बापू फिर तुम कब आओगे …..

Posted by Hyder Ali Ashrafi
May 31, 2017

Self-Published

1894 से 1947 के बीच गांधीजी में बहुत बदलाव आये, पर 1947 में भी गोहत्‍या के मसले पर वो ये कह गये, “भारत में सिर्फ हिंदू ही नहीं रहते, यहां मुसलमान, पारसी, ईसाई और दूसरे धर्मों के लोग भी रहते हैं.” उनके कहने का अर्थ था कि कोई भी नियम बनाने के पहले सबकी इच्छाओं का सम्मान करना ही होगा. मुस्लिम और ईसाई समुदाय मांस खाता है. उनकी इच्छा के विरुद्ध मांसाहार पर प्रतिबंध कैसे लग सकता है? शाकाहार का एक समान नियम कैसे बन सकता है? महात्‍मा गांधी ”

मारो मारो……….. की आवाज मेरे कानो में लगातार गूंज रही थी / अचानक जब मै पीछे देखा तो आदमी आदमी को मारने में लगा है , अचानक गोली की आवाज और पूरा माहौल सन्ना गया / लड़ाई के पीछे का कारण सिर्फ और सिर्फ “एक गायं” थी / वो इंसान जिसे गाय से इतना प्यार है क्या वो अपनी को प्यार से पानी पिलाया है क्या उसे अपनी माँ से इतना प्यार है , अगर हाँ तो शायद ऐसे कर्म हिन्दुस्तान में नहीं होते /

‘जो अपने को गौ-रक्षक कहते हैं, वही गौ-भक्षक हैं. वे यही समझकर मुझे तार देते हैं कि मैं जवाहरलाल या सरदार से ऐसा कानून बनाने को कहूं, लेकिन मैं उनसे नहीं कहूंगा’
” महात्‍मा गांधी ”
इन सब इतहासिक कल्पनाओं को याद करते हुए हमारा देश अभी भी पुकारता है ” बापू फिर तुम कब आओगे “
वो यादे , वो बाते ,बापू क्यों छोड़ गए तुम ,
वो जातिवाद , वो भेदभाव को हटाना क्यों छोड़ गए तुम ,
वो लाठी ,वो चरखे , वो मुश्कान दिलो में क्यों छोड़ गए तुम ,
तुमने चरखे से घर , कूंचे और गलियो में जो सन्देश पहुचाये ,
वो यादे , वो बाते ,बापू क्यों छोड़ गए तुम ,

अहिंसा के पुजारी ,सत्य की राह दिखाने वाले ,
बापू लाठी वाले , ओ बापू लाठी वाले , क्यों छोड़ गए तुम ,
नोच रहे है भारत माँ के जिस्म को कुछ गिद्द,
ऐसे लोकतंत्र के भछको को हटाना क्यों छोड़ गए तुम
जाने न देंगे हम व्यर्थ आपकी शहीदी को ,
जाते जाते एक बात बता दो की ,….
बापू फिर कब आओगे तुम .
बापू फिर कब आओगे तुम /

एक सन्देश ……
जिस्म तो बहुत संवर चुके /
रूह का श्रिंगार कीजिये /
फूल शाख से न तोडिये /
खुश्बूओ से प्यार कीजिये

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