खालसा कॉलेज के हरप्रीत की खुदकुशी हर कॉलेज स्टूडेंट को डराने वाली है

साल 1992, दसवीं क्लास का बोर्ड इम्तिहान। एक सुनहरे भविष्य की उम्मीद में मैं इम्तिहान दे रहा था। घर से जाने से पहले अपना एग्जाम स्लिप और हर वह कागज़ात निगरानी से अपने पास रखता था की बिना इनकी मौजूदगी के मुझे कोई परीक्षा देने से रोके ना, किसी भी कारण अगर कोई मुझे परीक्षा देने से रोक देता तो ? शायद ये सकरात्मक जज्बात, कुछ और ही रूप ले लेते, लेकिन इसका ज़िम्मेदार कौन होता, क्या नियम कानून, जिंदगी से ज्यादा बेशकीमती हैं ?

हरप्रीत सिंह

हरप्रीत सिंह, बठिंडा जिले के ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखता था, छोटे मद्यम्वर्गिय किसान का बेटा। मैं इस इलाके से ही हूं, जहां उच्च शिक्षा के लिये कोई संस्थान नही है। अगर कोई बच्चा पढ़ाई में होशियार है तो उसे आगे की पढ़ाई के लिये चंडीगढ़, अमृतसर या लुधियाना के किसी कॉलेज में दाखिला लेना होता है। लेकिन गावँ के बच्चों के लिये ये रास्ता और भी कठिन है। हरप्रीत सिंह, हर तथ्य को झूठा करार देकर, अपनी मेहनत से सपनो की उड़ान भर रहा था, हरप्रीत को बतैर स्कॉलर, अमृतसर के खालसा कॉलेज में BSc. एग्रीकल्चर में एडमिशन मिल गया और रहने के लिये कॉलेज के हॉस्टल का एक कमरा। पंजाब में नामी कॉलेज में, वह भी एग्रीकल्चर में एडमिशन मिलना, शायद हरप्रीत की उम्मीद सच हो रही थी और एक उज्जवल भविष्य की नींव रखी जा चुकी थी।

साल महीने गुजरें, अब हरप्रीत अपने अंतिम सेमेस्टर में था। इसके बाद MSc में एडमिशन लेना चाहता था वो। हरप्रीत इसी के लिये प्राइवेट कोचिंग भी ले रहा था, लेकिन इसी बीच ये भी तथ्य सामने आये की हरप्रीत का पहले आँख का उपचार हुआ था और बाद में चिकनगुनिया के चलते नियम अनुसार उसकी क्लास में उपस्थति कम थी। इसी के चलते हरप्रीत को प्रैक्टिकल एग्जाम के लिये रोल नंबर नही दिया जा रहा था, एक तरह से उसे इम्तिहान में बैठने से रोक दिया गया। इसी सिलसिले में हरप्रीत ने पहले कॉलेज के प्रिंसपल और फिर रजिस्ट्रार के पास भी अपनी गुहार लगाई, परंतु हर जगह उसे मायूसी ही हाथ लग रही थी। ऐसे और भी विद्यार्थी थे जिनकी उपस्थति कम थी परंतु उन्हें फाइन देकर  इम्तिहान में बैठने दिया गया लेकिन हरप्रीत सिंह को नहीं।

कॉलेज प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते स्टूडेंट्स

हताश और निराश हरप्रीत ने वह कदम उठा लिया जिसका किसी को अंदेशा भी नहीं था, जिन आँखों में जिंदगी की चमक थी, सुनहरे भविष्य की नयी उम्मीद थी, अचानक से हरप्रीत ने तारीख 27-अप्रैल-2017 को अपने ही कॉलेज के कमरे में ख़ुदकुशी कर ली। कारण यही था कि इस होनहार विद्यार्थी को इम्तिहान में बैठने की आज्ञा नहीं मिली थी। इसके बाद गुस्साए विद्यार्थियों ने सड़कजाम कर दिया, पिता द्वारा पुलिस शिकायत भी दर्ज करवाई गयी, जहाँ मुख्य दोषियों में कॉलेज प्रशासन, प्रिंसपल और डिपार्टमेंट हेड को दोषी बनाया गया है।
वहीं कॉलेज के अध्यापकों द्वारा अपने सहयोगियों पर लगाये जा रहे आरोपों के खिलाफ एकजुट होने का प्रमाण दिया गया और कॉलेज की पढ़ाई ठप कर दी गयी। कॉलेज में हो रहे इम्तिहानों को रोक दिया गया। लेकिन सवाल वही है क्या किसी शिक्षा संस्थान के नियम किसी ज़िंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं ? आखिर क्यों बाकी विद्यार्थियों को जुर्माना लगा कर इम्तिहान में बैठने दिया जाता है लेकिन हरप्रीत को रोक दिया जाता है?

पिछले कई सालों से, अलग-अलग कॉलेज कैंपस में विद्यार्थियों द्वारा की जा रही ख़ुदकुशी, इसका एक लड़ीवार सिलसिला चल रहा है जहाँ एक मात्र कारण प्रशासन और छात्रों के बीच बढ़ती दूरी नज़र आता है। और उसके बाद विरोध का एक सिलसिला चलता है, लेकिन ये भी सच है कि आज भी कॉलेज कैंपस में रोहित या हरप्रीत की जाने जा रही हैं, जिसका सटीक कोई हल नज़र नहीं आ रहा। इसका एक कारण क़ानूनी प्रक्रिया में बरती जा रही ढिलई भी है, जहां लगता है कि कानून और प्रशासन को एक ही तरह की भाषा बोलने की आदत सी हो गयी है। लेकिन ख़ुदकुशी के भी कारण होते हैं अगर इनके कारणों की ईमानदारी से तलाश की जाये तो ये एक हत्या नज़र आती है जहां समाज, व्यवस्था, कानून, प्रशासन कातिलों की लिस्ट में नज़र आते हैं।

फोटो आभार फेसबुक पेज Justice For Harpreet

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