जंग-ए-आज़ादी और क्रांतिकारियों का कारखाना चंबल

Posted by Prashant Jha in Hindi, History, Inspiration
May 17, 2017

जब नाम चंबल का लिया जाता है तो सबसे पहले मन में बनती है एक छवी। छवी डाकुओं की छवी बीहड़ की। शायद ही कभी बीहड़ या चंबल के नाम से हमें अपने स्वतंत्रता संग्राम और उनके नायकों की याद आती है। चंबल का इतिहास खुद में राम प्रसाद बिस्मिल, गेंदा लाल दीक्षित, भारतवीर मुकंदीलाल जैसे ना जाने कितने ही वीर नायकों की कहानी समेटे हुए है। लेकिन जो फिल्मों में नहीं आया वो किसी काम का नहीं। और जो फिल्मों में आया वो ही हमारे ज़हन में चंबल की हकीकत बन गया।

बहुत ज़्यादा नहीं तो थोड़ा सा तो दुखद है ये कि जो क्रांति कर गए हैं इस देश के लिए उनको उजाले में लाने के लिए भी एक क्रांति की ज़रूरत पड़ती है। खैर अच्छा ये है कि अभी भी ऐसे लोग हैं जो ये करने को तैयार हैं। वरना कौन बीहड़ के 53 डिग्री वाले तापमान में जाए गड़े मुर्दे उखाड़ने। बुलेट ट्रेन के ज़माने में साइकिल वाले क्रांतिकारी शाह आलम से बेहतर इस ज़िम्मेदारी को कौन समझ सकता था।
1857 के ऐतिहासिक विद्रोह के 160 साल पूरे होने पर शाह आलम और उनकी टीम चंबल के पचनदा(पांच नदियों के संगम) के तट पर जनसंसद का आयोजन करने जा रही है। इसमें चंबल के आम जनों की बात तो होगी ही साथ ही उन दस्तावेज़ों और कहानियों पर से भी धूल हटाया जाएगा जो चंबल के बीहड़ की गोद से ही महान क्रांतिकारियों ने रची थी।

शाह आलम

दरअसल 25 मई चंबल के इतिहास में बहुत अहम है। 1857 की जनक्रांति का ह्रदयस्थल पचनदा सामरिक और छापामार जंग की दृष्टि से सबसे अहम इलाका माना जाता रहा है। 25 मई को ही हजारों क्रांतिकारियों ने पचनदा पर इकट्ठा होकर इसे क्रांति का सबसे बड़ा केन्द्र बनाया और आज़ादी की पहली जंग का आगाज़ किया था। राष्ट्रीय स्तर का नेतृत्‍व इसी केन्द्र से 1872 तक लगातार अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ शंखनाद कर अंग्रेजों के नाक में दम करता रहा। यही वह जगह है जहां अंग्रेजों को क्रांतिवीरों की लाशों के ऊपर से गुजरना पड़ा।
क्रांति की जितनी अच्छी तैयारी चंबल में थी, उतनी अच्छी देश में कहीं और दिखाई नहीं देती है। यहां की लड़ाका ताकतों के संयुक्त मोर्चा की ललकार के सामने अंग्रेजी सेना टिक ही नहीं पाती थी। खाली और आधा पेट लड़ रहे चंबल के बहादुर रणबांकुरों को न तो वेतन मिलता था और न ही पेंशन। आजादी की यह लड़ाई केवल जनता के सक्रिय सहयोग से चलती थी।

पचनदा तट पर साथियों सग शाह आलम

‘नर्सरी आफ सोल्जर्स’ के नाम से भी जाना जाता है चंबल

1857 के आजादी के पहले आंदोलन में जब पूरे देश में क्रांति के केन्द्र ध्‍वस्‍त कर दिये गये, हज़ारों शहादतें हुईं, हज़ारों महानायकों को कालापानी भेज दिया गया, उस वक्‍त देशभर के क्रांतिकारी चंबल की आगोश में खिंचे चले आये। इसीलिए यह धरती महान स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों का ट्रेनिंग सेंटर बन पायी।

जननायक गंगा सिंह, रूप सिंह सेंगर, निरंजन सिंह चौहान, जंगली-मंगली बाल्मीकि, पीतम सिंह, बंकट सिंह कुशवाह, चौधरी रामप्रसाद पाठक, गंधर्व सिंह, भैरवी, मुराद अली खां, काशीबाई, शेर अंदाज अली, चिमना जी, तेजाबाई, शेर अली नूरानी, चुन्नी लोधी, ताज खां, शिवप्रसाद, हर प्रसाद, मुक्खा, गेंदालाल दीक्षित, बागी सरदार लक्ष्मणानंद ब्रह्मचारी, राम प्रसाद बिस्मिल, भारतवीर मुकंदीलाल गुप्ता जैसे तमाम करिश्माई योद्धाओं के लिए चंबल की घाटी शरणस्थली बनी रही। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की फौज में सबसे ज्यादा सैनिक चम्बल घाटी से ही थे। यह घाटी फौज में आज भी अपने नौनिहालों को देश की रक्षा के लिए भेजती है।

मुरैना का मितावली मंदिर जिसके आधार पर बनाई गई देश की संसद

1857 के बाद भी लगातार चंबल से इंकलाब का बिगुल बजता रहा। 1916 में बने उत्तर भारत के गुप्त क्रांतिकारी दल ‘मातृवेदी’ की सेन्ट्रल कमेटी में 40 क्रांतिकारी सदस्यों में से 30 चंबल के ‘बागी’ ही शामिल थे। इस इलाके से देश में आजादी का बसंत लाने के लिए अनोखे प्रयोग निरंतर चलते रहे। दुनिया भर में सबसे ज्यादा लंबा चलने वाले आंदोलन में करीब सात लाख नौजवान अपना लहू देकर देश की मिट्टी को सुर्खरु कर गए। यहां के वीर रणबांकुरों ने चीनी मुक्ति संग्राम में भी अपनी आहुति दी, जो आज भी यहां के लोगों के स्मृतियों में कैद है।

पचनदा में बहता पानी भले ही शांत, ठहरा और साफ-सुथरा दिखता हो लेकिन हकीकत यह है कि बीहड़ों में जिंदगी उतनी ही उथल-पुथल भरी है। एक साजिश के तहत हमेशा से चंबल क्षेत्र को डार्कजोन बना कर उपेक्षित रखा गया जबकि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान तक फैला यह विशाल बीहड़ क्रांतिकारियों की शरणस्थली के रूप में मशहूर रहा है। आज आजादी के 70 साल बाद भी क्रांतिकारियों के वारिसों को सत्‍ता के हाथों अपमान के अलावा और कुछ भी हाथ नहीं लगा है। आज सबसे बड़ा सवाल मुंह बाये खड़ा है कि सबसे ज्यादा कुर्बानी देने वाली यह सरजमीं इतनी उपेक्षित क्यों है? बात केवल सत्‍ता की नहीं है, जनता भी इसके लिए उतनी ही जिम्‍मेदार है। आज हम लोग चंबल के जननायकों के नाम तक नहीं जानते। जो लोग जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ कर कंधे से कंधा मिलाकर अपनी जान की बाजी लगा रहे थे, खुद उनके वारिस उन्‍हें भुला चुके हैं।

पचनदा पर जनसंसद

160 साल पहले हमारे लड़ाका पुरखों ने जो आवाज बुलंद की थी, आज हमें उसी रवायत को जिन्दा रखते हुए समाज की बेहतरी के लिए अपने मजबूत हाथों से मशाल थामनी होगी। आज फिर उन दस्तावेजों पर पड़े जाले को साफ करके साझी विरासत के प्रतीकों को आत्मसात करने की जरूरत आन पड़ी है। अपने लड़ाका पुरखों को याद करने का इससे बेहतर मौका और नहीं हो सकता। और इसिलिए यह कार्यक्रम 1857 की जनक्रांति के 160 साल पूरा होने पर आयोजित किया जा रहा है जिसमें

• चंबल के क्रांतिवीरो की याद में क्रांति तीर्थ पांच नदियों के संगम तट (पचनदा) पर जनसंसद चलाया जाएगा
• चंबल के बीहड़वासियों की जन समस्याओं को लेकर पचनद, जगम्मनपुर, जालौन में चर्चा की जाएगी
• चंबल घाटी ( जालौन, औरैया, इटावा, भिन्ड, मुरैना, धौलपुर ) के प्रतिनिधि करेंगे हिस्सेदारी

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