शिक्षा बना ” व्यवसाय?

Posted by MJ Mayank
May 23, 2017

Self-Published

3d illustration of balancing of money and education on scale

बढ़ते फीस ने बधाई जेबो की भार … मोटे रकमों के नीची दबी पड़ी “आध्यात्मिक”जिंदगी…. शिक्षा बना “व्यवसाय”…. यु तो शिक्षा विकाश की जननी हैं लेकिन जरा सोचिये वही शिक्षा व्यसाय बन जाये तो देश का भविस्य क्या होगा ? जी हां हाल फ़िलहाल में स्कूल से लेके कॉलेजो में बढ़ते फीस ने मध्यम वर्गीय परिवार और निचे तबके के लोगो के जीवन पर खासा असर डाला हैं … यह असर नकरात्मक पहलुओं को दर्शाता हैं … पहले बात निजी स्कूलों की करे तो हम देखते हैं की कैसे मनमर्जी फीस बढ़ा दी जाती हैं … सीबीएसई के अनुसार निजी विद्यालय को किस समय स्कूलों को फीस बढ़ाने की अवश्यकता है और कितनी फीस बढ़ाने की अवश्यकता है , यह खुद सीबीएसई तय करेगा…लेकिन ये शिक्षा के व्यापारी इन निर्देशों को ठेंगा देखा अपनी मनमानी से बज नहीं आते … इन सब से परे ये प्राइवेट स्कूल्स अपने शिक्षा के आँगन में मोटे रकम पर किताब से लेके कपड़ो तक का कारोबार कर देते हैं … जहा NCERT के किताबे 40 से 200 के बीच उपलब्ध हैं .. वही इन सब से ऊपर ये अपने निजी प्रकाशन के जरिये किताब मुहैया करा भारी मुनाफा कर अपनी जेबे भरते हैं … सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले को लेकर फटकार लगायी हैं … लेकिन फिर भी इसकी अनदेखी जमीनी स्तर पर की जा रही… पिछले ६ महीनो में पेरेंट्स सड़को पर आये .. आक्रोश मार्च निकले गए … लेकिन इनके आवाज इस शिक्षा के मंदिर में किसी कोने में दब जाती हैं … लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही उठता हैं की आखिर वो क्या वजहें हैं जो लोग सरकारी विद्यालय के बजाये इन प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चो को भेजना पसंद करते हैं ? तो जवाब से हम सभी वाफीफ हैं…सरकार अपने नीतियों में हमेशा नाकामयाब रही हैं …  शिक्षकों की भारी कमी और गुड़वत शिक्षा इन सरकारी स्कूलों से कही नदारद सी हो गयी हैं…कड़वा सच तो यही हैं की सरकारी विद्यालयों में बस अब गरीब और निचले तबको के बच्चे ही नजर आते हैं जो भारी रकम अदा कर अपने बच्चो को पढ़ा पाने में अश्मर्थ हैं ..  दूसरी तरफ बात उच्च सरकारी शिक्षण संस्थानों की करे तो खुद  IIT और विश्वविद्यालयों में लगातार फीस बढ़ने की खबरे सुर्खियों में हैं .. आज IIT जैसे संस्थानों में पढ़ने के लिए हर साल करीबन २ लाख रूपये देने पड़ते हैं … वही छात्रों ने पंजाब यूनिवर्सिटी के बढ़ते फीस का विरोध कर अपनी लड़ाई लड़ी तो एडमिनिस्ट्रेशन को भी झुकना पड़ा … लेकिन इन सब के बीच छात्रों ने न जाने कितनी लाठिया खायी तो कितनो के शरीर लहू लुहान हुए … अब  सवाल यहाँ ये उठता हैं की अगर सरकारी शिक्षण संस्थानों के फीस निजी संस्थाओ जितने है तो फिर सरकारी कहने का क्या फायदा ? न जाने कितने छात्र इस मोटी रकम अदा करने के निचे दब अपनी जान गवा देते हैं…कई पेरेंट्स इस बोझ के निचे इस कदर दबे हैं की वो अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं दे पते या फिर कर्ज में डूब कर अपनी जिंदगी तबाह कर लेते हैं ….  केंद्र और राज्य सरकारों को इसपे गंभीर चिंतन करने की बजाये इसे जमीनी स्तर पर लाने की जरुरत हैं ,,, ताकि देश का भविस्य उज्जवल हो और शिक्षा “व्यसाय” बनने के बजाये मंदिर बनी रहे… और विकाश की इस  जननी को व्यसाय के तराजू में न तौलना पड़े …  ©Mj Mayank…

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