घरेलू कचरे से निजाद पाने का बेहतरीन तरीका है कम्पोस्टिंग

Posted by Sidharth Bhatt in Environment, Hindi
May 16, 2017

भारत के शहरों में रहने वाले तकरीबन 38 करोड़ लोगों के घर से हर साल 62 मिलियन टन म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (ठोस कचरा) पैदा होता है। इनमें से केवल 43 मिलियन टन नगर पालिकाओं और नगर निगमों द्वारा इकठ्ठा किया जाता है जिसमें से करीब 12 मिलियन टन कचरे का ट्रीटमेंट (रीसाइक्लिंग, कम्पोस्टिंग और उर्जा-उत्पादन) होता है और बाकी 31 मिलियन टन को लैंडफिल्स में डाल दिया जाता है।

ऊपर लिखे आंकड़े हमारे देश में वेस्ट मैनेजमेंट की समस्या की एक बानगी भर है। इस तरह के कई आंकड़े हमें इन्टरनेट पर आसानी से मिल सकते हैं। लेकिन इस गंभीर समस्या को हल करने के लिए हम अपने स्तर पर यानी कि एक आम कामकाजी शहरी के तौर पर क्या कर सकते हैं? इस सवाल का जवाब है ‘कम्पोस्टिंग’। सोचिये कि हर घर में अगर कम्पोस्टिंग की जाए तो कचरे में किनती कमी आ सकती है! और यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया भी नहीं है, हां थोड़ी मेहनत तो करनी ही होगी। हमें जैविक (ऑर्गेनिक) और अजैविक (इनोर्गेनिक) कचरे को अलग-अलग करने की आदत डालनी होगी जो इस कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया की शुरुआत करने की दिशा में हमारे लिए सबसे बड़ा चैलेंज है।

1)- कैसे बनाएं कम्पोस्ट:

a)- ऑर्गेनिक या जैविक कचरा b)- तैयार कम्पोस्ट खाद

अगर आप बड़े शहरों में नहीं रह रहे हैं और घर के बाहर जगह है तो वहां करीब 2 से 3 फुट गहरा और डेढ़ फीट चौड़ा एक गड्ढा बना लें। अब इस गड्ढे में एक परत मिट्टी (+गोबर) की डालें और इसके ऊपर घर का जैविक कचरा डालें उसके ऊपर एक परत मिटटी की डाल दें। गड्ढा भर जाने पर इसे ढक कर तब तक के लिए छोड़ दें जब तक कि यह अपनी मात्र का एक तिहाई ना रह जाए। अब इसे निकाल लें और सूखे पत्तों या अखबार से ढक कर रख दें, करीब 2 हफ़्तों के बाद कम्पोस्ट इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाएगी। अगर आप बड़े शहरों में रहते हैं तो गड्ढे की जगह पर बड़ा गमला या मिट्टी का कोई बर्तन या प्लास्टिक का ड्रम इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह से तैयार हुई कम्पोस्ट को घर में उगाए जाने वाले पौधों में या किचन गार्डन में इस्तेमाल किया जा सकता है, नहीं तो पास के किसी पार्क में आप इसे स्वेच्छा से डाल सकते हैं।

2)- कैसे हुई कम्पोस्टिंग की शुरुआत :

सीड बॉल

अगर आपको लगता है कि कम्पोस्टिंग की प्रक्रिया कुछ सालों पहले ही इजाद की गई है तो आपको बता दें कि कम्पोस्टिंग का इतिहास 4000 साल से भी पुराना है। कम्पोस्टिंग का पहला ज़िक्र 2320 बी.सी. से 2120 बी.सी. के बीच, मैसापोटेमिया (वर्तमान इराक) के अक्काडियन साम्राज्य के समय की एक क्ले-टेबलेट (मिट्टी से बनाई गयी एक स्लेट जिसे लिखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था) में मिलता है। इसके आलावा 1500 बी.सी. से 400 बी.सी. के बीच ऋगवेद और अथर्ववेद में भी कम्पोस्टिंग का ज़िक्र मिलता है।

दुनिया की तमाम जगहों से इस तरह के सबूत मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि मनुष्य के खेती करने के साथ-साथ खाद बनाने और कम्पोस्टिंग करने के तरीकों की भी खोज की गयी। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति से मिलने वाली चीजों का महत्व समझा और विकास के लिए प्राकृतिक तरीकों का उपयोग करना भी सीखा। मसलन 50 बी.सी. के आस-पास मिस्र (इजिप्ट) की रानी क्लीओपैट्रिया ने अपने राज्य में खेती की जमीन से केंचुए निकालने को अपराध घोषित किया था और ऐसा करने वाले को मौत की सजा देने का प्रावधान था।

इसी तरह 1000 बी.सी. से 1500 बी.सी. के बीच अमेरिका के मूल निवासियों ने सीड बॉल का अविष्कार किया था। सीड बॉल को बनाने के लिए बीज को कम्पोस्ट के एक गोले के अन्दर रख दिया जाता है, जिससे बीज को पनपने के लिए ज़रूरी पोषक तत्व तो मिलते ही हैं साथ ही उसमे नमी भी बनी रहती है।

कम्पोस्टिंग टम्बलर (कम्पोस्ट तैयार करने का बर्तन)

जैसे किसी पेड़ को पनपने के लिए उसकी जड़ें ज़रूरी हैं, ठीक वैसे ही हमें आज की कठिन परिस्थितियों से निकलने के लिए हमारी जड़ों यानि कि हमारे पूर्वजों के ज्ञान की ओर देखने की ज़रूरत है। तकनीकी विकास और आधुनिक सोच के साथ यह भी ज़रूरी है। कम्पोस्ट का एक और फायदा ये होगा कि आपके घर से निकलने वाला कचरा केवल अजैविक कचरा होगा, जिसकी छंटनी नगर निगम या नगर पालिका को नहीं करनी होगी।

द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक भारत में हर साल निकलने वाले कचरे की मात्रा 165 मिलियन टन हो जाएगी। इसके लिए 66000 हेक्टेयर ज़मीन यानी लगभग बैंगलुरु शहर के बराबर की ज़मीन हमें लैंडफिल के लिए चाहिए होगी। क्लाइमेट चेंज एक सच्चाई है जिसे ना केवल स्वीकार करना होगा बल्कि हम सभी को अपने स्तर पर इसे लेकर कुछ करना भी होगा। आपकी सोसाइटी में, आपके मोहल्ले में और आपके दोस्तों से इस बारे में बात करें। अगर आप किसी स्कूल में काम करते हैं तो वहां भी कम्पोस्ट बनाने की बात को रखें। अगर आपके सुझाव को मान लिया जाता है तो बच्चे भी इस प्रक्रिया से वाकिफ होंगे और ऐसे ही तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान पहुंचता है।

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