ये लोग सलमान से डरते हैं . . .

Self-Published

*दिन में खाना नसीब नहीं
ओर रात से डर लगता है साहब
कब कोई गाड़ी चढ़ा जाए . . . . *



बढ़ती आबादी में अमीरी-गरीबी का फासला,
रेस्त्रां के बाहर गाडियो की भीड़,
ठेके पर झूमते मानुस
चमचमाती गाड़ियाँ,
आधे कपड़े में घूमते लोग,
सड़क किनारे धुएं छल्ले की मौजूदगी


बात देती है कि की आप जो देख रहे हैं सुन रहे हैं और जिनकी देख कई सवाल पैदा हो रहे हैं वो है *अमीरी-गरीबी* का फैसला। असल में हम बात करे भारत कि की यहाँ कितने प्रतिषत लोग अमीर है गरीब हैं बेघर हैं तो गूगल पर सब मिल जाएगा। लेकिन ये जो आकड़ें हैं ये कूड़े के ढेर के समान हैं। ये दिखते ओर जानते सब हैं लेकिन बदलाव कहीं नहीं दिखता। इसका प्रयोग सिर्फ निबंध,नम्बर लाने के लिए और बहस में होता है। आकड़े वहीँ के वहीं है और लोग भी जहाँ मरे थे वही अभी भी सो रहे हैं। वो बेघर लोग जाए कहाँ रहे कहाँ ये असल मे न सरकार सोचती है ना वो खुद सोचते हैं क्योंकि जिसके पेट का सहारा नहीं वो छत कहाँ से लाएगा और अगर हम जैसे लोग भी बात करते भी है तो सिर्फ ये एक आर्टिकल, स्टोरी और न्यूज़ बन कर ही रह जाता है। सरकार के पास काम बहुत है सरकार बिजी है और अब तो हमारे देश मे विपक्ष ही नहीं जो सवाल कर सके इनकी हालात बता सके और कह सके कि रोज़ बहुत से मानुस नींद में ही अपनी खो देते है

रोज़ बहुत सी गाड़ियाँ सडक से फुटपाथ  पर मिलती है
हर रात बहुत से सलमान खान देखने को मिलते हैं
हालांकि हर कोई उनकी तरह कानून के चपेट से बचता तो नही है लेकिन सामान्य चीज एक ही है। वो है
मरने वाले लोग
जो पहले से ही कड़ी धूप,
मच्छर से लड़ाई
और रात की ठंड से बच बचाकर
नींद तक का कठिन सफर पूरा करते हैं।


लेकिन नींद में भी उनको डर रहता है कि
कहीं कोई सलमान ने आजाए
कहीं कोई गाड़ी न चढ़ा जाए
कहीं आज की रात अंतिम रात न बन जाए।

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