न बोलता, न सुनता हूँ, सिर्फ़ बदनाम होता हूँ: आईआईएमसी (IIMC)

Posted by Lalit Aamod Kumar
May 19, 2017

Self-Published

भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली. Photo by: Lalit Kumar Singh, RTV 2015-16

जो लोग भी आईआईएमसी के हालिया विवाद के पक्ष या विपक्ष में सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं, ये लेख उन सभी के लिए है.
2015 से अब तक जितने भी विवाद हुए हैं चाहे वो 2015-16 वाला दलित-सवर्ण विवाद हो, उसके बाद दीक्षांत समारोह से लेकर नरेन सिंह राव और रोहिन के सस्पेंशन वाला मामला हो या फिर आरटीआई विवाद से लेकर अब हवन या कल्लूरी वाला मामला हो.  इन सभी विवादों की वजह से संस्थान की अच्छी खासी बदनामी हुई है, जो अब भी होने पर ही है. हम छात्र(वर्तमान या पूर्व) संस्थान से पढने के बाद उससे इतने बागी कैसे हो सकते हैं? कि अपने हिसाब से “सच” या नैतिक लेख लिखने पर हम खुद संस्थान की ही बदनामी कर रहे हों.

मैंने अब तक जितनी भी पोस्ट या खबरें पढ़ी हैं, उन सभी में हर जगह प्रहार लगभग लगभग आईआईएमसी पर ही था. आईआईएमसी क्या है?

आईआईएमसी न तो कोई इंसान है, न उसके पास उसपर लग रहे अनेक आरोपों की सफाई देने का अधिकार है. ‘वो न बोलता है न सुनता है, बस जो कुछ भी चल रहा होता है उसमें बदनाम होता है’. आईआईएमसी के पास उसमें चल रही हज़ार हलचलों को रोकने तक का अधिकार जब नहीं है तो हम उस निर्जीव सी इमारत को क्यों दुःख दे रहे हैं? आईआईएमसी को नहीं पता कि यहाँ हवन करने से क्या होगा क्या नहीं. न ही आईआईएमसी कल्लूरी को जानता है, कल्लूरी और हवन से फायदे या नुकसान को केवल हम, आप और आईआईएमसी प्रशासन जानते हैं. आईआईएमसी को न तो उन 25 दलित कर्मचारियों की जात का पता था जिनको बिना नोटिस दिए संस्थान के प्रशासन ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था, न ही नरेन राव के कॉन्ट्रैक्ट की तारीख याद थी. किसी सस्पेंशन के बारे में आईआईएमसी के पास जानकारी नहीं थी. बल्कि आईआईएमसी को ये भी नहीं पता कि उसका जो पूर्व छात्र ये लेख लिख रहा है उसके साथ साथ संस्थान के कई छात्रों को आईआईएमसी की इजाज़त के बिना उसी के ट्विटर हैंडल से ब्लाक किया हुआ है. लेकिन ऊपर लिखी एक एक बात के बारें में महानिदेशक के जी सुरेश अच्छी तरह जानते थे और जानते हैं भी. क्योंकि संस्थान को बदनाम करने में वो खुद भी पीछे नहीं हैं.

सभी लिखने या आईआईएमसी पर विचार करने वालों से बस एक छोटी सी विनती है. “आईआईएमसी” लिखने से बेहतर है आप सीधे डीजी के नाम का प्रयोग करें और बल्कि अगर अभी तक आप ब्लाक नहीं हुए हैं तो उनको टैग करें, तब आपकी गुहार सही जगह पहुँच भी पाएगी. क्यूंकि महानिदेशक ही आईआईएमसी के कर्ता-धर्ता हैं या बल्कि उन्हें तो मालिक ही कह लीजिये. यहाँ की हर एक अच्छी बुरी चीज़ या गतिविधियों का ज़िम्मेदार  केवल आईआईएमसी प्रशासन है, और कोई नहीं.

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नोट: ऊपर लिखे हुए सभी सुझाव और विचार मेरे खुदके हैं. अगर इसे पढने के बाद किसी की भावनाएं आहत हो जाएँ, उसके लिए वो स्वयं ज़िम्मेदार होगा. संस्थान का एक पूर्व छात्र होने के नाते ये लेख लिखना मेरे लिए ज़रूरी था. क्यूंकि भिन्न भिन्न लेख लिखने वालो को भी आईआईएमसी और महानिदेशक के बीच का अंतर जानना बेहद ज़रूरी है.

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