शादी बियाह वाली नचनिया और इज्ज़तदार समाज

बॉलीवुड में हम माधुरी दीक्षित के डांस की सराहना करते नहीं थकते और इन अभिनेत्रियों के डांस को कला की श्रेणी में रख उन्हें उनकी कला के लिए अवॉर्डस से भी सम्मानित करते हैं। लेकिन इसी देश के पूर्वी उतर प्रदेश में महिला डांसरों को अवॉर्ड देना तो दूर की बात है, हम तो उन महिला डांसरों को पल-पल प्रताड़ित ही करते हैं। अगर आप पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में किसी शादी का हिस्सा बनेंगे तो आप महिला डांसरों द्वारा व्यतीत किये जा रहे अपमानजनक जीवन की झलक देख पाएंगे।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में हर पारिवारिक समारोह जैसे कि शादी पर “महिला अॉर्केस्ट्रा” को मनोरंजन के लिए बुलाना इन समारोहों का अटूट अंग बन गया है। इस “अॉर्केस्ट्रा” को आम बोलचाल की भाषा में “नाच” और महिला डांसरों को अपमानजनक लहज़े में “नचनिया” कहा जाता है।

इन महिला डांसरोंं को पल-पल प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है। अभी कुछ दिनों पहले जब मैंने ये अपमानजनक दृश्य अपनी आंखों से देखा तो मैं स्वयं भी लज्जित हो गया। जब महिला डांसर स्टेज पर आई तो सभी दर्शक अति उत्तेजित हो गए। और जब महिला डांसर ने भोजपुरी गाने पर डांस करना शुरू किया तब कुछ दर्शकों ने भद्दे कमेंट करना और फब्तियां कसना शुरू कर दिया।

हद तो तब हो गई जब कुछ पुरुष मंच पर चढ़कर महिला डांसर को अभद्र तरीके से छूने लगे, कुछ मर्द भद्दे भोजपुरी गानों पर डांसर के साथ डांस करने की इच्छा ज़ाहिर करने लगे। ये अपमान उन महिला डांसरों को केवल इसलिए सहना पड़ता है क्योंकि उन्होंने डांस को अपना व्यवसाय बना लिया है। और इ व्यवसाय को पूर्वी यूपी के पुरूष प्रधान समाज में तुच्छ नज़रों से देखा जाता है। इन महिला डांसरों को चरित्रहीन समझा जाता है।

डांसर पिंकी जो झारखंड से यूपी आई हैं, वो बताती हैं कि महिला डांसर को सबसे ज़्यादा अपमानजनक जीवन जीना पड़ता है। लेकिन ये जीवन हम इच्छा से नहीं बल्कि मजबूरियों के कारण जीते हैं। पिंकी बताती हैं कि गांव में उनसे कोई भी बात नहीं करता, उनके बच्चे के साथ कोई नहीं खेलता और पूरे गांव ने उनका बहिष्कार किया है।

यूपी के गांवों में आज भी इन महिला डांसर को तुच्छ और चरित्रहीन की श्रेणी में रखा जाता है, उनके साथ अपमानजनक तथा अभद्र व्यवहार किया जाता है और उन्हें हर वक्त यातनाएं झेलनी पड़ती है। संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकार जैसे- सम्मानित जीवन जीने के अधिकार से उन्हें वंचित रखा गया है। अब समय है कि महिलाओं को लैंगिग न्याय और बराबरी दिलाने की मुहिम में इन महिला डांसरों को भी सम्मानित जीवन जीने के उनके मौलिक अधिकार के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं।

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