फेल बच्चे नहीं, आप हुए हैं.

Posted by Deepak Bhaskar
May 31, 2017

बिहार इंटरमीडिएट का रिजल्ट हर साल खबर बनाता है. पिछले साल रूबी राय के टॉपर होने पर खबर और अब बड़ी संख्या में छात्रों के फेल होने की खबर. सरकार के शिक्षा मंत्री ने, इस रिजल्ट को ऐतिहासिक बता कर अपनी पीठ थपथपा लिया है. प्रशासन ने कदाचार पर काबू पाने का तमगा, अपने गले में लटका लिया है. ओपोजिसन पार्टी ने सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया है. अभिवावक ने भी बच्चों पर सारा दोष मढ़ दिया है. समाज ने हर साल की तरह, पास हुए बच्चों का आएएस बनना तय कर दिया है. सच है कि “सक्सेस हैज मैनी फादर बट फैलीयर इज एन ऑर्फ़न”. फेल हुए बच्चे, अपराधिक छवि लिए घर के किसी कोने में बैठे हैं. जो बच्चे फेल होकर कुछ गलत करने का सोच रहे हों उनसे कहना है कि मैं दो ऐसे छात्रों को जानता हूँ जो इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल हुए थे और आज एक आएएस तो दूसरा दिल्ली विश्विद्यालय में लेक्चरर है. बहरहाल, छात्रों के ऊपर दोष मढ़ देने से बाकि सब दोषमुक्त कतई नहीं हो जायेंगे.

आज सवाल छात्रों से किया जा रहा है कि वो पढ़ नहीं रहे हैं, मेहनत नहीं कर रहे हैं, अगैरह-वगैरह. तो क्या पढ़ने के लिए सिर्फ छात्र की जरुरत होती है. शायद हम भूल रहे हैं कि एक छात्र को पढ़ने के लिए सरकार, शिक्षक, अभिवावक, समाज से लेकर तमाम सुविधाओं तक की जरुरत होती है. सवाल यह है कि इस देश में छात्र क्यूँ पढ़ेगा? जब उसे पता है कि नौकरियां या तो पैसे देकर लेनी है या फिर किसी के रेकमडेसन से. वह क्यूँ पढ़ेगा, जब उसे अंत में बेरोजगार ही होना है. आज जो पास हुए हैं, उसे मेरिट वाला कहा जा रहा है और कल इसी मेरिट वाले को “आएएस” नहीं बनने पर भोंदू कहा जायेगा. कोई ये पूछेगा कि जब हर अधिकारी, डिपार्टमेंट ओवरलोडेड होने का राग अलापता है तो सरकार ‘आएएस’ में सीटें कम क्यूँ करती जा रही हैं. पिछले तीन साल केंद्र सरकार ने नब्बे प्रतिशत सरकारी नौकरियों की कटौती की है, तो क्यूँ सवाल नहीं उठ रहा है. आज पास हुए मेधावी छात्र जब विश्विद्यालय पहुंचेंगे तो वहाँ हिंदी के प्रोफ़ेसर इन्हें राजनीतिशास्त्र कैसे पढ़ाएंगे? सरकार पिछले २५ साल से कह रही है कि विश्विद्यालय में १५ हजार प्रोफ़ेसर के पद खाली हैं और पिछले चार साल से ३५ सौ वाली वेकेंसी बीपीएससी से भरी नहीं जा रही है. तो सारा दोष छात्र पर मढ़ दीजिये!

शिक्षक को राष्ट्रनिर्माता कहा जाता है. बिहार में शिक्षक होंगे तभी राष्ट्र का निर्माण होगा. जिन्हें शिक्षक कहा जा रहा है वो “शिक्षा मित्र” के तौर पर नियोजित हुए थे लेकिन वो शिक्षा के दुश्मन हैं. मधेपुरा के स्कूल में बाथरूम में शिक्षकों ने मिट्टी भरवा दिया ताकि बच्चे जल्दी स्कूल से भाग जाये. शिक्षक स्कूल में आने वाली रकम को लूट कर, घर नहीं, महल बनाने में लगे हुए हैं. इनकी दहेज़ की रकम भी करीब दस से पंद्रह लाख रूपये हैं. मुस्लिम और आदिवासी टोले के स्कूलों में, शिक्षक सबसे ज्यादा पोस्टिंग चाहते हैं क्यूंकि उन्हें ये लगता है की इन बच्चों को पढ़ाने की जरुरत नहीं है. सरकार ने दक्षता परीक्षा भी ली और उसमें वो शिक्षक भी पास किये जिन्हें उसी राज्य के शिक्षा मंत्री का नाम तक पता नहीं था. तो मढ़ दीजिये सारा दोष छात्रों पर. कभी बिहार के शिक्षक समाज में अमीर लोगों की गिनती में नहीं थे लेकिन सबसे सम्मानित व्यक्ति होते थे. आज, समाज में शिक्षक सबसे धनाड्य वर्ग है. कभी इनकम टैक्स इनके घर पर छापा क्यूँ नहीं मारता? एक ही छात्र का नाम, कई क्लास में डालकर शिक्षक करोड़ों में छात्रवृति बटोर लेता है. वो अगर शिक्षक हैं तो चाणक्य को हमें शिक्षक वाली कटेगरी से हटा लेना चाहिए. छात्र स्कूल जाय तो ये शिक्षक उसे अपने कोचिंग में बुलाते हैं. शिक्षा प्रशासन वाहवाही लूट रहा है. मूल्याकन में किन शिक्षक को बुलाया था आपने, पहले उसकी लिस्ट जारी कीजिये. आप अपना भी फेलियीर, मढ़ दीजिये छात्र पर.

अभिवावक आज बच्चों को कठघरे में खड़ा किये हुए हैं. वो कब स्कूल जाकर छात्रवृति, पोषक आहार, सायकिल के सिवा, अपने बच्चों की पढाई को लेकर प्रिंसिपल से कुछ पूछा है. दिन भर खेत में काम करने के बाद उन्हें दो घंटे भी आपने पढ़ने को न दिया और आज सारा सवाल बच्चों से. पड़ोसी से भी लड़ने इसी बच्चे को भेजा था. अपनी गलती स्वीकारना तो अधर्म है. ये समाज जिसे सबसे ज्यादा खलबली रहती है. आज फेल होने पर कोस रहे हैं. ये वही समाज हैं जिसने पढ़े-लिखे लोगों को तिरस्कृत किया है. ज्यादा पढ़-लिख लेने का आरोप लगाया है. उसे पागल करार दिया है. याद कीजिये प्रसिद्द लेखक फनीस्वर नाथ रेनू को विधानसभा चुनाव हार गए थे और उनके नॉन मैटिक बेटे ने चुनाव जीत लिया था. तो कोई क्यूँ पढ़ेगा? आप दोष देते हैं की पढ़े-लिखे बिहारी बच्चे, वहां वापस नहीं जाना चाहते. किसलिए जायेंगे, आपका तिरस्कार झेलने! छात्र को तो हम जिस दिशा में ले जायेंगे, वो उसी दिशा में जायेगा. हमें मानना चाहिए कि छात्र फेल नहीं हुआ है, हम फेल हुए हैं. हमे छात्र को सिर्फ स्कूल नहीं बल्कि खुद भी जाना चाहिए. दिल्ली वालों अभिवावक से सीखना चाहिए. कई माँ-बाप अंग्रेजी सीख रहे हैं ताकि वो अपने बच्चे की किताब को पढ़ सकें. दिल्ली में बच्चों के साथ माँ-बाप भी पढ़ते हैं, तभी यहाँ फिर भी सब ठीक-ठाक है. फेल होने से कोई कमजोर नहीं हो जाता बल्कि हमारे तिरस्कार से हो जाता है.

डॉ. दीपक भास्कर, दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीति पढ़ाते हैं.