहीं सिखाता| सभी धर्म परोपकार, प्रेम और एकता का संदेश देते है|

आज के समय इस पंक्ति  का महत्व सही है कि ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ फिर भी लोग इसका सही अर्थ क्यों नहीं समझ पाते| यह कहना बहुत मुश्किल है, क्योंकि आज के वक़्त और माहौल को देखते हुए हम यह कह सकते है,जहाँ एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के प्रति असहिष्णु होते जा रहे हैं वहीं अनेक घटनाएँ पैदा होने लगी है जैसे की सहारनपुर जगह इस बात का सबूत है| क्या ऐसा करने से हमारे देश की एकता बच पाएगी? यह एक विचारनीय बात है? अगर हम देखें की संसार में बहुत सारे धर्म हैं. सभी धर्म अपनी-अपनी मान्यताओं, आस्थाओं विश्वासों, सिधान्तों एवं जीवन-दर्शन पर आधारित हैं. इस प्रकार इन धर्मों में अनेकरूपता की महत्वता होती है, परन्तु यदि गौर से देखा जाए तो सभी धर्मों के मूल में अदभुत रूप पाया जाता है. कुछ बातों एवं सिधान्तों में ये अवश्य अलग हो सकते हैं, पर वे बहुत स्वरूप होते हैं|  जैसे-कोई धर्म मूर्ति-पूजा का समर्थन करता है तो कोई विरोध, कोई पुनर्जन्म के सिद्धांत में आस्था रखता है तो अन्य नहीं, परन्तु संसार के सभी धर्म नैतिकता का ही दूसरा नाम हैं|

अगर हम देखें संसार के विभिन्न धर्म हमें प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, बुराई से अच्छाई की ओर तथा पाप से पुण्य की ओर ले जाते हैं, फिर कोई भी धर्म के नाम पर खिलवाड़ कर सकता है? यदि कोई धर्म  वैर, हिंसा, क्रूरता, घृणा की शिक्षा देता है, तो फिर उसे हम किस धर्म का समझ सकते है? यह एक ऐसी परिस्तिथि है कि आजकल धर्म के नाम पर बैर, घृणा तथा हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं, पर इनके पीछे स्वार्थी धर्माचार्यों का हाथ होता है|  हमें याद रखना चाहिए कि धर्म व्यक्ति से जोड़ता है, तोड़ता नहीं|  इसके लिये सबको मिलकर प्रयास करना होगा तभी हमारा देश और यह विश्व मनुष्यों के लिये एक बेहतर स्थान बना रहेगा|

हमारे देश में धर्म और  मज़हब को  मानने की पूरी आज़ादी है, किंतु इसका अनुचित लाभ नहीं उठाया जाना चाहिए| धर्म और मज़हब तभी तक सुरक्षित है जब तक देश सुरक्षित है| यदि देश की आज़ादी ही खतरे में में पड़ जाएगी तो हम और हमारा धर्म कहीं के भी नहीं रहेंगे| हमें इन बातों को प्रोत्साहित करना है जिनसे एकता की भावना मज़बूत होती है| भावनात्मक एकता की आज सबसे अधिक ज़रूरत है| यदि देशवासी इस भावना को पूर्णतः अंगीकार कर ले, तो देश एकता के सूत्र में  बंध जाएगा| मज़हब और धर्म से जितना कलहारी लगता है, अंदर से उतना ही शांतिदायक है| हमें इसका सच्चा अर्थ जानना चाहिए| आज भारत को इसी भावना की परम  आवश्यकता है|     

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