पांच दिन महिला पवित्र या अपवित्र?

Posted by Nidhi GauranShe
May 31, 2017

Self-Published

पांच दिन महिला पवित्र या अपवित्र?

विश्व मासिक धर्म स्वच्छता दिवस 28 मई विशेष

ईश्वर ने जब स्रष्टि की रचना की तो उसने स्त्री और पुरुष नामक दो प्रजाति की रचना की तथा उसमें अनेक विभिन्तायें रखते हुए एक दुसरे से अलग बनाया | इन विभिन्नताओं में जहाँ महिला को प्रेम, करुणा, दया, ममता, वात्सल्य, स्नेह से परिपूर्ण बनाया वही पुरूषों को साहस, पराक्रम, शौर्य जैसे गुणों से सुशोभित किया है | महिला के जहाँ बेटी, माता, बहन, पत्नी, भाभी, चाची, मामी, मौसी जैसे रूप देखने को मिलते है वही इसके विपरीत पुरुषों के | इन विभिन्नताओं और रूपों के साथ धरती पर माँ को सर्वश्रेष्ट स्थान दिया गया है और किसी भी महिला का माँ बनाना तब तक संभव नहीं जब तक उसे मासिक धर्म न आते हो | पर वास्तव में ये मासिक धर्म होता क्या है महिलाओं को यह नहीं पता |

मासिक धर्म स्त्रियों को हर महीने योनि से होने वाला रक्त स्राव है। 9 से 14 साल की आयु की लड़की का अंडाशय हर महीने एक विकसित अंडा उत्पन्न करना शुरू कर देते हैं। वह अण्डा फैलोपियन ट्यूब के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका अस्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। यदि उस अंडे का पुरूष के शुक्राणु से मिलन नहीं होता तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म, रजोधर्म या माहवारी कहते हैं। मासिक धर्म महीने में एक बार होता है, सामान्यतः 28 से 35 दिनों में एक बार। अधिकतर मासिक धर्म तीन से पांच दिन रहता है |

मासिक धर्म भारतीय परिपेक्ष में- भारत में सामान्यतया यहाँ पाया गया है की लड़कियों को मासिक धर्म की पूरी जानकारी नहीं होती और इसी वजह से उन्हें बहुत समस्या और दुविधा का सामना करना पड़ता है। पहली बार माहवारी आने पर ही लड़की अपराध बोध एवं डर से ग्रसित हो जाती है। उसमें हीनता की भावना पैदा हो जाती है। इसे शर्मसार करने वाली घटना माना जाता है |इसके बारे में खुल कर बात करने को बेशर्मी माना जाता है| जिसके कारण आज 20% लडकियाँ पीरियड्स शुरू होने पर स्कूल जाना छोड़ देती है | क्योंकि उन्हें इस बारे में घर में न तो कोई जानकारी देता है न ही कोई उनकी मदद करता है | उनके पास सेनेटरी नैपकिन खरीदने के पैसे नहीं होते, विद्यालयों के शौचालय अत्यधिक गंदे रहते है, वे ऐसे गंदे कपड़े का प्रयोग करती हैं जो स्वच्छ व संक्रमणरहित नहीं होता, वे उस कपड़े को धूप में नहीं सुखाती जो वैजाइनल फंगल इनफैक्शन, सर्वाइकल कैंसर, उट्रेस कैंसर का कारण बनता है, क्योंकि गीले कपड़े में मौइश्चर रहता है जिससे बैक्टीरिया पनपने की संभावनाएं रहती हैं |

प्राचीन काल में मासिक धर्म को अपवित्र प्रक्रिया मान कर महिलाओं के साथ छुआछूत किया जाता है और‘अपवित्रता’ का आलम ये था कि उन 5 दिनों में महिलाओं के लिए सभी धार्मिक-सामाजिक  कार्य वर्जित थे, जिसमें पूजा पाठ में भाग लेना निषेध, रसोई घर में न जाना, एक ही वस्त्र पहनना, सर न धोना, अलग खाना, पिने के बर्तनों, मटकों को न छूना, आचार न छूना, एक कमरे में जमीन पर चटाई बिछाकर रहना सोना, कई स्थानों पर महिला को अपने पति के पास नहीं सोने देना,पेड़-पौधों को पानी न देना आदि |

पर क्या ये संभव है ? एक तरफ हम हर धार्मिक कार्य से महिलाओं को वंछित कर देते है वही हम चारों और विद्यमान अद्रश्य दिव्य शक्तियों से उन्हें दूर नहीं कर सकते जैसे जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी आदि को जिन्हें देवता माना गया है तो आप कैसे इन दक्यानुसी विचारों के कारण महिलाओं को इन रीति रिवाजों को मानने के लिए बाध्य कर सकते है | कैसे माँ सरस्वती स्वरूपा कागज, कलम,शिक्षा को, जीवनदायक पवन देवता स्वरुप ऑक्सीजन को दूर कर सकते है ? जीवतत्व जल को जीवन से हटा सकते हो?

वास्तव में मासिक धर्म और इससे जुड़े छूआछूत का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं | मासिक धर्म या माहवारी एक सहज वैज्ञानिक और शारीरिक क्रिया है| लेकिन महिलाओं पर लगाई जाने वाली सामाजिक पाबंदियों से ये दिन किसी सजा से कम नहीं है. खासकर किसी त्योहार के समय ऐसा होने पर काफी दिक्कत और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है | जबकि दूसरी ओर देखे तो गुवाहाटी की नीलांचल पहाड़ियों में स्थित कामाख्या मंदिर है इस मंदिर में प्रतिवर्ष ‘अम्बूवाची’ पर्व का आयोजन होता है। ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची’ मेले’ के दौरान मां कामाख्या के माहवारी होती हैं। लाखों देशी-विदेशी, साधु संत, तांत्रिक, अघोरी, नकारात्मक शक्तियों के उपासक आदि बड़ी संख्या में सिद्धियों की प्राप्ति हेतु वहाँ जाते है | देवी की माहवारी के दौरान तीन दिन के लिए मंदिर का द्वार बंद कर दिया गया। चौथे दिन विशेष पूजा-अर्चना के पश्चात मंदिर के बंद कपाट खोले जाते है| इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा  पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं। मंदिर के पुजारियों द्वारा मनमानी दक्षिणा लेकर ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं। बहुत से ज्योतिषी, साधू और तांत्रिक यहीं से ये वस्त्र खरीदते हैं और उसे अपने यहाँ ले जाकर उस वस्त्र के छोटे छोटे टुकड़े कर उसे ‘कमिया सिंदूर’ और ‘कमिया वस्त्र’ आदि नामों से मनमाने दामों पर बेचते है |

गजब का भारत, जो देवी मंदिर में विराजित है वो पवित्र और जो घर में साक्षात् रूप में विद्यमान है वो अपवित्र | वास्तव में अपवित्र महिलाएं नहीं लोगों की मानसिकता है कोई ईश्वरीय आराधना पूजा करने से किसी को नहीं रोक सकता | प्राचीनकाल में रिवाज बनाये गए थे वो केवल महिलाओं को उन दर्दभरे दिनों में आराम देने के लिए बनाये गए थे क्युकी महिलाएं अत्यधिक शारीरिक श्रम करती है लेकिन हमारे पूर्वजों ने उसकी व्याख्या करने में गलती करदी |

शर्म करने की बात है एक तरफ तो हम चांद तक पहुंच चुके हैं और दूसरी ओर  आज भी मासिकधर्म के अंधविश्वास से नहीं निकल पाए | सोचिये जरा की यदि प्रतिभा पाटिल, इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, साक्षी, बछेदरी पाल, आरती शाह, पी.वी. संधू, विजयलक्ष्मी पंडित, कल्पना चावला, सुनीता विलियम, पी. टी. उषा, शगुन चौधरी, कृष्णा पुनिया, लता मंगेशकर, श्रेया घोषाल, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, सानिया नेहवाल आदि के माँ बाप ने उन्हें मासिक धर्म के आडम्बरों और प्रचलित रीति-रिवाजों की दुहाई देकर घर में बैठा दिया होता अंधकार की दुनिया में तो हम वैश्विक पटल पर कहा होते?

अत: आवश्यता है मासिक धर्म से सम्बंधित आडम्बरों , रीति रिवाजों को दूर करने के लिए एक सर्वव्यापी सशक्त मुहीम चलने की ताकि समाज में मासिक धर्म को सम्मान की द्रष्टि से देखा जाये न की श्राप की द्रष्टि से | महिला और परिवार के सभी सदस्यों को यह समझना चाहिए की वंश इसके बिना नहीं चल सकता, मानव की उत्पत्ति माहवारी के बिना संभव ही नहीं है | अतः माहवारी या मासिक धर्म गर्व की बात है ना कि शर्म, हीनता, तनाव, कुंठा आदि की |

निधि प्रजापति

राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता

 

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