पूंजीवाद के शोषण के खिलाफ लड़ना है तो मज़दूरों को एक होना होगा

Posted by Deepak Bhaskar in Hindi, Human Rights
May 2, 2017

एक मई का दिन दुनिया भर में “अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस” (इसे 19वीं सदीं में सेकंड कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के द्वारा शुरू किया गया था) के रूप में भी जाना जाता है। 17वीं शताब्दी के बाद औद्योगिक क्रांति हुई और उससे पैदा हुआ उपनिवेशवाद, जिसने दुनिया भर को गुलामी के दौर में फिर से धकेल दिया था। हालांकि उसके बाद मुल्कों के आज़ाद होने का दौर शुरू हुआ, मुल्क आज़ाद होते गए लेकिन मज़दूर गुलाम से भी बद्दतर ज़िंदगी जीने को मजबूर हो गए थे। बहरहाल अलग-अलग देशों की दशाएं अलग-अलग थी और देश भी तो बाटें गए थे कि ये ज़मीन का टुकड़ा तेरा तो ये मेरा। बस दो चीज़ें मुल्कों के परे थी, वह था पूंजीवाद और मज़दूरों का शोषण। पूंजीवाद शोषक था और मज़दूर शोषित और इन दोनों की दशा किसी भी मुल्क में एक जैसी ही थी। पूंजीवाद मुनाफाखोरी के लिए मज़दूर का शोषण, उत्पीड़न को ही अपना आधार मान रहा था।

इन सब के बीच विश्व इतिहास में कार्ल हेनरिक मार्क्स का पदार्पण हुआ, जिसने पूंजीवाद के शोषक चरित्र को बखूबी पहचाना और इससे निजात पाने का समाधान और एक शोषणरहित समाज की कल्पना भी की। मार्क्स ने पहचाना कि पूंजीवाद मानव को मानव से अलग कर देगा और मानवीय वेदना से इंसान का विच्छेद हो जाएगा, लोग बरबस एक मशीन बनकर रह जाएंगे। एक ऐसी मशीन जिससे कितनी भी देर काम कराया जाए, उसे दर्द नहीं होगा, वह थकेगा नहीं, वह कुछ बोलेगा नहीं और बस काम करता जाएगा वो भी किसी और के बेहतर जीवन के लिए। वह कभी मुखालफत भी नहीं करेगा क्योंकि उसे सबसे अलग-थलग कर दिया गया है। जिस तरह पूंजीवाद का कोई राष्ट्र नहीं होता, उसी तरह मज़दूरों को पहले उसके राष्ट्र, समाज और परिवार से अलग कर दिया जायेगा। यहां के मज़दूर वहां और कहीं और के कहीं और।

पूंजीवाद की मुखालफत करते हुए कार्ल मार्क्स ने कहा कि पूंजीवाद का शोषक चरित्र अंतर्राष्ट्रीय है और इस व्यवस्था से लड़ने के लिए दुनिया भर के मज़दूरों को भी एक होना पड़ेगा। मज़दूर चाहे किसी भी देश या महादेश में हों, उनके शोषण से ही पूंजीवाद खड़ा रहता है। सोचने वाली बात है, पूंजीवाद एक ऐसा शोषण तंत्र हैं जिसमें गरीब मज़दूर और गरीब होते जा रहे हैं और मानवीय मूल्य ढहते जा रहे हैं। एक गरीब अगर 50 रूपये का मोबाइल रिचार्ज करवाता है तो उसके 2 रूपये कट जाते हैं और एक धनी व्यक्ति अगर 2000 का रीचार्ज करवाता है तो उसे 500 रूपये का कैशबैक मिलता है।

यह अमीर को और अमीर बनाने की व्यव्य्स्था नहीं तो और क्या है? हर देश की सरकारें (जिसे मार्क्स ने पूंजीवादियों के लिए काम करने वाली कमिटी कहा था) अपने नुमाइंदों का वेतन हर 6 महीने (या 1 साल) पर बढ़ाती रहती हैं, लेकिन मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी में महज़ एक रुपया (जैसे कि अभी हाल ही में मनरेगा में मज़दूरी को एक रुपया बढ़ाया गया है) बढ़ाकर काम चला लिया जाता है। पूंजीवाद अब मानवीय मुखौटा भी पहन चुका है लेकिन उसका शोषक चरित्र आज और भी विभत्स हो चुका है।

ऐसे में कार्ल मार्क्स ने सही ही कहा था कि पूंजीवाद अगर एक है तो उससे संघर्ष भी एक होकर ही करना पड़ेगा। अगर पूंजीवाद दुनियाभर के मज़दूरों, गरीबों का शोषण कर रहा है तो बस और कुछ नहीं बल्कि दुनियाभर के मज़दूरों को एक हो जाना चाहिए। जब तक मज़दूर, गरीब उठ खड़ा नही होता तब तक हर व्यक्ति उसको अपने से बड़ा लगता है। मार्क्स ने कितना सही कहा था कि “दुनिया के मज़दूरों एक हो, तुम्हारे पास लोहे की जंजीरों को खोने को सिवाय और कुछ भी नहीं। इस दुनिया के गरीब, मज़दूर के सामने एक दूसरे के लिए, पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष करना ही एकमात्र रास्ता है। इस शोषक व्यवस्था के खिलाफ सभी को एक हो जाना चाहिए।”

सैकड़ों साल बीत गए लेकिन मार्क्स की बातें आज भी प्रासंगिक हैं। आज भी मज़दूर समाज के हाशिये पर रहने वाले लोग हैं। मज़दूर मार्किट के नाम पर मानव द्वारा मानव की खरीद बिक्री जैसी व्यवस्था चल रही है। मई दिवस मना लेने भर से मज़दूरों का समाधान नहीं होगा बल्कि पूंजीवाद के शोषक चरित्र को ख़त्म करने से ही मज़दूर का कल्याण हो पाएगा।

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