होली बाद नमाज़

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May 20, 2017

Self-Published

होली बाद नमाज़

 

अहद एक मुसलमान है. मुसलमान इसलिए क्यूँकि वो एक मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ है. हाँ, ये बात अलग है कि वो कभी इस बात पे ज़ोर नहीं देता है कि वो मुसलमान है. वो मुसलमान है तो है. क्या फ़रक़ पड़ता है? और क्या ज़रूरत है ढिंढ़ोरा पीटने की? वो कभी इन बातों पर ग़ौर नहीं करता है. लेकिन उसके ग़ौर न करने से क्या होता है? लोग तो हैं? और लोग तो ग़ौर करते हैं. और लोग अहद की हरकतों पर भी ग़ौर करते हैं.

 

सच कहा जाए, तो अहद सिर्फ़ एक इन्सान है. एक सच्चा इन्सान. जो लोगों की मदद करता है. किसी को तकलीफ़ में देखकर बेचैन हो उठता है. चाहे वो उसके अपने मज़हब का हो या किसी और मज़हब का. वो हर मज़हब की इज़्ज़त करता है. वो जिस गाँव में पैदा हुआ, वहाँ गिनती के मुसलमान थे. और इस वजह से उसके ज्यदातर दोस्त ग़ैर-मज़हब के थे. मसलन, हिन्दू वगैरह…

 

और हिन्दू दोस्तों के साथ घूमते-फिरते वो मन्दिरों में भी जाने लगा. उसके दोस्तों ने उसे आगाह किया. मगर अहद कहता, “यार, ये दुनिया सिर्फ़ एक ने बनाई है. और वो एक सिर्फ़ एक है, जिसे मैं अल्लाह कहता हूँ, और तुम भगवान. ये सिर्फ़ ज़ुबान का फ़र्क़ है. कोई भी धर्मग्रन्थ उठाकर पढ़ लो. सबमें एक ही बात लिखी है, “आपस में मिलजुल कर रहना चाहिए.”

 

और फिर अगर कुछ फ़र्क़ है भी, तो वो हमीं ने बनाया है. अपनी सहूलियत के हिसाब से. वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से चीज़ों ने एक अलग शकल ले ली है. और हम आपस में बहस करते हैं कि मैं हिन्दू, मैं मुसलमान. सब बेकार की बातें हैं. मेरे क़ुरआन शरीफ़ में लिखा है, “अपने पड़ोसी का ख़याल रखो.” अब तुम बताओ? अब मैं तुम्हें अपना पड़ोसी समझूँ या काफ़िर? काफ़िर मानने में कोई भलाई नहीं है. ना तो मेरी, ना तो तुम्हारी. हम इन्सान अगर मिलजुल कर रहें, और ख़ुश रहें, तो एक दिन वो ऊपरवाला इतना ख़ुश हो जाएगा कि ख़ुद ज़मीन पे आके बताएगा कि, “मैं ही हूँ सबकुछ. सबका भगवान और सबका ख़ुदा.”

 

अहद की फ़िलॉसफ़ी के आगे उसके हिन्दू दोस्त ख़ामोश हो जाते थे. वो कहते थे, “यार, अहद! तेरी सारी बातें हमें तो समझ में आती हैं. मगर, बाक़ी लोगों का क्या? लोग तो हमें ‘नादान नौजवान’ समझकर एक किनारे रख देते हैं. उसका क्या? लोग दंगे-फ़साद करते हैं और बे-गुनाहों को मारते हैं. ऐसी हालत में तू क्या करेगा? अगर इस गाँव में भी कभी दंगा हुआ तो? यहाँ तो तुम लोग बस गिनती भर हो?”

 

अहद इस बात पे मुस्कुराता और हँस के मज़ाक़ में कहता, “अबे, इसीलिए तो मैं तुम लोगों के साथ मन्दिर भी आता हूँ. ताकि तुम लोग मुझे भी अपना भाई समझो. और तुम्हारे भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि, “मेरे हिन्दू भाईयों को थोड़ी अकल दे.” सब अहद की बात सुनके हँस देते थे.

 

वक़्त गुज़रा. सब अपने-अपने रास्ते हो लिए. अहद अब एक बड़े शहर में रहने लगा. जहाँ आए दिन हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़ते-मरते रहते थे. ख़ैर, अहद को अपने अल्लाह और ईश्‍वर पर यक़ीन था कि उसे कोई मुश्किल नहीं होगी, इस नए शहर में. और कुछ ख़ास मुश्किल हुई भी नहीं. वो जिस सोसाईटी में रहता है, वहाँ वो अकेला मुसलमान है. मगर सबने उसे हाथों-हाथ लिया. वजह थी अहद की बीवी, जो एक हिन्दू थी. जी हाँ, अहद ने एक हिन्दू लड़की से शादी की थी.

 

अहद अब भी उसी तरह रहता है. जहाँ मस्जिद मिली, नमाज़ पढ़ ली. जहाँ मन्दिर दिखा, सिर झुका लिया. अहद दीवाली में पटाखे भी लाता है, अपनी बीवी के लिए….छुरछुरी…हाँ जी, अहद की बीवी को दीवाली में छुरछुरी जलाना बहुत पसन्द है. अहद ख़ुद तो पटाखे नहीं जलाता है मगर छुरछुरी जलाने में अपनी बीवी की मदद ज़रूर करता है. अहद को छुरछुरी की जगमग रोशनी बहुत पसन्द है. अपनी बीवी के कहने पर अहद घर के हर कोने में दीया जलाता है. अहद को ये बात बहुत अच्छी लगती है. क्योंकि पूरे साल में एक बार घर का हर कोना रोशनी से जगमगा जाता है. अहद इसी बात से ख़ुश हो लेता है कि, “चलो, इसी बहाने घर के सारे कीटाणु मर जाएँगे.”

 

फिर आया मार्च का महीना. लोग होली की तैयारी करने लगे. पहले तो अहद ने सोचा था, “इस बार होली नहीं खेलूँगा. क्योंकि अब वो गाँव नहीं और वो लोग भी नहीं. तो मज़ा नहीं आएगा.” लेकिन फिर उसने देखा कि उसकी बीवी और तीन साल का बच्चा होली खेलने के लिए तैयार खड़े हैं. अब अगर वो नहीं खेलेगा तो उन्हें भी मज़ा नहीं आएगा.

 

और फिर अहद ने शुरू की अपने तरह की होली. और बाल्टी भर-भर के रंग बनाया. और जो भी दिखा सबको रंग दिया. ख़ूब जमकर होली हुई. सोसाईटी में जिसने नहीं भी देखा था, उसने भी देख लिया कि, “ये वही अहद है, जो ज़्यादातर ख़ामोश रहता है. मगर आज इसे क्या हो गया है? और ये तो होली खेल रहा है? ये तो मुसलमान है ना?”

 

सारी बातों को भूलकर अहद ने जमकर होली खेली. और उसका असर ये हुआ कि रंग इस क़दर चढ़ चुका था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. अहद के दोनों हाथ गुलाबी हो चुके थे. गर्दन के पिछले और किनारे के हिस्से से लेकर कानों तक रंग लगा हुआ था, जो नहाने और रगड़-रगड़ के छुड़ाने के बाद भी नहीं छूटा. अहद को लगा कि, “लोग क्या कहेंगे?” मगर फिर सिर झटककर ख़ुद से कहा, “क्या कहेंगे? पहली बार तो होली खेली नहीं है? हर बार ही खेलते हो! हर बार की तरह इस बार भी एक-आध महीने में छूट ही जाएगा.” और फिर ऐसा सोचकर, वो नहा-धोकर, साफ़ कपड़े पहनके बैठ गया. और होली पे बनी गुझिया खाने लगा. अहद को अपनी बीवी के हाथ की बनी गुझिया बहुत पसन्द है. सच कहें तो होली की हुड़दंग और गुझिए की मिठास ने ही अहद का दिल जीत लिया था. और उसने सारी बातों को दर-किनार करते हुए एक हिन्दू लड़की को पसन्द कर लिया था.

 

यहाँ तक बात उसकी ज़ाती ज़िन्दगी की थी, जिससे किसी को कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए. मगर होली के अगले दिन, जब अहद सुबह की नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद की ओर चला, तब उसके दिमाग़ में तरह-तरह के सवाल आने लगे. ख़ैर, अब वो कर भी क्या सकता है? लोगों के डर से अपना हाथ तो नहीं काट सकता है.

 

अहद मस्जिद में दाख़िल हुआ. उसने वुज़ू किया. सुन्नत तो उसने अकेले में पढ़ ली. मगर फ़र्ज़ पढ़ने के लिए जब सफ़ में खड़ा हुआ, जो कि इमाम के पीछे पढ़ी जाती है, और सब लोग लाइन से खड़े होते हैं. एक-दूसरे से कन्धे से कन्धा मिलाकर. सफ़ इसी लाइन को कहते हैं. इसका तरीक़ा ये होता है कि अगर पहली सफ़ में जगह बाक़ी है, तो लोग आगे बढ़कर पहली सफ़ को पूरा करते हैं. और फिर दूसरी सफ़ बनती है. और इसी तरह लोग लाइन में खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं.

 

अहद दूसरी सफ़ में खड़ा था. मस्जिद में ज़्यादा भीड़ तो नहीं थी. इसलिए पहली सफ़ में जगह बच रही थी. जिसमें बड़े-बड़े बुज़ुर्ग दिखाई दे रहे थे. अहद ने एक-बारगी ये सोचा कि, “अगली सफ़ में न जाए.” मगर वो सफ़ का तरीक़ा तोड़ नहीं सकता था. वो भी सिर्फ़ इसलिए कि, “उसके हाथों-पैरों में होली का रंग लगा हुआ है?”

 

अहद पहली सफ़ में शामिल हो गया. इमाम साहब ने नमाज़ शुरू की. सबने बा-क़ाएदा नमाज़ पढ़ी. अहद ने भी. मगर नमाज़ के दरम्यान अहद का दिमाग़ कुछ बातों पर गया. जैसे कि अहद की हथेलियाँ गुलाबी रंग से रंगी हुई थीं. अहद के पैरों की उँगलियाँ इस तरह से रंगी हुई थीं, जैसे हिन्दुओं के यहाँ नई-नवेली दुल्हन का पैर रंगा जाता है, गुलाबी रंग में. रंग अहद की हथेलियों से होता हुआ पूरे बाज़ू तक फैला हुआ था. अहद की हथेलियाँ ऐसे लग रहीं थीं, जैसे उसने अपने हाथों में गुलाबी रंग की मेंहदी लगाई हो.

 

अहद को महसूस हुआ कि बगल में खड़े बुज़ुर्ग लोग उसे अजीब नज़रों से देख रहे हैं. भले ही लोग नमाज़ में थे, मगर आँखें तो सबकी खुली थीं. और खुली आँखों से जो दिखाई दे रहा था, वो किसी को मन्ज़ूर नहीं था. लेकिन सब थे नमाज़ में, इसलिए कोई कुछ कह भी नहीं सकता था.

 

ख़ैर… नमाज़ ख़त्म हुई और अहद ने अपने रंगीन हाथों से ही अपने ख़ुदा से दुआ माँगी, और हाथ मुँह पर फेरते हुए उठ खड़ा हुआ. उसने देखा, कुछ लोग उसे घूर रहे थे. अहद ने कुछ नहीं कहा. क्योंकि अभी तक किसी ने उससे भी कुछ नहीं कहा था. और जब तक बात मुँह से बाहर नहीं निकलती है, तब तक कोई मुश्किल नहीं होती है.

 

अहद आगे बढ़ा और मस्जिद से बाहर की तरफ़ निकलने लगा. तभी किसी ने कहा, “अस्सलामुअलैकुम!” अहद ने जवाब में कहा, “वलैकुमअस्सलाम!”

 

सलाम करने वाला अकेला नहीं था. मगर अहद ने भी सोचा, “चलो, आज दो-दो हाथ कर ही लेते हैं.” एक ने कहा, “तो जनाब नमाज़ भी पढ़ते हैं और होली भी खेलते हैं?” अब अहद को जवाब देना था. उसने कहा, “जी.”

 

अगला सवाल हुआ, “तो क्या आप अल्लाह से नहीं डरते?” अहद ने जवाब दिया, “अल्लाह से डरता हूँ, तभी तो नमाज़ पढ़ता हूँ.”

 

इस जवाब ने एक पल को ख़ामोशी पैदा कर दी. अब सवाल पूछने वालों को ये समझ में नहीं आ रहा था कि अगला सवाल क्या करें? अहद ने सोचा, “बात ख़त्म हो चुकी है. इन लोगों को इनके सवाल का जवाब मिल चुका है.”

 

उधर सवाल करने वाले भी यही सोच रहे थे कि, “ये तो पढ़ा-लिखा मालूम होता है. इसके ऊपर अपनी बातों का असर नहीं होने वाला.” मगर जब बात यहाँ तक पहुँच ही चुकी थी, तो थोड़ी दूर तक और जानी थी. अब वहाँ कुछ लोग और आ चुके थे. सब अहद को चील की नज़र से देख रहे थे, जैसे नोंच कर खा जाएँगे. वो तो अहद के बदन पे रंग लगा हुआ था. इसलिए सब ख़ुद को रोके हुए थे. क्योंकि रंग से ही तो उन्हें परहेज़ है.

 

तभी भीड़ में से एक सवाल और हुआ, “ये रंग आपको जहन्नुम में ले जाएँगे.” अब अहद को गुस्सा आने लगा, क्योंकि उससे सवाल करने वाले जाहिल लोग थे, जिन्हें ख़ुद जन्नत और जहन्नुम के बारे में ठीक से पता नहीं है, वो उसे जहन्नुम में भेज रहे थे, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसके हाथ-पैरों में रंग लगा हुआ है. फिर भी अहद ने अपने गुस्से को पीकर बात का जवाब बात से ही देना ठीक समझा. वैसे भी, क़ुरआन झगड़े को जितना हो सके, टालने की नसीहत देता है.

 

अहद ने इस बात का जवाब कुछ यूँ दिया, “कौन जाने जनाब? किसको जन्नत मिलेगी, और किसे जहन्नुम? ये तो ख़ुदा ही जानता है. और ये आप भी जानते होंगे कि ख़ुदा को किसकी कौन सी अदा पसन्द आ जाए, ये भी सिर्फ़ ख़ुदा ही जानता है. मेरे हाथों में रंग लगा है. इस बात पे आपने मेरा जहन्नुम का टिकट निकाल दिया. और मैंने इन्हीं रंग लगे हाथों से नमाज़ पढ़ी है. तो हो सकता है, ख़ुदा मेरे इस नमाज़ पढ़ने के तरीक़े को पसन्द कर ले, और मुझे जन्नत में डाल दे. और मुझे इन रंगो के बदले रंगीन चादर दे, ओढ़ने के लिए. जैसे बाक़ी जन्नत में जाने वालों को सफ़ेद चादर मिलती है. तो मैं तो इस बात से ख़ुश हूँ कि ख़ुदा मुझे अलग नज़र से देखेगा. जैसे आप लोग देख रहे हैं. मगर मुझे पता है, आपकी नज़र और ख़ुदा की नज़र में बहुत फ़र्क़ है.” अहद के इस जवाब ने सबको लाजवाब कर दिया. एक बार के लिए तो भीड़ में खड़ा हर आदमी सोचने लगा, “काश, मेरे भी हाथ रंगीन होते.”

 

धीरे-धीरे भीड़ छँटने लगी और अहद को अपना रास्ता दिखाई दिया. फिर अहद अपने घर की ओर चल दिया. रास्ते में वो एक बार फिर अपने रंगीन हाथों को देखने लगा और सोचने लगा… अहद सोचने लगा कि, “वो जन्नत में है. चारों तरफ़ सफ़ेद बादल हैं. सब लोग सफ़ेद लिबास में हाथ ऊपर किए खड़े हैं. इन्हीं लोगों के बीच में अहद अकेला गुलाबी लिबास में लिपटा हुआ खड़ा है, और ख़ुदा का शुक्रिया अदा कर रहा है.”

 

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