आखिर क्यों उड़ गई शहरों से गौरेया?

Posted by Raju Murmu in Environment, Hindi
May 23, 2017

एक दिन मैंने देखा मेरे घर के छत के मुंडेर पर एक छोटी सी, प्यारी सी नन्ही सी गोरैया ने अपना नया घोंसला बनाया । वह छोटी गोरैया खूब चहचहाती फुदकती और अपने छोटी सी चोंच में घास के तिनके लेकर अपने घोंसले को सजाने और सवारने में लगी रहती। अब तो मुझे छोटी गोरैया मेरे परिवार का ही कोई सदस्य लगने लगी थी। सुबह सुबह उसका चहचहाना ,फुदकना ,उड़कर फुर्ती से अपने घोंसले में बैठ जाना यह सब दृश्य मुझे बड़ा अच्छा का लगता था।

लेकिन जब से दुनिया में तकनीकी विकास हुआ है दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव आया है। विकास के इस बयार में मेरी उस छोटी सी गोरैया की आवाज कहीं गुम हो गई। अब वो मेरे घर के मुंडेर में अपना घोंसला नहीं बनाती। तरस गया हूँ मैं अपनी उस छोटी गोरैया को देखने के लिए। क्या आपको दिखाई देती है मेरी प्यारी छोटी गोरैया ?

साल 2002 में पर्यावरण बचाने के लिए बनाए गए अंतर्राष्ट्रीय संघ(IUCN) ने इंग्लैंड में गौरेया को संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में डाल दिया। 2010 से 20 मार्च को विश्व गौरेया दिवस भी मनाया जाता  है। और 2012 में घरेलू गौरेये को दिल्ली ने अपना राजकीय पक्षी भी घोषित किया। लेकिन इन सबके बीच जो सवाल है वो ये कि आखिर क्यों शहरों से घरेलू गौरेया लगातार गायब हो रही हैं? ये सवाल ना सिर्फ एक प्रजाती के शहरों को छोड़ जाने का है बल्कि पूरे मानव समाज के रहन-सहन और पर्यावरण पर पड़ते इसके असर की भी है।

गौरेया के विलुप्त होने के कारण

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की मानें तो गौरेया के विलुप्त होने की मुख्य वजह आधुनिकीकरण के साइडइफेक्ट्स ही हैं।

  • शहरों में छोटे पौधों, घास और हरियाली की कमी की वजह से कीड़े (गौरेया का मुख्य आहार) की कमी।
  • शहरी इलाकों में पेड़ की कमी के कारण घोंसले का संकट।
  • इमारतों के ढांचों में आ रहे परिवर्तन की वजह से गौरेया का घरों में घोंसला ना बना पाना।
  • मोबाइल टावरों से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों में वृद्धि।
  • गौरेया एक तय सीमा तक ही शोर बर्दाश्त कर पाती हैं, शहरों में गाड़ियों और अन्य वजहों से लगातार बढ़ता शोर।
  • अनाजों के रख रखाव के तरीकों में बदलाव के कारण भी गौरेया के आहार में कमी की एक मुख्य वजह है।
  • इन्सेक्टीसाइड्स का लगातार बढ़ता प्रयोग।

पिछले 60 सालों में सिर्फ गौरेया ही नहीं बल्कि कई अन्य प्रजातियां भी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है, लेकिन गौरेया और मानव इतिहास 10000 साल पुराना बताया जाता है। इसिलिए गौरेया का विलुप्त होना आंखों के सामने खलता है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गौरेया मोबाइल टावर्स की खोज से पहले ही विलुप्त होने लगें थे।

1962 में छपी अपनी किताब सायलेंट स्प्रिंग में रेचल कार्सन ने चेताया था कि 1939 से लगातार बढ़ रहे इंसेक्टिसाइड्स के प्रयोग से एक दिन ऐसा आएगा जब मानव सभ्यता खतरे में आ जाएगी, ना सिर्फ गौरेया धीरे-धीरे हमारे आंखों के सामने से कई प्रजातियां देखते-देखते गायब हो जाएंगी अगर हम सही वक्त पर नहीं जागें।

बड़े बड़े टावरों ने लोगो को सिर्फ बातूनी ही बनाया है। दुनियां के किसी भी कोने में संपर्क कर सकते है इस बतोलेबाज दुनिया ने मेरी छोटी सी नन्ही प्यारी गोरैया को मुझसे छीन लिया !

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