पीरियड्स के कारण उन्हें अपनी बेटी की शादी की रस्म में शामिल नहीं होने दिया गया

पिछले दिनों अपनी एक सहेली की शादी के मौके पर बड़ी अजीब सी बात देखी। शादी की रस्मों में सहेली की बुआ को हर जगह उसकी माँ की भूमिका में देखकर हैरानी हुई!  कन्यादान और ज़रूरी रस्मों में अंकल अकेले ही नज़र आ रहे थे। आंटी इस पूरे वक़्त वहीं आस-पास थीं। लेकिन ‘जगह’ पर मौजूद नहीं थी, शामिल नहीं थी। ज़िंदगी के अहम मौकों पर सिर्फ होना भर काफी नहीं होता है। बल्कि उन अवसरों को खुद के भीतर उतार लेने का मन होता है, जैसे ‘उस’ पल या उस वक़्त के बाद इतना ज़रूरी फिर ज़िंदगी में कभी कुछ होगा ही नहीं। मेरी दीदी की शादी में ऐसी ही फीलिंग मम्मी के चेहरे पर तैरती नज़र आती थी हर समय।

मुझे लगा कि दोस्त से ही चलकर पूछा जाए कि इस ओढ़ी हुई एब्सेंस का रीज़न क्या है? उसने जो कहा उसके बाद मुझे धार्मिक अनुष्ठान और भी ज़्यादा खोखले लगने लगे। पीरियड्स ! आंटी अपने मीनोपोज़ के फ़ेज़ से गुज़र रही हैं और इस दौरान उनका मंडप में होना उस अनुष्ठान को अपवित्र करना होगा। अपशगुन होगा और एक माँ अपनी संतान के भावी जीवन के लिए केवल शुभकामनाएं ही तो देना चाहेगी, सो अपशगुन कैसे होने देती? वो मंडप में होने वाली रस्मों में शामिल नहीं हुईं।

दोस्त की शादी की खुशी, क्रेज़ और सबकुछ धीरे-धीरे बैकग्राउंड में जाता चला गया। फ़ोकस  में सोसाइटी के वो रंग आने लगे जिन्हें छुपाकर हम सिविलाइज़्ड़ होने का ढोंग गढ़ते हैं। बच्चे का  जन्म संभव होता है तो उसमें मासिक धर्म की भी अपनी विशेष भूमिका है। फिर भला विवाह के समय जब उस माँ की संतान अपने नए जीवन में प्रवेश कर रही है तो वह माँ उस उत्सव का हिस्सा क्यूँ नहीं है ? मासिक धर्म को हम किसीसामुदायिक फेनोमेनन की तरह नहीं बल्कि एक सोशल टैबू  के रूप में उससे घिन्नाते हुए ही उसे अपनाते हैं।

उम्र के साथ हो रहे शरीर के बदलावों का ये भी सिर्फ एक हिस्सा भर हैं। जैसे सर्दी होती है, जुखाम या बुखार होता है ठीक वैसे ये भी 4,5 दिनों का एक फेज़ है। जिसमें थोड़े आराम, थोड़ी एटैन्शन और केयर की ज़रूरत होती है। सब बस इतना ही नॉर्मल है। लेकिन पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर होने वाला असामान्य व्यवहार एक तरह का ‘अछूतीकरण’ है। तर्क यह दिया जाता है कि इस समय के प्रतिबंधों को महिलाएं उनके श्रमसाध्य दैनिक जीवन में विश्राम का सुअवसर समझें। लेकिन दरअसल आराम देने और अछूत बना देने में अंतर है। आराम अस्पर्श्यता के ज़रिये नहीं आता। आता है तो केवल अवांछित उत्पीड़न का भाव और अपमानित होने का बोध। जिसे दूर करने के लिए सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि मासिक धर्म की प्रक्रिया एक स्त्री के शरीर के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना उस स्त्री का माँ बनना। अगर इस सृष्टि को आगे बढ़ने की ज़रुरत नहीं है, अगर हमें आनेवाली संतानों की आवश्यकता नहीं है, तो स्त्री शरीर को भी मासिक धर्म की आवश्यता लगभग नहीं है।

मातृत्व का होना ही नारी के जीवन की सम्पूर्णता है – यह धारणा सामाजिक है। मातृत्व प्राप्ति के लिए रजोधर्म अनिवार्य है – यह सिद्धांत प्राकृतिक है। फिर भी इस प्राकृतिक सिद्धांत के साथ सामाजिक धारणा को जोड़कर जो गरिमा हमें स्त्रियों को देनी चाहिए, समाज उसे नकारता है। स्त्रियों के अलावा पुरुषों में भी कुछ क्रियाएं प्रकृति ने निश्चित की हैं। कुछ सालों पहले आई फ़िल्म ‘विक्की डोनर’ आप भूले नहीं होंगे। फिल्म के केंद्रीय पात्र द्वारा हस्तमैथुन की प्रक्रिया का ज़िक्र आते ही थियेटर हँसी के ठहाकों से गूँज उठते थे। लेकिन उतनी ही साफ़गोई से हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि रजोधर्म से संबंधित कोई फिल्म किसी नायिका को केंद्र में लेकर बनायी जा सकती है। कारण? बात घूम फिरकर वहीँ आ जाती है कि स्त्रियों का जीवन उनका व्यक्तिगत नहीं होता, बल्कि उससे कई तरह की सामाजिक प्रतिष्ठाओं, धार्मिक आस्थाओं और मनोवैज्ञानिक रूप से कुंठित भावों के प्रश्न उठने लगते हैं।

जहाँ, जिन समाजों ने इस प्रक्रिया को केवल शारीरिक घटनाक्रम के रूप में अपनाया है वहां दृश्य हमारी-आपकी सोच से कई गुना अधिक बदला हुआ है। कई भारतीय जनजातियों में लड़कियों के प्रथम ऋतुस्राव (पीरियड्स) को “रूठू सदंगु” नामक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। वार्षिक रूप से मनाया जाने वाला यह आठ-दिवसीय उत्सव उन तमाम लड़कियों के लिए होता है जो उस वर्ष कन्या से किशोरी या लड़की से स्त्री बनने का यह प्रथम चरण पार करती हैं। यह लगभग उसी तरह का अनुष्ठान होता है जैसे हमारे ‘सभ्य’ समाजों में जन्मदिन मनाया जाता है। इन जनजातियों के लिए यह अवसर उन लड़कियों का दूसरा जन्म माना जाता है क्यूँकि इस उत्सव के माध्यम से यह मान लिया जाता है कि उनके समुदाय में एक और कन्या ने स्त्रीत्व के गुणों को प्राप्त कर लिया है। इसलिए उनके समुदाय को आगे बढाने वाली उस नव्य-नवेली स्त्री का ऐसे उत्सव के द्वारा वे धन्यवाद ज्ञापन करते हैं। भारत के बाहर मोरक्को में भी लगभग ऐसी ही प्रथा है। जापान और श्रीलंका में भी ऐसी कुछ प्रथाओं की जानकारी मिलती है। ये भी तो एक तरीका है जीने का। जहाँ सोशल एक्सेप्टेन्स की वजह से सारा भारीपन भाप की तरह उड़ जाता है।

पीरियड्स हर लड़की की ज़िंदगी में एक टर्निंग प्वाइंट की तरह आते हैं। यह प्रक्रिया किसी भी स्त्री के शारीरिक विकास का सूचक है, आने वाले समय के लिए उसके स्वस्थ होने का प्रमाण है और मानसिक रूप से भी यह प्रक्रिया स्त्रियों में आत्मसजगता का भाव उत्पन्न करती है। लेकिन यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं है जो दूषित है, गन्दा है, समाज व धर्म के लिए हानिकारक या अशुद्ध है। जिसके नाम में ही धर्म जुड़ा है, संभव है किसी समय इसे अपवित्रता न समझ कर जीवन की स्वाभाविकता (सामान्य धर्म/प्रकृति) के रूप में देखा जाता रहा होगा!

इस सारे मामले को एक सुर में समझना मुश्किल है। वजह ये है कि एक तरफ़ माहवारी को लेकर अब खुलकर बोलने-बात करने का चलन शुरू हो रहा है। जिससे लोग पीरियड्स के बारे में अपने दिमाग से सभी गड़बड़ियों को साफ़ कर दें। वहीं दूसरी तरफ़ हमारा सो-कॉल्ड पढ़ा-लिखा बाबू सिस्टम अभी भी औरतों की इस बेसिक ज़रूरत को लग्ज़री मानता है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है सैनिटरी नैप्कीन्स पर लगने वाला टैक्स। इस मुद्दे पर आकर सारी बहस उसी शून्य पर वापस पहुँच जाती है। जहाँ से औरतों की शारीरिक और मानसिक सेहत की बेहतरी के लिए ये सारा डिबेट शुरू हुआ था। बड़े-बड़े ब्राण्ड्स के दो सौ रुपये के हाइली हाइजीनिक पैकेट्स को बाज़ार ने ‘लग्ज़री’ प्रॉडक्ट की तरह स्थापित कर दिया है

अब आप चिल्लाते रहिए मुरुगुनाथम http://www.menstrualman.com/ की कहानी, उनकी या उन जैसे स्त्रीमन रखने वाले लोगों की कोशिशों के बारे में। पर हमारी राजनीतिक गलियों में कोई फ़र्क पड़ता दिखाई नहीं देता। सबसे ज़्यादा हैरान करती हैं वे महिला एमपी और एमएलए जो इस ज़रूरी मुद्दे को जीने के अधिकार की तरह बेसिक हक़ की लड़ाई नहीं बनाती। इस तरफ़ आकर हमें नज़र आता है कि दरअसल सोसायटी का असली चेहरा क्या है और तब सिचुएशन और भी आरपार नज़र आती है कि ऑनर किलिंग हो, तीन तलाक़ हो, संपत्ति का अधिकार हो या अन्य तमाम भारी-भरकम मुद्दे। इन सबका संघर्ष अपनी जगह है लेकिन अभी तो सम्मान और स्वीकार्यता की लड़ाई अपनी रसोई से शुरू करते हुए बाज़ार में ‘ज़रूरत’ और ‘ऐय्याशी’ की परिभाषाओं के बीच जाकर लड़नी है।

(फोटो प्रतीकात्मक है, साभार- फ्लिकर)

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