भीड़

Self-Published

पिछले दो-तीन सालों में जिस तरह भीड़ का उग्र रूप देखने का मिला है, जँहा ये कभी भी, कही भी कानून को अपने हाथ में लेने से झिझकती नही है और जुल्म के नये आयाम लिख रही है, इस से इसकी व्याख्या एक हथियार के रूप में की जा सकती है जँहा जो भी इसके सामने आता है उसे धवस्त कर दिया जाता है, ये एक इस तरह के आंतकवाद को जन्म दे रही है, जँहा एक ही मानसिकता को पाल रखे इतने चहरे एक साथ, घटना को अंजाम देते है, जँहा किसी एक की पहचान करना मुश्किल हो जाता है, नतीजन कानून की किताबो में गुन्हा तो दर्ज कर दिया जाता है लेकिन कही भी गुन्हेगार की पहचान नहीं लिखी जा सकती और हो भी कैसे, गुन्हेगार भीड़ का हिस्सा, भीड़ में इस तरह खो जाता है की उसका कोई बाल भी बांका नही कर सकता.

ये भीड़ ही है, जो आज कश्मीर में भी मौजूद है और भारत के हर शहर में, खास कर उत्तर भारत के गिने चुने राज्यो में ये आज कल ज्यादा सक्रिय है, जँहा राजनीति का केशरी रंग, अपने जोबन पर खिला हुआ है, बस इस भीड़ का फर्क इतना है कि जँहा कश्मीर में ये अपनी पहचान छुपाने के लिये चहरे को कपड़े से ढक कर पथराव करते है, वही दादरी, अलवर, सहारनपुर, झारखंड, इत्यादि जगह पर इन्हे अपनी पहचान छुपाने में किसी भी तरह का कोई मलाल नही है, इसके विपरीत ऐसा लगता है की यँहा भीड़ में अपनी पहचान को सार्वजनिक करना एक चलन बन गया है और इसे एक टशन का नाम भी दिया जा सकता है, लेकिन कश्मीर की भीड़ और बाकी जगह की भीड़ में एक फर्क देखा जा सकता है, जँहा कश्मीर में, चेहरे से ढकी हुई भीड़ को कही ना कही सुरक्षा बलों का भय होता है वही देश के बाकी हिस्सों में सार्वजनिक पहचान को एक तगमें की तरह लहराती हुई भीड़, यु प्रतीत होता है कि इस भीड़ को कही भी, किसी भी सरकारी बल का कोई अंदेशा या ड़र नही है. इसका कारण भीड़ की ये मानसिकता भी हो सकती है कि वह, यही भीड़ सही मायनों में समाज के अंदर कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिये सामाजिक कल्याण हेतु, भय और एक तरह के आंतकवाद को प्रचलित कर रही है.

अगर, ये भीड़ का दृष्टिकोण सभी के लिये एक समान होता तो इसे रोबिन हुड कहा जा सकता था लेकिन दादरी, अलवर, सहारनपुर, झारखंड की ये भीड़ किसी एक या दो समुदाय को ही अपना निशाना बना रही है और इसके कारण भी इतने सटीक होते है, की कोई भी व्यक्ति जिसका जन्म भारत देश में हुआ हो, वह फोरन इस पर यकीन कर लेता है, इस तरह के कारणों को जन्म देने से ये भीड़ इस तथ्य की तरफ भी इशारा करती है की ये भीड़ मात्र जज्बात से नही बल्कि पूरी बुद्धिमानी से, एक तरह तय सुदा, योजना बंध तरीके से हमला करती है, इसलिये ये भीड़, बाकी सभी हथियारों से ज्यादा खतरनाक नजर आती है, जँहा ये अपने लक्ष पर ही निशाना लगाती है वही इसको मार्ग दर्शन देने वाला चेहरा कभी सामने नहीं आता और शायद कभी सामने भी नहीं आयेगा. वह कोन हो सकता है इसका बस अंदाजा मात्र लगाया जा सकता है लेकिन कोई सटीक उत्तर मिलना असंभव है, परंतु आज इस भीड़ की कार्यशैली को देखने से इसके मुख्य मार्गदर्शक के बारे में ये जरूर कहा जा सकता है की इन्हे इस तरह के कार्यो का जँहा भीड़ और भीड़ द्वारा किये जा रहे जुल्म का एक लंबा अनुभव जरूर होगा.

दादरी और अलवर में जँहा इस भीड़ ने अपने बल के साथ अपनी चतुराई को भी पेश किया, यँहा दोनों जगह एक मुसलमान व्यक्ति ही इस भीड़ का निशाना था और इसकी वजह गोरक्षा से जोड़ दी गयी, अब इस तथ्य के पीछे क्या चतुराई थी ये कही भी कहने की जरूरत नही है लेकिन इस भीड़ ने जँहा अलवर में एक जिंदा गाय का बचाव करते हुये एक आदमी की दौड़ा-दौड़ा कर हत्या कर दी, वही दादरी में महज 4 किलो मीट जो की फ्रिज में पाया गया उसके लिये भीड़ ने एक इंसान को हलाक कर दिया. और हाल ही में झारखंड के बागबेरा और राजनगर, में भी भीड़ ने  बस बच्चो को उठाने के शक के कथन पर 7 लोगो को अपने आंतक का निशाना बना दिया. अब, भीड़ के हौसले इतने बुलंद है की अब भीड़ के आंतक का क्षेत्र काफी ज्यादा बढ़ गया है पिछले दिनों इसने गोरक्षा के नाम पर जम्मू कश्मीर का रियासी डिस्ट्रिक्ट, दिल्ली के कालका जी, आसाम का नागाओं डिस्ट्रिक्ट और अब किसी औरत के साथ बदसलूकी के शक में उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर में भी, अपना आंतक दिखाया है.

अब इस भीड़ का एक और तथ्य सामने आया है और ये भी राजस्थान के अजमेर जिले के एक गाँव से है, जँहा यही भीड़ तीन से चार सिख व्यक्तियों को बुरी तरह पीट रही और अधमरा कर दिया है. भीड़ में से एक शख्श इसका वीडियो भी बना रहा है जिसके चेहरे की मुश्कान भीड़ की बढ़ रही मान्यता को दर्शाता है. अब यँहा कारण क्या होगा ? कहा ये जा रहा है की इन्होंने गावँ में एक औरत के साथ बदसलूकी की थी, लेकिन जब इन्हे थाने ले जाया गया, तब कोई भी फरियादी इनके खिलाफ कोई आरोप दर्ज करवाने नहीं पहुँचा, मसलन हनी सिंह, बब्बू मान और ऐसे ख्याति प्राप्त पंजाबी गीतकारो के लच्चर गीतों के बदौलत, ये भीड़ इस मानसिकता को जन्म देने में सक्षम है की ये पंजाबी जरूर इस तरह के अपराध में शामिल रहे होंगे ओर इस तथ्य पर एक आम नागरिक यकीन भी कर लेगा, ये भीड़ आज हमारा चरित्र भी निर्माण कर रही है, और यही भीड़ है जो बस एक विशेष समुदाय को ही चरित्र निपुर्ण का तगमा देती है और बाकी सब इसकी नजर में सभी दोषी है, वैसे दिलचस्प ये भी है की यही भीड़ शादी या और किसी फंक्शन में इन्ही पंजाबी लच्चर गीतों पर इस तरह झूम रही होती है जँहा चरित्र का कोई शक सूबा नहीं रहता लेकिन ये भीड़ आज सत्ता में है इसलिये इसके चरित्र पर ऊँगली उठाना, किसी भी तंदरुस्त सेहद के लिये खतरा हो सकता है.

अब इस पूरे घटनाकर्म के तार सुलझने शुरू हो गये है ओर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है, लेकिन मान भी ले की इन लोगो से कोई गुन्हा हुआ था तो क्या भीड़ को इन लोगो को सजा देने का हक था?  आज पूरे भारत देश में, हर गाँव में, शहर में, एक लड़की और औरत की सुरक्षा के क्या हलात है, ये हम सब जानते है, अगर भीड़ द्वारा इन सभी को सजा देनी शुरू कर दी गयी तो मुश्किल है की कोई भी पुरुष मानुष अपराधी नहीं होगा, लेकिन यँहा तथ्य कुछ और लगता है, असल में ये भीड़ बहुसख्यक समाज की रक्षा सेना की तर्ज पर खुद को पेश कर रही है और हमेशा इस भीड़ का निशाना कोई ना कोई अल्पसख्यंक समाज का व्यक्ति ही होता है, इसके पीछे की मंशा में गंदी राजनीति की बदबू तो आ ही रही है लेकिन समाज के भाई चारे को भी तहस नहस करने की साजिश प्रतीत होती है, अगर इस घटना का कोई प्रतिकर्म पंजाब में हो गया या यँहा भी राजनीति में धराशाही हो चुकी कोई पार्टी अपने मंसूबो की तलाश में किसी हिंदू को पीटने का षडयंत्र रच दे, तो कहने की जरूरत नही की ये आग कितनी भयानक होगी. शायद इसका धुंआ इतना उठेगा की इसकी लपटे दिल्ली तक भी पहुच सकती है. 1984 में भी पंजाब की सत्ता और दिल्ली के बीच कई ऐसी माचिस की तिलिया, हलात को हवा दे रही थी और सच्चाई में इन्ही माचिस की तीलियों से 1984 का पंजाब और बाद में दिल्ली सिख दंगो के रूप में आग लगी थी और यँहा भी यही भीड़ मौजूद थी.

व्यक्तिगत रूप से मुझे अब इस भीड़ से ड़र लगने लगा है, मेने अपने सहकर्मियो से, पड़ोसियों से बात चीत बहुत कम कर दी है, किसी भी तरह की किसी भी बहस में, अब मैं हिस्सा नही लेता हूँ, सच कहूं तो आज अखबार की सुर्खियों में मौजूद भीड़ ने मुझे गुंगा, बहरा और स्वेदन हीन बना दिया है, मुझे ड़र लगा रहता है की कही से कोई भीड़ ना आ जाये जँहा मुझे लाचार, अपमान जनक, पलो का सामना करना पड़ जाये, अब इन हालात में और इस भीड़ की मौजूदगी में, मैं किस तरह अपने आप को आजाद भारत देश का आजाद नागरिक घोषित कर सकता हूँ, आज मैं भी बाकी सभी की तरह शांत हूँ और उस सुबह का इंतजार कर रहा हूँ, जब ये भीड़ वास्तिवकता से और मेरी मानसिकता से पूरी तरह नामौजूद होगी, लेकिन ये कल्पना ही है और इसके हक़ीक़त में सामने आने के आसार कम ही लगते है, अब देखना ये होगा की ये भीड़ अपना अगला निशाना किस को बनाती है वह कोई भी हो सकता है, मैं भी और आप भी, बस इंतजार कीजिये.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.