हाय रे मेरे देश के हालात हाय रे..।

Posted by Arvind Kumar Maurya
May 23, 2017

Self-Published

भारत मे मध्यांह भोजन योजना का मुख्य उद्देश्य सामाजिक समरसता कायम करने के साथ बच्चों का शिक्षा के प्रति आकर्षण को बढ़ावा देना रहा है। भारत मे सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए वैदिक काल मे जब छात्र गुरुकुल प्रणाली के तहत ज्ञान अर्जित करते थे तो वे साथ ही साथ भिक्षा माँगकर अपना विद्यार्थी जीवन भी व्यतीत किया करते थे। आधुनिक शिक्षा प्रणाली मे यह संभव नहीं था। मिड डे मील का एक और उद्देश्य सरकारी विद्यालयों मे छात्रों की संख्या बढ़ाने के साथ उसे बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती हैं। देश मे पोषण स्तर सुधारने के लिए 15 अगस्त 1995 को राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम को प्रारंभ किया गया। इस कार्यक्रम को सबसे पहले देश के 2408 विकास खंडों मे लागू कर इसका परीक्षण किया गया। जिसे 1997-98 मे पूरे देश मे एकसाथ लागू कर दिया गया था। साथ ही 2002 मे इस योजना मे मान्यता प्राप्त विद्यालय और स्थानीय निकाय विद्यालयों मे कक्षा 1-5 तक लागू कर दिया गया हालाँकि इस योजना के तहत पहले छात्रों को 3 किग्रा० गेहूँ या चावल प्रति माह दिया जाता था। लेकिन 2002-03 मे तमिलनाडु के सरकारी स्कूलों मे दोपहर के समय पकापकाया भोजन उपलब्ध कराया गया। उसके बाद धीरे धीरे देश के अलग अलग हिस्सों मे पका भोजन उपलब्ध कराया जाना प्रारंभ हुआ। शिक्षासत्र 2007-08 मे इस योजना मे कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों को शामिल किया गया। सरकार से जुड़े लोगों का मानना था कि अब गरीब बच्चों को भूखा नहीं सोना पड़ेगा उन्हें स्कूल मे ही पौष्टिक भोजन मिलेगा। लेकिन इस दावे का अधूरा सच यह भी हैं कि बिना शाम को भोजन किये किसी को निद कैसे आ सकती है? माना गया कि बच्चों के साथ साथ भोजन करने से समाज मे भेदभाव रूपी खाईया पटेगी। लेकिन सरकार के इस सोच को गहर धक्का तब लगा जब बिहार के एक जनपद से खबर आईं की सवर्ण बच्चों ने अनुसूचित जाति के महिला द्वारा बनाये गये खाने को खाने से इंकार कर दिया गया उस जनपद के जिलाधिकारी ने वहाँ जाकर उसी महिला के द्वारा बनाये गये भोजन को जमीन पर बैठकर खाया। यहाँ मन मे एक प्रश्न किल सा चुभता हैं कि उन बच्चों को कैसे पता कि अनुसूचित जाति की महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाना चाहिए?
ये मिड डे मील की उपयोगीता है जो सामाजिक समरसता को बढ़ा रही हैं। लेकिन इसके इतर एक सच्चाई यह भी है कि मिड डे मील खाने से बड़ी संख्या मे छात्र बीमार पड़ रहे हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015-16 मे उत्तर प्रदेश मे 1174 मिट्रीक टन अनाज लापता हैं। इसी तरह एक खबर के अनुसार मिर्जापुर जनपद मे 80 व इलाहाबाद मे 1.45 लाख रुपये का अनाज लापता हैं। मीडिया रिपोर्टस की मानें तो पिछले वर्ष 2,22,959 टन अनाज का गबन किया गया जो सरकार एवं उनके नुमाइंदो के लिए कितना शर्मनाक हैं।
सरकार का मानना था कि मिड डे मील से सरकारी स्कूलों मे छात्रों की संख्या बढ़ेगी लेकिन इसके विपरीत लोगों का मानना हैं कि अच्छे खाने के साथ अच्छी शिक्षा ही इन विद्यालयों मे छात्रों की संख्या बढ़ा सकती हैं।
सरकारी आकड़ों के अनुसार मिड डे मील मे 2015-16 मे 13,000 करोड़ की धनराशि केवल यूपी मे खर्च हुईं हैं।अगर सरकार द्वारा इसी धनराशि का कुछ भाग शिक्षा पर खर्च किया गया होता तो स्थिति कुछ और होती सरकारी विद्यालयों मे शिक्षकों की कमी के साथ सुविधाओं का बेहद अभाव हैं। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों मे शिक्षक नहीं रसोईए छात्रों को पढ़ाते हुए मिल जाते हैं।सरकार को चाहिए की एक बेहतर शिक्षा नीति के साथ सरकारी विद्यालयों का जीर्णोद्धार कर स्वर्णिम भारत के स्वप्न को पूरा करें साथ ही शिक्षा को हमे केवल आय का साधन न मानकर बल्कि राष्ट्र व समाज कल्याण मे लगाना होगा। तभी हम गर्व करने वाले भारत का निमार्ण कर पाएँगे।

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