हे बिहारवासियों दोष स्वच्छता रैंकिंग को नहीं अपनी आदतों को दीजिए

Posted by nitu navgeet in Hindi, Society
May 8, 2017

स्वच्छता के आधार पर विभिन्न शहरों की रैंकिंग स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा है। यह रैंकिंग भी विवादों से परे नहीं रही है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य ने खुद को इस रैंकिंग से अलग रखकर इसकी महत्ता को कम करने का प्रयास भी किया। फिर भी शहरवासियों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए इस रैंकिंग को आवश्यक समझा गया। स्वच्छता सर्वेक्षण के ताज़ा आंकड़े जारी कर दिए गए हैं। कुछ नतीजे चौकाने वाले हैं। फिर भी इस रैंकिंग को महत्व दिया जाना ज़रूरी है।

स्वच्छ शहर रैंकिंग में इस वर्ष मध्यप्रदेश के दो शहरों इंदौर और भोपाल ने क्रमशः पहला और दूसरा स्थान हासिल किया है। विशाखापट्टनम को तीसरा और सूरत को चौथा स्थान मिला है। पिछले साल इस रैंकिंग में पहले स्थान पर रहने वाले मैसूर को इस वर्ष पांचवा स्थान मिला है। तिरुचिरापल्ली, नई दिल्ली, नवी मुंबई और बड़ोदरा जैसे शहर भी भारत के 10 सबसे स्वच्छ शहरों में शामिल किए गए हैं। सबसे कम स्वच्छ रहने वाले शहरों में 5 शहर- शाहजहांपुर, बहराइच, हरदोई खुर्जा और गोंडा उत्तर प्रदेश के हैं।

पंजाब के दो शहर अबोहर और मुक्तसर, बिहार के दो शहर कटिहार और बगहा तथा महाराष्ट्र का भुसावल शहर भी 10 सबसे ज़्यादा गंदे शहरों में शामिल हैं। इस सूची में बिहार की राजधानी पटना को 262वां और झारखंड की राजधानी रांची को 117वां स्थान मिला है। बिहार का कोई भी शहर 100 सर्वाधिक स्वच्छ शहरों की सूची में शामिल नहीं है। बिहार शरीफ़ को 146वां, हाजीपुर को 272वां और मुजफ्फरपुर को 304वां स्थान मिला है। झारखंड के चार शहर- चास, जमशेदपुर, गिरिडीह और हज़ारीबाग 100 सर्वाधिक स्वच्छ शहरों की सूची में शामिल हैं।

बिहार के शहर मधुबनी के बस स्टैंड पर बिखरी गंदगी

स्वच्छता रैंकिंग पर कई शहरों और राज्यों को आपत्ति है। पटना को कुल 2000 में से 878.58 अंक मिले हैं। स्वच्छता की खराब रैंकिंग मिलने पर आत्म निरीक्षण की आवश्यकता थी। रैंकिंग में जिन कारणों से पिछड़े थे, उनको दूर करने के लिए सबक़ लेने की ज़रूरत थी। लेकिन उधर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। नगर प्रशासक से नेता और शहरवासी तक रैंकिंग की प्रक्रिया पर ही सवाल उठा रहे हैं। तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं, वैसे कि जैसे मैच हारने वाला खिलाड़ी कभी अंपायर पर तो कभी खेल के मैदान पर दोष मढ़ता है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि आंगन को टेढ़ा बता देने मात्र से कोई भी नृत्य की कला में निपुण नहीं होता। उसके लिए तो पसीना बहाना होता है, लगातार प्रयास करना पड़ता है।

स्वच्छता के पैमाने पर पिछड़ जाने वाले शहरों को उसी तरह से आत्ममंथन करने की ज़रूरत है। आत्ममंथन में पाई गई कमियों को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास भी उतना ही आवश्यक है। लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं रहा। अधिकतर लोग यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि पटना, रांची और मुजफ्फरपुर जैसे शहर गंदे हैं। और जब तक हम यह मान नहीं लेते कि हर गली, हर नाला और हर सड़क गंदी है, तब तक सुधार की बात बेमानी है।

तीन-चार साल पहले इंदौर की रैंकिंग भी बहुत खराब थी। लेकिन उस शहर ने अपनी खराब रैंकिंग से विचलित हुए बिना स्वच्छता के विभिन्न उपायों पर काम किया जिससे रैंकिंग में सुधार हो सके। नतीजा इस वर्ष सामने आया है। वर्ष 2014 में 149वें स्थान पर रहने वाला इंदौर 3 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद आज पहले स्थान पर विराजमान है। यदि अगले 3 वर्षों तक सही रणनीति अपनाते हुए सही कार्ययोजना पर काम किया जाए तो पटना, मुजफ्फरपुर और रांची जैसे शहर भी स्वच्छता रैंकिंग में नंबर वन स्थान हासिल कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए पहले सच्चाई को स्वीकार करना होगा। झूठ की बुनियाद पर खड़ी की गई इमारत कभी भी टिकाऊ नहीं होती। अधिकतर बार यह तो बनने से पहले ही ढह जाया करती है।

ऐसा नहीं है कि हम स्वच्छता के प्रति संकल्पित नहीं हैं। लेकिन वह संकल्प टुकड़ों में बंटा होता है। दीपावली के कुछ दिन पूर्व हम पूरा घर साफ करते हैं और साफ करने की इसी प्रक्रिया में अपने मोहल्ले को गंदा कर देते हैं। छठ आता है तो गली-गली को चमका देते हैं लेकिन नालियों को गंदा छोड़ देते हैं। हम लोग स्वच्छता को लेकर तब ही संकल्पित होते हैं जब किसी राजनेता का आगमन हो, किसी समारोह का उद्घाटन हो, कोई बड़ी रैली होने वाली हो या कोई भी बड़ा आयोजन हो।

उन आयोजनों पर हम लोग अपने पास-पड़ोस तक की भी सफ़ाई कराने से पीछे नहीं हटते। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्म देखने से पहले हम लोग टिकट को ख़ूब संभालकर रखते हैं, लेकिन फ़िल्म देखने के बाद टिकट को जेब से निकालकर या तो वहीं फेंक देते हैं या जहां भी मर्ज़ी हो। जब तक तमाशा चलता है, तब तक हम इंसान बने रहते हैं और तमाशा ख़त्म होते ही सभी अपने-अपने घरों को रवाना हो जाते हैं, मानो तमाशे वाली जगह से से कभी कोई संबंध ही नहीं था।

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के 350वें जन्मोत्सव के अवसर पर बिहार की राजधानी पटना को साफ करने के लिए बड़ा अभियान चलाया गया। शहर साफ दिखने लगा। ऐसा प्रतीत हुआ मानो गंदगी का साम्राज्य सदा के लिए समाप्त हो गया। हर तरफ़ सरकार की जय जयकार गूंज रही थी। सब कुछ क़रीने से! व्यवस्थित!! पूरा शहर स्वच्छ!!! फिर गुरु पर्व ख़त्म हुआ और पुनः वही अव्यवस्था! वही बेतरतीब शैली!!

हमें समझना होगा कि स्वच्छता एक दिन के लिए किया जाने वाला नाटक नहीं है। स्वच्छता बहस का कोई मुद्दा भी नहीं है। स्वच्छता के आधार पर बनाई जाने वाली रैंकिंग भी शायद बकवास ही है। लेकिन सबको मानना होगा कि स्वच्छता एक संस्कार है जिसे हम सभी को अपनी आदतों में शामिल करना होगा। हम जिस तरह अपने दांतों की हम रोज़ सफ़ाई करते हैं, शरीर व घर की भी नियमित सफ़ाई करते हैं तो थोड़ा समय अपने आस-पास और शहर के लिए भी क्यूं नहीं! और इसके लिए हमें अलग से समय देने की भी ज़रूरत नहीं। बस ज़रा सी अपनी आदतें बदलें। यह कड़वी सच्चाई है कि लोग चलते-फिरते रास्ते में ही कचरा फेंक देते हैं, कहीं भी पान गुटका खाकर थूक कर चले जाते हैं, गाड़ी रोककर कहीं भी पेशाब के लिए दीवार पकड़ लेते हैं।

गांधीजी ने स्वच्छता के लिए कठोर नियमों के पालन की वकालत की थी। उनका कहना था कि कठोर नियमों से हमें गुस्सा आता है। लेकिन हमें इन कठोर नियमों को मानना चाहिए ताकि हम अपनी गलती फिर से न दोहराएं। स्वच्छता अपने आप में एक पुरस्कार है।

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