‘ये दुनिया बहुत ज़ालिम है, तू इसके जाल में मत फंसना मेरी दोस्त!’

Posted by Shabnam Khan
May 28, 2017

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मेरी सबसे प्यारी दोस्त नाज़िया,

ज़िंदगी ख़्वाहिशों और अफसोसों का मिलाजुला पुलिंदा है। हम कई ख्वाहिश करते हैं, और उनके पूरे न होने पर अफसोस करते हैं। मैं जानती हूं इन दिनों तू कई तरह के अफसोसों में जी रही है। तेरी अम्मी यूं अचानक इस दुनिया को छोड़ जाएंगी, किसने सोचा था? अम्मी की बॉडी कमरे में रखी थी, और तूने मुझसे कहा था, “अम्मी बहुत कुछ अधूरा छोड़ गई शबनम…”। मेरी जान! दुनिया में कभी कुछ ‘पूरा’ नहीं होता। एक ख्वाहिश पूरी होते ही, दूसरी ख़्वाहिश कर लेता है इंसान। इंसान जब ये दुनिया छोड़ता है, तो कुछ न कुछ ऐसा होता है जो वो पूरा नहीं कर पाता। शायद इसीलिए वो ‘इंसान’ है, इसलिए तू, अफसोस मत करना…

मुश्किल होता है संभल पाना, मैं जानती हूं। सुबह कोई आपके सामने था, और शाम को उसका जनाज़ा उठे तो कोई कैसे सब्र कर जाए? ये सोच सोचकर इस एक हफ्ते में तू जाने कितनी बार रोई होगी। तुझसे ये तकलीफ बर्दाश्त भी नहीं हो रही होगी, मुझे अंदाजा है। मैं तुझे ये नहीं कहूंगी कि तू रो मत। क्योंकि मेरे हिसाब से, रोने पर आपका बस नहीं चलता। हां लेकिन, मैं तुझे ये यकीन जरूर दिलाना चाहूंगी कि जैसे-जैसे वक्त आगे बढ़ेगा, तू अम्मी के आख़िरी दिन को भूलती जाएगी और उनकी जिंदगी के सबसे खुशनुमा पलों को याद किया करेगी। तेरे लिए ये काम मुश्किल भी नहीं होगा, इस बात का अंदाज़ा मुझे तभी लग गया था जब आंटी के इंतेकाल के दूसरे दिन मैं तुझसे मिलने पहुंची थी और तू मुझे अपने मोबाइल फोन पर वो तस्वीरें दिखा रही थी, जिसमें आंटी ने मज़ाक-मज़ाक में तेरी सेल्फी बिगाड़ दी थी। बिल्कुल ऐसे ही, आने वाले वक्त में, तुझे आंटी के साथ गुज़ारे अच्छे पल आंटी की सिखाई अच्छी बातें याद आया करेंगी।

उस दिन जब आंटी ने इस दुनिया को छोड़ा था और तू उठते जनाज़े को देख बदहवास हुई थी, मैंने देखा था कि कैसे तेरे रिश्तेदार और जानने वाले तुझे ये कहकर चुप करवा रहे थे कि अब तुझे ही अपने भाई-बहनों की मां बनना होगा। मेरी प्यारी दोस्त, ये दुनिया बहुत ज़ालिम है। वो लोग ऐसे मुश्किल वक्त में भी दिलासे के नाम पर तुझे वो ज़िम्मेदारी सौंप रहे थे, जो तेरे लिए है ही नहीं। तू अपने भाई-बहनों का सबसे अच्छा ख्याल उनकी ‘नाज़ अप्पी’ बनकर ही रख सकती है। अगर तेरी अम्मी ने भी अपनी ज़िंदगी में कुछ और बनना चाहा होता तो वो कम से कम वो अम्मी नहीं बनती, जिन्हें तुम अब जानते हो। हर इंसान अलग होता है। तू जो है, वही बनकर रहना। दुनिया के बनाए जाल में मत फंसना।

एक आख़िरी बात, मां-बाप कहीं नहीं जाते। वो हमारी नज़रों से दूर ज़रूर हो जाते हैं लेकिन उसके बाद जैसे-जैसे वक्त बीतता है, हम उनके हिस्सों को अपने अंदर महसूस करने लगते हैं। मुझसे बेहतर तुझे ये बात और कोई नहीं समझा पाएगा। पापा के जाने के चार साल बाद, अब मुझे महसूस होता है, मैं अंदर से पापा बन गई हूं। टुकड़ों-टुकड़ों में उनकी कई आदतें, मेरे अंदर भी हैं, जिन्हें मैं अब देख पाती हूं। इससे मुझे वो अपने करीब ही लगते हैं। तुझे भी ऐसा जरूर महसूस होगा। तब तू अकेले में अम्मी को याद करके सिर्फ रोएगी ही नहीं, बल्कि मुस्कुराएगी भी। इसी हंसने-मुस्कुराने वाली बात पर मैं इस ख़त को ख़त्म करती हूं। दुआ करूंगी, तू जैसी है, हमेशा वैसी ही रहे क्योंकि अभी तू जो है, वही तेरा बेस्ट है।

तेरी दोस्त

शबनम ख़ान

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