अपने प्रॉडक्ट को बेचने के लिए सेना का इस्तेमाल करती कंपनियां

उपभोक्तावाद की रचनात्मक अभिव्यक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर है, रोज़ नए विज्ञापन हमारे मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं। हम घिरे हुए हैं चारों तरफ से उपभोक्तावाद के मकड़जाल से। पर मेरा प्रश्न इस उपभोक्तावाद से नहीं है। बल्कि देखने वाली बात ये है कि कैसे हमारे विज्ञापनकर्ता बड़ी चतुराई से जनमानस की भावनाओं का उपयोग अपने उत्पादों के लिए कर रहे हैं। भावनाएं जब उपभोग का साधन बन जाए तो उसका अक्सर ऐसे ही इस्तेमाल होता है।

राष्ट्रवाद की जो नई लहर चली है, सबने उसे अपनी तरह से भुनाने की कोशिश की है और कर रहे हैं। नेताओं के लिए राष्ट्रवाद एक rhetoric है, जनमानस के लिए उन्माद और व्यवसायियों के लिए अवसर। विज्ञापन की रचनात्मकता होती ही ऐसी है, दुनिया की किसी भी चीज़ को अपने उत्पाद से जोड़ा जा सकता है। और यहां तो बात राष्ट्रवाद की है, इसको सीमेंट से लेकर टूथपेस्ट सब कुछ बेचने में इस्तेमाल किया जा सकता है। आजकल एक नया साधन मिल गया है राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति का और वो है सेना।

राष्ट्रवाद की मानो एकमात्र परिपाटी हो गयी है, मानव अगर सेना में है तो ही उसका जीवन समर्थ है सक्षम है, आपके जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या हो सरहद पर लड़ रहे फौजियों से कम ही है। माननीय अक्षय कुमार जी ने कुछ दिनों पहले एक लड़के के आत्मदाह की समस्या पर बोलते हुए लड़के को संयम और दिलेरी की सीख दी और उदाहरण बनी सेना। कुछ महीनों पहले जब जनमानस अचानक से टूटे, नोटबंदी के कहर से त्रस्त था तो उन्हें संयम और सहनशक्ति का पाठ पढ़ाने का आधार बनी सेना। इसी परिपाटी को हमारे विज्ञापन आगे बढ़ा रहे हैं।

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सेना, आधुनिक भारतीय समाज में लोक समर्थन प्राप्त करने का सबसे बढ़िया माध्यम है, तो हर गुण की अभिव्यक्ति सेना में ढूंढी जा रही है। कोई सैन्य जलपोत के लोहे से बाइक तैयार कर रहे हैं जिसको चलाने से “जोश और गर्व” का भाव आता है और जो “बाइको का शेर है”। किसी ने गाड़ी के टायर, किसी ने पूरी गाड़ी, किसी ने वुड प्लांक और हाल फिलहाल किसी ने सीमेंट तक को सेना से जोड़ दिया। अब सेना और सीमेंट में क्या संबंध है ये तो उत्पादकर्ता और विज्ञापनकर्ता जाने। लेकिन ये बात देखने वाली है कि सेना कैसे लोगों के लिए अनेक विचारों और क्रियाओं का साधन बन गया है।

हर जगह से जब पड़ोसी देश को नेस्तनाबूद करने का फरमान जारी हो जाता है, तो सेना हमारी भड़ास निकलने का साधन बन जाती है। जब राष्ट्रवाद की परिभाषा को सेना के परिपेक्ष्य में गढ़ा जाता है तो वह राष्ट्रवाद के हाथों का औज़ार बन जाती है और जब उत्पादों की सार्थकता सेना की छवि को आधार बनाने लगे तो वह बाज़ार का एक उत्पाद बन जाती है। वास्तव में सेना राष्ट्रवाद के बाज़ार की वस्तु ही है, हम इसे देखते हैं, अपने विचार बनाते हैं, उन्हें उद्घोषित करते हैं। सेना की भूमिका उसकी भावनाओं और आकांक्षओं का निर्धारण करते हैं। हम सेना के बारे में बात करते हैं पर वास्तव में सेना से कोई बात नहीं करता क्यूंकि हमने उसकी भूमिका और समाज में स्थान दोनों नियत करके रखा है।

एक परिपाटी है जिसका प्रतिनिधत्व सेना कर रही है, पर ये परिपाटी तय करते हुए सेना से किसी ने पूछा? प्रश्न विचारणीय है। इंसान जब इंसान नहीं रहता तो वस्तु बन जाता है, जब उसकी भावनओं से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण उसके विषय में भावनाएं हो जाती हैं तो व्यक्ति, या व्यक्तियों का समूह एक वस्तुपरक इकाई हो जाता है। हम सेना को देख रहे हैं और इस पैमाने में छुपा है उसका उपभोग- भौतिक नहीं तो वैचारिक, नहीं तो राजनैतिक। और इसी भौतिकता का मंथन कर रहे हैं ये विज्ञापन।

सवाल उठता है इसके बाद क्या? मैं कल्पना करता हूं कि आगे चलकर हमारे विज्ञापन किस तरह होंगे? “जैसे सेना लड़ती है सरहद पर दुश्मनों से और करती है देश की रक्षा, उसी तरह से हमारा टूथपेस्ट करता है कीटाणुओं से आपके दांतों की रक्षा।” या “धूल-मिट्टी हो या गोले-अंगारे, हमारा पाउडर हर दाग को जड़ से निकाले।” या “ऐसी खुशबू जो दुश्मन को भी दोस्त बनाए।” या फिर “लड़ाई के लिए चाहिए तन और मन की शक्ति, मन की शांति के लिए हमारे ब्रांड की अगरबत्ती।”

आपको शायद ये सब मज़ाक लग रहा हो पर कहीं न कहीं कड़वा सत्य हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, जिसके प्रश्न से तो सब परिचित हैं पर उत्तर किसी को नहीं मालूम। सेना का सीमेंट और बाइक- यही कहीं हमारा नया इतिहास, नया सत्य न बन जाए। बाहर निकलें इस मकड़जाल से, उपभोक्तावाद से, राष्ट्रवाद की संकीर्ण बेड़ियों से और चलकर सेना को देखें। लेकिन वैचारिक और भौतिक वस्तु की तरह नहीं, कम से कम कोशिश तो करें…

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