पर्यावरण को बचाये रखना हमारी ज़िम्मेदारी : पर्यावरण की स्थिति

Posted by Abhishek Rai Sahab
May 31, 2017

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

आज यानि कि 5 जून को पर्यावरण दिवस है। पर्यावरण दिवस बिलकुल हम सभी मना रहे हैं, इसमें कहने की क्या बात है ये तो हमारा मौलिक अधिकार है एक दिन में प्रकृति के लिए चिंतन उमड़ आना, अरे भई इससे लगता है कि हम प्रकृति को बचाना चाहते हैं, वो बात अलग है कि प्रकृति बचे न बचे…

ये पर्यावरण की जिम्मेदारी है वो बचे या न बचे… हमने तो अपना काम किया !!!

कई लोग ये कह के फिर वही अपना रोज़ का रोना आज गर्मी ज्यादा है कि इस बार बारिश कम पड़ी या ज्यादा, और इस बार तो फसल भी ठीक से नहीं होगा बारिश जो नहीं हुआ। अब ये सोचिये ऐसा क्यों हो रहा है क्या एक दिन काफी है इस सबके लिए नहीं मतलब मनाइये खूब मनाइये लेकिन सिर्फ फोटो खिचवाने के लिए नहीं या social networking media पर खुद का पेड़ लगाते हुए फोटो डालने के लिए ही नहीं ।

ये मैं क्यूँ कह रहा हूँ या बाकी जो लोग प्रकृति को बचाने मैं लगे हुए हैं वो क्यूँ कह रहे हैं… शायद पगला गए हैं और कुछ काम धंधा नहीं है का… आइये एक नज़र डालते फिर शायद किसी एक का भी अगर नजरिया बदला या वो जागरूक हुआ तो मेरा या न सब लोगो का जो इस कोशिश में लगे हुए हैं कि किसी तरह प्रकृति का शोषण न हो… तो  मक़सद पूरा हो जायेगा…. देखिये

 

पर्यावरण की स्तिथि

पृथ्वी के सभी प्राणी एक-दूसरे पर निर्भर है तथा विश्व का प्रत्येक पदार्थ एक-दूसरे से प्रभावित होता है। इसलिए और भी आवश्यक हो जाता है कि प्रकृति की इन सभी वस्तुओं के बीच आवश्यक संतुलन को बनाये रखा जाये। इस 21वीं सदी में जिस प्रकार से हम औद्योगिक विकास और भौतिक समृद्धि की ओर बढ़े चले जा रहे हैं, वह पर्यावरण संतुलन को समाप्त करता जा रहा है। अनेकानेक उद्योग-धंधों, वाहनों तथा अन्यान्य मशीनी उपकरणों द्वारा हम हर घड़ी जल और वायु को प्रदूषित करते रहते हैं। वायुमंडल में बड़े पैमाने पर लगातार विभिन्न घटक औद्योगिक गैसों के छोड़े जाने से पर्यावरण संतुलन पर अत्यंत विपरीत प्रभाव पड़ता रहता है। मुख्यतः पर्यावरण के प्रदूषित होने के मुख्य कारण हैं – निरंतर बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण, वाहनों द्वारा छोड़ा जाने वाला धुआँ, नदियों, तालाबों में गिरता हुआ कूड़ा-कचरा, वनों का कटान, खेतों में रसायनों का असंतुलित प्रयोग, पहाड़ों में चट्टानों का खिसकाना, मिट्टी का कटान आदि।

भूमि प्रदूषण

पर्यावरण की रक्षा के लिए मृदा, जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम अनिवार्य है। भूमि-प्रदूषण का कारण है – वनों का विनाश, खदानें, भू-क्षरण, रासायनिक खाद तथा कीटनाशक दवाओं का उपयोग आदि। भूमि की उर्वरता बढ़ाने हेतु रासायनिक खाद का तथा फसल को कीड़ों और रोगों से बचाने के लिए कीटनाशक दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो भूमि को प्रदूषित कर देते हैं। इनके कारण भूमि को लाभ पहुंचाने वाले मेंढक व केंचुआ जैसे जीव नष्ट हो जाते हैं जबकि फसलों को क्षति पहुंचाने वाले कीड़े-मकोड़ों से बचाव में यही जीव सहायक होते हैं। अत: कृषि फसल में एलगी, कम्पोस्ट खाद तथा हरी खाद का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि खेतों में ऐसे लाभदायक जीवों की वृद्धि हो सके जो खेती की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकें। कृषि तथा अन्य कार्यों में कीटनाशकों के प्रयोग की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अधिकांश कीटनाशकों को विषैला घोषित किया है, बावजूद इसके हमारे देश में तो इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।

जल प्रदूषण

पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा जलमग्न है फिर भी क़रीब 0.3 फीसदी जल ही पीने योग्य है। विभिन्न उद्योगों और मानव बस्तियों के कचरे ने जल को इतना प्रदूषित कर दिया है कि पीने के क़रीब 0.3 फीसदी जल में से मात्र क़रीब 30 फीसदी जल ही वास्तव में पीने के लायक़ रह गया है। जल प्रदूषण के कारण अनेक बीमारियाँ जैसे – पेचिश, खुजली, हैजा, पीलिया आदि फैलते हैं। चूंकि अब जल-संकट गंभीर रूप धारण कर चुका है अत: जल-स्रोतों को सूखने से बचाने के साथ-साथ जल-प्रदूषण को रोकने के उपाय भी करने होंगे। निरंतर बढ़ती जनसंख्या, पशु-संख्या, औद्योगीकरण, जल-स्रोतों के दुरुपयोग, वर्षा में कमी आदि कारणों से जल-प्रदूषण ने उग्र रूप धारण कर लिया है। नदियों एवं अन्य जलस्रोतों में कारखानों से निष्कासित रासायनिक पदार्थ व गंदा पानी मिल जाने से वह प्रदूषित हो जाता है। नदियों के किनारे बसे नगरों में जल-अधजले शव तथा मृत जानवर नदी में फेंक दिये जाते हैं। कृषि-उत्पादन बढ़ाने और कीड़ों से उनकी रक्षा हेतु जो रासायनिक खाद एवं कीटनाशक प्रयोग में लाये जाते हैं वे वर्षा के जल के साथ बहकर अन्य जल-स्रोतों में मिल जाते हैं और प्रदूषण फैलाते हैं। नदियों, जलाशयों में कपड़े धोने, कूड़ा-कचरा फेंकने व मल-मूत्र विसर्जित करने से भी यह स्थिति पैदा होती है। ऐसे में जल का दुरुपयोग रोकना और मितव्ययिता से उसका प्रयोग करना आवश्यक है। बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है, यह कहावत अब चरितार्थ हो रही है। हमें वर्षा के जल को संरक्षित करना होगा।

वायु और ध्वनि प्रदूषण

पर्यावरण के लिए वायु और ध्वनि प्रदूषण भी कम घातक नहीं है। वायु में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड तथा शेष निष्क्रिय गैसें और जल वाष्प होती है। हवा में विद्यमान ऑक्सीजन ही जीवधारियों को जीवित रखता है। मनुष्य सामान्यत: प्रतिदिन बाईस हज़ार बार सांस लेता है और सोलह किलोग्राम ऑक्सीजन का उपयोग करता है जो कि उसके द्वारा ग्रहण किये जाने वाले भोजन और जल की मात्रा से बहुत अधिक है। वायुमंडल में ऑक्सीजन का प्रचुर भंडार है किंतु औद्योगिक प्रगति के कारण वह प्रदूषित हो चला है। घरेलू ईंधन, वाहनों की बढ़ती संख्या और औद्योगिक कारखाने इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। इससे निपटने के लिए कोयला, डीजल व पेट्रोल का उपयोग विवेक-पूर्ण ढंग से होना चाहिए। कारखानों में चिमनियों की ऊंचाई बढ़ायी जाए तथा उसमें फिल्टर का उपयोग किया जाए। घरों एवं होटलों में ईंधन के रूप में गोबर गैस व सौर ऊर्जा के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जाना चाहिए।

ध्वनि-प्रदूषण एक गंभीर समस्या है जो पर्यावरण ही नहीं संपूर्ण जीव जगत के लिए चुनौती है। जीव जंतुओं के अलावा पेड़ पौधे तथा भवन आदि भी वायु प्रदूषण से प्रभावित होते हैं। आये दिन मशीनों, लाउडस्पीकरों, कारों द्वारा तथा विवाहोत्सव, त्योहारों, धार्मिक कार्यों के अवसरों पर होने वाला ध्वनि प्रदूषण न जाने कितनों की नींद हराम करता रहता है। अनियंत्रित जनसंख्या, शहरों में यातायात के विविध साधनों, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समारोहों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों तथा कल-कारखानों के कारण बहुत शोरगुल बढ़ रहा है। लोग टेलीफोन और मोबाइल पर भी चीख-चीखकर बातें करते हैं। मल्टी स्टोरी आवासों तक में धीमे बोलने की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है। ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण हेतु क़ानून तो है पर उसका पालन नहीं किया जाता।

वर्तमान समय में हमारे द्वारा छोड़े जाने वाले धुएं इत्यादि का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि इराक युद्ध के समय इराक पर होने वाली बमबारी तथा वहाँ के तेल के कुओं में लगने वाली आग के कारण वायुमंडल में इतना विषाक्त पहुँच गया कि वहां दो-तीन बार काले पानी की वर्षा हो चुकी है। भारत में लगभग 4000 से अधिक रासायनिक कारखाने है जिनमें काम करने वाले अनेक रोगों से पीड़ित हो जाते है और अनेकों का तो जीवन ही समाप्त हो जाता है। वन और वृक्षों का विनाश प्रदूषण का एक मुख्य कारण है। इसके साथ ही विचार प्रदूषण में एक स्वार्थबद्ध एवं संकुचित विचार वायुमंडल में दूषित लहरियों का संचार करते है। इनके कारण अनेक पेड़-पौधे तथा फूलों की वृद्धि बाधित होती है तथा अनैतिक कार्यों की प्रेरणा प्राप्त होती है।

मेरी बात ये सब टाइप करके समाप्त ज़रूर हो रही है पर खत्म नहीं हो रही है | देखिये मुझे या बाकी लोगों क्या ज़रूरत इतना सब बोलने की या सब लिखने की हम भी तो बाकी सभी के जैसे अपना वही नौकरी/व्यापर, शादी/व्याह करके अपनी ज़िन्दगी काट सकते हैं |

” मैं 25 साल का हूँ मैं जब अपने ही उम्र के दोस्तों/भाइयों को बीमार होते हुए या किसी गंभीर बीमारी के शिकार होते हुए देखता हूँ तो मन मैं हलचल होती है कि जब इनका ये हाल है तो जो आने वाली नस्ल है उसका क्या होगा वो तो पैदा ही बीमारी के साथ होगी और जो हो भी रहा है | मतलब हमें अपने लिए तो सावधान होना ही होना है आने वाली पीढ़ी का ख्याल भी रखना है | “

देखिये इस तरह मैं और मेरे जैसे जाने कितने ही ऐसा लिखते हैं और लोग पढ़ते तो हैं पर पढ़ने के बाद वही थोड़ा बहुत चेहरे के हाव भाव बदल के फिर वही रोज़ के ढर्रे पे लग जाते हैं |

हम प्रकृति को बचाने का प्रकृति पे कोई एहसान नहीं कर रहे…     यदि  !!! प्रकृति नष्ट तो जीवन नष्ट !!

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.