सुरक्षा इंतज़ाम या तानाशाही?

Posted by Lalit Aamod Kumar
May 20, 2017

Self-Published

विरोध प्रदर्शन के बाद आईआईएमसी दिल्ली.

आईआईएमसी का आज वाला रूप शायद मैंने क्या किसने पहले कभी नहीं देखा होगा. मेरा दावा है. संस्थान यानी “महानिदेशक केजी सुरेश” ने इस तरह अपने खुदके छात्रों की आवाज़ को अनसुना कर दिया जैसे वो किसी दबिश के शिकार हों. या शायद अपने खुदके छात्रों से संचार करने उनका यही तरीका हो.

मुझे ये कहने में ज़रा भी हिचक नहीं है कि संस्थान वाकई एक तानाशाही के माहौल में तब्दील हो चुका है. जहाँ यज्ञ कराया वहां किसी भी छात्र को नहीं जाने दिया. पूरा परिसर छावनी बना डाला. पुलिस बल चप्पे चप्पे पर तैनात था. अगर वो इसे सुरक्षा का बहाने दे तो बता दूं कि आईआईएमसी में मंत्री लोग हमेशा से ही आते रहे हैं, लेकिन ये आलम कभी देखने को नहीं मिला. ऐसा लग रहा था जैसे मीडिया स्कैन वालो ने एक दिन के लिए वो ज़मीन कब्ज़ा ली हो. और प्रशासन अपने ही छात्रों से दुश्मनी कर बैठा हो.

संस्थान के मेन गेट पर रखे प्रदर्शन के प्लैक कार्ड.

कल जब महानिदेशक केजी सुरेश से मैंने फ़ोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल परिसर में मीडिया स्कैन वालो को उनका सेमिनार करने की अनुमति दी है. बाकी वक्ताओं और उनके आयोजन से उनका कोई ताल्लुक नहीं हैं. मतलब कोई एक दिन के लिए संस्थान को मालिकाना तरीके से संभालेगा और प्रशासन यूँही देखता रहेगा. कहीं तो कुछ था जो कहीं छिपा था. लेकिन लग ऐसा रहा था जैसे संस्थान में कोई कर्फ्यू सा लग गया हो. जो अन्दर थे वो बाहर नहीं आ सकता थे, और जो बहार थे वो अन्दर नहीं जा सकते थे. भले ही वो होस्टल में रहने वाले अभी के बैच के छात्र हों या फिर कोई पूर्व छात्र या फिर कोई पत्रकार ही क्यों न हो. जो लोग इस यज्ञ को केवल किसी धौंस में समर्थन दे रहे थे उनसे मेरा ये सवाल हमेशा रहेगा, कि क्या संस्थान की ऐसी हालत करना खुदमें एक दबंगई नहीं है? मतलब मीडिया के हालातों पर सेमिनार और खुदही के छात्रों को उसमें शामिल होने की अनुमति नहीं. सुनने में अजीब है, लेकिन सच्चाई यही है.लेकिन उनकी हार तभी हो गयी थी जब कल्लूरी को संस्थान में आने के लिए दुसरे रास्ते का सहारा लेना पड़ा. इतने विरोध और हज़ारों दरख्वास्त का ये परिणाम हुआ.

आज संस्थान में यज्ञ और आईजी कल्लूरी के विरोध में प्रदर्शन होना था और हुआ भी और संस्थान में सेमिनार भी. प्रदर्शन में शामिल होने मैं थोडा नहीं बल्कि काफी लेट पंहुचा था लेकिन ऑफिस के बाद जितना हो पाया मैंने किया. यज्ञ और कल्लूरी के विरोध में अकेला मैं, या केवल इस बैच के लोग नहीं थे, तमाम पूर्व छात्र हैं. लेकिन सभी को इस चीज़ का विरोध भी करना था और संस्थान की गरिमा को भी आंच नहीं आनी देनी थी. हम सभी ने उसी तरह का विरोध किया. प्रदर्शन हुआ, अच्छी खासी भीड़ थी. जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी सहयोग किया. मैं उनका शुक्रगुजार हूँ. कि जब संस्थान के कई पूर्व छात्रों ने अपने कदम पीछे खीच लिए थे, तब उन लोगो ने छात्र शक्ति दिखाने में मेरे जूनियर दोस्तों का साथ दिया. लेकिन मुझे अजीब तब लगा जब फेसबुक की न्यूज़ फीड में उनकी आलोचना का पहाड़ टूटने लगा. जेएनयू के छात्र नेता मोहित पाण्डेय भी प्रदर्शन में मौजूद थे. और भी कई लोग आये थे.

लेकिन लड़ाई भगवा विचारधारा को थोपने वाले लोगो से और इस मुद्दे से थी. और वहां लाल सलाम के नारे लगना गलत था, जिसकी वजह से प्रदर्शन की आलोचना भी हुई. लेकिन ये भी मानने वाली बात है कि आईआईएमसी के छात्रों ने लाल सलाम वाली नारेबाजी नहीं की. क्योंकि जब हम खुद नैतिक आधारों पर यज्ञ और कल्लूरी जैसे इंसान का विरोध कर रहे हैं. तो लाल सलाम के नारे लगना गलत है. लेकिन संस्थान में यज्ञ होना उससे कहीं ज्यादा निंदनीय है. इन नारों की वजह से इस विरोध प्रदर्शन को लोग एक अलग नज़रिए से देखने लगे. लेकिनं उन सभी को ये समझना पड़ेगा कि इसी तरह मुद्दो को डाइवर्ट किया जाता है. लोगो ने सारी बात लाल सलाम पर डाल दी. जिसका मुझे बेहद बुरा लगा. प्रदर्शन फिर भी काफी सही हुआ. लेकिन फिर ये प्रदर्शन संस्थान पर नहीं बल्कि प्रशासन के लिए एक सबक है. आगे आने वाले छात्र भी ऐसे ही आवाज़ बुलंद करते रहेंगे. और हम हमेशा की तरह सच्चाई का साथ देते रहेंगे. मैं खुद शुक्रिया कहता हूँ उन सभी को जिन्होंने इस विरोध में बढ़कर हिस्सा लिया और निडर कठिनाइयों का सामना किया.

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